जानकारी है शनिवार को भाजपा और कांग्रेस के दो वरिष्‍ठ नेता समलैंगिक अधिकारों के समर्थन में उतर आए। ये वरिष्‍ठ नेता हैं अरुण जेटली और पी चिदंबरम। इस बारे में दोनों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को IPC की धारा 377 पर फिर से विचार करना चाहिए। बताते चलें कि ये दो वयस्‍कों के बीच समलैंगिक संबंधों को अपराध ठहराने वाली धारा है।

इस मौके पर बोले जेटली और चिदंबरम
शनिवार को एक साहित्यिक महोत्सव के दौरान दोनों वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट को समलैंगिकता के मामले पर दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला नहीं बदलना चाहिए था। अरुण जेटली ने इस बारे में कहा कि होमोसेक्शुआलिटी पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला दुनिया भर में लिए जा रहे कानूनी फैसलों से मेल नहीं खाता है। सुप्रीम कोर्ट को गे राइट्स पर अपने 2013 के फैसले पर एक बार फिर से विचार करना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर उठाए सवाल
साफ है कि केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) को रद्द करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर फिर सवाल उठाया है। इसके अलावा जेटली ने ये भी कहा कि कानून में कहा गया है कि मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से राष्ट्रपति जजों की नियुक्ति करेंगे। अब अगर यह कहा जाए कि मुख्य न्यायाधीश किसी से सलाह किए बगैर यह काम करेंगे, तो यह पूरी तरह से संविधान के विपरीत होगा।
अन्य ढाचों को नहीं कर सकते विघटित
अरुण जेटली ने ये भी कहा कि लोकतंत्र में स्वतंत्र न्यायपालिका की तरह निर्वाचित सरकार और संसद को भी बुनियादी ढांचे का दर्जा हासिल है। आप किसी एक को बचाने के लिए अन्य सभी ढांचों को विघटित नहीं कर सकते हैं। उनका कहना है कि उन्हें ऐसा लगता है कि इस पर फिर से विचार करना होगा। जैसे आने वाली पीढ़ी किसी दिन यह भी देखेगी कि आपसी रजामंदी से समलैंगिक संबंधों को अपराध मानने वाले फैसले पर फिर से विचार किया जा रहा है।

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Posted By: Ruchi D Sharma