तो हीरो नहीं विलेन हैं सलमान कानपुर वालों ने फूंका पुतला

2013-11-06T11:29:46Z

kanpur बिग बॉस में केवल फिल्मी हस्तियों का फेवर किए जाने के कारण ये रिएलिटी शो आलोचना का शिकार हो गया और शो के होस्ट सलमान खान युवाओं के बीच हीरो के बजाए ‘विलेन’ बन गए हैं शहर में हर दूसरा युवा उनकी क्रिटेसाइज करता दिखाई दे रहा है यहां तक कि सडक़ों पर उनके पुतले फूंके जा रहे हैं लेकिन सच मानिए ऐसा करने वालों में अधिकांश कॉलेज गोइंग यंग्सटर्स ही हैं उनमें भी छात्राएं आगे रहीं सब एक स्वर से कह रहे हैं कि बिग बॉस अब बिग ‘ड्रामा’ बन गया है

बिना गलती के दी सजा
किदवई नगर में एक कोचिंग और कुछ कॉलेजों के युवाओं ने मिलकर सलमान का पुतला फूंक डाला. जमकर रिएलिटी शो के होस्ट के खिलाफ नारेबाजी की. इस काम में लड़कियां सबसे आगे रहीं. डीजी कॉलेज में बीए की छात्रा शहीन, शिवानी, कहकशां, मंतशा, गौरी, सना आदि छात्राओं ने कहा कि बिग बॉस के होस्ट सलमान खान टीवी एक्टर्स, काम नाम वाले मॉडल्स और नए कलाकारों को प्रताडि़त कर रहे हैं. सलमान फिल्म इंडस्ट्री में इस्टैबलिश्ड बड़े फिल्मी एक्टर्स और उनके रिश्तेदारों का सलमान बेजा फेवर करते हैं. शो में काजोल की बहन तनीशा ने कुशाल से लगातार तीन बार मारपीट की तब भी उनपर सलमान ने कोई एक्शन नहीं लिया. जबकि कुछ ही दिन पहले कुशाल को जरा से सख्त शब्दों के इस्तेमाल पर सजा दे दी गई थी. शो में जमकर ड्रामेबाजी हो रही है.


‘बड़ों’ पर करम, छोटों पर ‘सितम’
वहीं अन्य स्टूडेंट्स अभिषेक, अर्पित, प्रिंस, महेश, निशांत, शाहिद, फैजल, अर्पित आदि ने बताया कि शो के कंटेस्टेंट, पेशे से मॉडल आसिफ की अरमान कोहली से जरा सी कहा सुनी के बाद पनिशमेंट दिया गया. जबकि गलती अरमान की ही थी. सलमान फिल्म वालों का अनड्यू फेवर और छोटे आर्टिस्ट्स को परेशान कर रहे हैं. ये फेयर गेम नहीं है. छात्राएं तो गुस्से में सलमान पर खुलेआम बायस्ड बिहेवियर करने का आरोप लगा रहे हैं. इनका कहना है कि सलमान हीरो हैं, लेकिन विलेन से भी बदतर बिहेवियर कर रहे हैं. वो सब उनसे नफरत करने लगे हैं. इसलिए किदवई नगर के हनुमान मंदिर चौराहे पर उनका पुतला फूंक डाला.


लेकिन बाद में बदल गया सब
शो में पक्षपात के आरोपों के घिरे सलमान ने तमाम आलोचनाओं के बाद शो के दौरान ही इसपर रिएक्शन दिया. उन्होंने साफ-साफ ये कनफेस किया कि फिल्मी एक्टर्स का पक्ष लिया, लेकिन इसलिए कि वो उन्हें अच्छे से जानते पहचानते हैं. उन्होंने सीनियर एक्टर्स और ऑडियंस से राय भी मांगी कि वा उनकी जगह होते तो कैसे होस्ट करते, या वो कैसे रिएक्ट करें.
कहीं ‘साइको’ न बन जाएं ये...!


-टीवी के चक्कर में इमोशनल अन-स्टेबिलिटी और अटेंशन डेफिशिट सिंड्रोम का शिकार हो रहे शहर के 7 परसेंट युवा
-देर तक टीवी देखने से रोकने, स्कूल में मोबाइल नहीं ले जाने देने पर हाथ की नस काटने जैसे काम कर रहे स्टूडेंट्स


kanpur : महज एक रिएलिटी शो को लेकर ऐसे विरोध प्रदर्शन से सवाल उठ खड़े हुए हैं. आखिर एक टीवी शो के प्रति इतना रिएक्ट करने वाले युवा क्या पढ़ाई के प्रति कभी इतने गंभीर होते हैं. पेरेंट्स तक के मन में यही सवाल उठता है कि बच्चे इतने ही दिल से पढ़ाई और करियर के बारे में भी क्यों नहीं सोचते हैं? टीवी शो को लेकर युवाओं के इतने इनवॉल्वमेंट पर हमने टीचर्स, पेरेंट्स और यहां तक कि साईकेट्रिस्ट तक से बात की, तो एक्सपर्ट्स और टीचर्स तक ने इस बिहेवियर और लत को खतरे की घंटी बताया. साइकेट्रिस्ट्स ने कई डरा देने वाली रियल केस स्टडीज रिवील कीं, जो शहर में ही घटीं.

A Shocking Case Study 1...
स्कूल में सीरियल देखता था वो!
लाल बंगले एरिया में प्रेक्टिस करने वाले शहर के एक नामी साइकेट्रिस्ट बताते हैं कि दिवाली से दो दिन पूर्व ही उनकी क्लीनिक पर एक पेरेंट्स अपने क्लास 7वीं में पढऩे वाले बच्चे को लेकर आए. बच्चे कलाई पर टांके लगे हुए थे. वो उसे देखकर चौंके. पूछा तो पेरेंट्स ने बताया कि बच्चा स्कूल में महंगा फोन लेकर पहुंच रहा था. टीचर व प्रिंसिपल ने पकड़ा और पेरेंट्स को बुलाया तो पता चला कि घर का स्पेयर एंड्रॉइड फोन चुराकर ले जाता था. क्लास गोल करके दोस्तों के साथ स्कूल के किसी कोने में बैठकर बिग बॉस जैसे रिएलिटी शोज और वो सीरियल्स देखता था, जो लेट नाइट टीवी पर आते हैं और पेरेंट्स उसे देखने से मना करते थे. फोन लाने से रोकने पर बच्चा इस कदर परेशान हो उठा कि वो घर से ब्लेड लेकर स्कूल गया और वहीं पर उसने अपनी कलाई की नस काट ली. उसकी इस हरकत से पेरेंट्स और स्कूल वाले दहशतजदा हो गए.

Shocking Case Study 2...
छात्रा ने जब नस काट ली...

वहीं इसी साईकेट्रिस्ट की क्लीनिक पर लगभग तीन महीने पहले एक और पेरेंट्स अपनी बेटी को लेकर पहुंचे थे. वो टीवी की दीवानी थी. उसकी पढ़ाई डिस्टर्ब हो चुकी थी. अटेंशन डेफिशिट सिंड्रोम का शिकार थी. जरा-जरा सी बात पर चिढ़चिढ़ाने लगना, चीखना, टीवी देखने और मनमाने काम नहीं करने देने पर इमोशनल ब्लैकमेल करना..उसकी रोज की आदत थी. वो इमोशनल अनस्टेबिलिटी का शिकार थी. और एक दिन तो उस तेरह साल की लडक़ी ने अपनी मां के सामने ही अपनी कलाई की नस काट ली. बात केवल इतनी सी थी कि उसे देर रात में सीरियल देखने से रोका था.
What Doctors & Teachers Say--
ज्यादा टीवी देखने से स्टूडेंट्स इमोशनल अनस्टेबिलिटी और लैक ऑफ कॉन्संट्रेशन जैसी प्रॉब्लम्स का शिकार हो सकते हैं. 5 से 7 परसेंट लोगों को टीवी ये प्रॉब्लम्स दे भी रहा है. इससे पढ़ाई तो चौपट होती ही है, बिहेवियर भी गड़बड़ा जाता है. लोग वॉयलेंट और जिद्दी हो जाते हैं. वो सीरियल या मूवीज में देखी दुनिया को ही असल मानकर उसमें खाए रहते हैं.
-डॉ. उन्नति कुमार, साइकेट्रिस्ट
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बिग बॉस जैसे सारे कथित रिएलिटी शो कतई रियल नहीं हैं. ये सब प्री-स्क्रिप्टेड और प्री रिकॉर्डेड होते हैं. बाकायदा इनेक्ट किए जाते हैं. फिल्मी हस्तियां हों या कोई सामान्य व्यक्ति उनको बाकायदा लिखी गई स्क्रिप्ट के आधार पर एक्टिंग ही करनी होती है. ये 25 फीसदी भी असल नहीं होते. फिर ऐसे सीरियल्स के प्रोडयूसर तो चाहते ही हैं कि उनके खिलाफ प्रदर्शन हों, अपने आप ज्यादा प्रचार मिलेगा. ये सब टीआरपी का खेल का खेल है.
-डॉ. आलोक बाजपेयी, साइकेट्रिस्ट
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टीवी पर डिस्कवरी, नेशनल ज्योगरफीक, एनीमल प्लेनेट, हिस्ट्री जैसेचैनल्स भी तो हैं. स्टूडेंट्स को लगातार यही नसीहत देता हूं कि ऐसे चैनल्स देखें. उनका आइ क्यू बढ़ेगा. कुल मिलाकर देखा जाए तो पढ़ाई को टीवी जितना एंटरटेनिंग बनाना खुद स्टूडेंट का काम है. वो बस फ्यूचर के प्रति फिक्रमंद होकर पढ़ाई में जुटें. फिल्म और टीवी पर नहीं, पढ़ाई पर ग्रुप डिस्कशंस करें.
-डॉ. बीडी पांडे, यूनिवर्सिटी टीचर्स यूनियन
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मैं कॉलेज में राउंड लेते समय लड़कियों को टीवी शोज या सीरियल्स के बारे में डिस्कशन करते सुन लेती हूंं तो डांटती जरूर हूं. उन्हें यही समझाती हूं कि इतने मन से अगर वो आपस में सबसे टफ सब्जेक्ट पर डिस्कशन या विचार-विमर्श कर लें तो यूनिवर्सिटी टॉपर हो जाएं. छात्राओं के पेरेंट्स से मुलाकात होती है तो भी नसीहत देती हूं कि बच्चियों को केवल उनके लायक प्रोग्राम्स ही देखने दें.
-डॉ. मीता जमाल, प्रिंसिपल, डीजी गल्र्स पीजी कॉलेज
---क्या उपाय करें पेरेंट्स व टीचर्स--
1. बच्चों को टीवी देखने से एकदम से और कठोरता से न रोकें
2. उनको समय दें, धीरे-धीरे टीवी की दुनिया और हकीकत के बीच अंतर समझाएं
3. उनके सामने मम्मी और डैडी भी टीवी प्रोग्राम्स देखते समय खुद इंटेंस रिएक्शंस देने से बचें
4. कुल मिलाकर बच्चों को क्लीयर करें कि टीवी या तो इनफॉरमेशन पाने या केवल इंटरटेनमेंट का जरिया है
5. स्कूल-कॉलेज में टीचर्स टीवी के सही प्रोग्राम्स को ही देखने के लिए प्रेरित करते रहें


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