गांव से अधिक शहर में मर रही हैं बेटियां

2017-01-10T07:11:13Z

manish chandra@inext co inअगले जन्म बिटिया न कीजो कीजो तो बिहार राज्य न दीजो अब शायद बिहार के लिए यही कहावत होगी क्योंकि अभी तक यह माना जाता था कि सुविधाओं के अभाव में शिशु मृत्यु दर गांव की अधिक होती हैं लेकिन हाल में आए एक रिपोर्ट ने सबको चौंका दिया है बिहार में गावों से ज्यादा शहरों में बेटियां मारी जा रही है यह खुलासा हाल ही में रजिस्टार जनरल ऑफ इंडिया की तरफ से जारी सैंपल रजिस्टे्रेशन सिस्टम के बुलेटिन में हुआ है एसआरएस के आकंड़ों की मानें तो पूरे देश में एक मात्र बिहार ही ऐसा राज्य है जहां गांव की अपेक्षा शहर में नवजातों की अधिक मृत्यु हो रही है यही नहीं बेटियों की मृत्यु दर में भी बिहार सबसे आगे हैं


शहर में मृत्यु दर अधिक होना शॉकिंगरजिस्टार जनरल की लेटेस्ट रिपोर्ट के मुताबिक यहां जन्में हर हजार में से 42 बच्चे अपना पहला जन्मदिन भी नहीं मना पाते. देश में चल रहे ट्रेंड के विपरीत यहां लड़के और लड़की की मृत्यु दर में काफी असमानता है. यहां गर्ल चाइल्ड की मौत लड़कों से कहीं ज्यादा होती है. शहरी आबादी में जहां प्रति हजार जन्म पर 52 लड़कियां मर जाती है, वहीं लड़कों की संख्या इसके मुकाबले काफी कम 37 है. ग्र्रामीण इलाकों की स्थिति इससे बेहतर है और यहां प्रति हजार पर 39 लड़कियां और 36 लड़कों की मौत पहले साल में ही हो जाती है. 
गर्ल चाइल्ड इंफेंट मॉर्टिलिटी रेट ज्यादापूरे देश में ग्र्रामीण इलाकों में शिशु मृत्यु दर अधिक होना काफी कॉमन है. यहां मेडिकल फेसिलिटी और जागरुकता में अभाव को मुख्य वजह माना जाता है. बिहार में इसके उलट शहरी आबादी में इंफेंट मॉर्टिलिटी रेट अधिक है. इससे कई सवाल खड़े होते हैं. क्या गांव की स्वास्थ्य व्यवस्था शहरों से अधिक अच्छी है. यह काफी सोचनीय है.
मध्यप्रदेश में सबसे अधिक, केरल में सबसे कमओवरऑल आईएमआर डाटा में साल 2015 में मध्यप्रदेश की स्थिति सबसे खराब है. यहां हर हजार बच्चों पर 50 बच्चों की मौत हो जाती है. केरल में यह आंकड़ा देश में सबसे कम 12 बच्चों का है. छोटे राज्यों में गोवा और मणिपुर का पिछले तीन साल का एवरेज आईएमआर 9 है. 
रिपोर्ट के शॉकिंग फैक्ट्स36 मेल चाइल्ड की मौत प्रति हजार जन्मे बच्चे में हो जाती है.50 गर्ल चाइल्ड प्रति एक हजार में अपना पहला जन्मदिन भी नहीं मना पाती.44 शहरी बच्चे की मौत प्रति हजार जन्में बच्चों में हो जाती है.52 शहरी बच्चियों की मौत प्रति हजार बच्चों में हो जाती है.गांव से अधिक बेटियों की मौत क्यों हो रही शहरों में?9919445503

 

शहर में मृत्यु दर अधिक होना शॉकिंग

रजिस्टार जनरल की लेटेस्ट रिपोर्ट के मुताबिक यहां जन्में हर हजार में से 42 बच्चे अपना पहला जन्मदिन भी नहीं मना पाते. देश में चल रहे ट्रेंड के विपरीत यहां लड़के और लड़की की मृत्यु दर में काफी असमानता है. यहां गर्ल चाइल्ड की मौत लड़कों से कहीं ज्यादा होती है. शहरी आबादी में जहां प्रति हजार जन्म पर 52 लड़कियां मर जाती है, वहीं लड़कों की संख्या 

इसके मुकाबले काफी कम 37 है. ग्र्रामीण इलाकों की स्थिति इससे बेहतर है और यहां प्रति हजार पर 39 लड़कियां और 36 लड़कों की मौत पहले साल में ही हो जाती है. 

 

गर्ल चाइल्ड इंफेंट मॉर्टिलिटी रेट ज्यादा

पूरे देश में ग्र्रामीण इलाकों में शिशु मृत्यु दर अधिक होना काफी कॉमन है. यहां मेडिकल फेसिलिटी और जागरुकता में अभाव को मुख्य वजह माना जाता है. बिहार में इसके उलट शहरी आबादी में इंफेंट 

मॉर्टिलिटी रेट अधिक है. इससे कई सवाल खड़े होते हैं. क्या गांव की स्वास्थ्य व्यवस्था शहरों से अधिक अच्छी है. यह काफी सोचनीय है.

 

मध्यप्रदेश में सबसे अधिक, केरल में सबसे कम

ओवरऑल आईएमआर डाटा में साल 2015 में मध्यप्रदेश की स्थिति सबसे खराब है. यहां हर हजार बच्चों पर 50 बच्चों की मौत हो जाती है. केरल में यह आंकड़ा देश में सबसे कम 12 बच्चों का है. छोटे राज्यों में गोवा और मणिपुर का पिछले तीन साल का एवरेज आईएमआर 9 है. 

 

रिपोर्ट के शॉकिंग फैक्ट्स

36 मेल चाइल्ड की मौत प्रति हजार जन्मे बच्चे में हो जाती है.

50 गर्ल चाइल्ड प्रति एक हजार में अपना पहला जन्मदिन भी नहीं मना पाती.

44 शहरी बच्चे की मौत प्रति हजार जन्में बच्चों में हो जाती है.

52 शहरी बच्चियों की मौत प्रति हजार बच्चों में हो जाती है.

गांव से अधिक बेटियों की मौत क्यों हो रही शहरों में?

9919445503

Posted By: Inextlive

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