कहते हैं ना कि विज्ञान के लिए शायद कुछ भी नामुमकिन नहीं है। साइंस की इस नई रिसर्च में कुछ ऐसी ही बात सामने आई है। वैज्ञानिकों ने एक ऐसे बैक्‍टेरिया जिसे साइनोबैक्टीरिया या हिंदी में हरा शैवाल कहते हैं खोजा है जो सूरज की रोशनी से लेकर रात के अंधेरे में भी एक इलेक्‍ट्रिक करंट पैदा करता है।

इंपीरियल कॉलेज लंदन में खोजी गई बिजली बनाने की अनोखी तकनीक
वैज्ञानिकों के मुताबिक सोलर एनर्जी के लिए ऐसे सोलर सेल्स यूज़ होते हैं जो केवल धूप की रोशनी में ही काम करते हैं। ईंधन की बढ़ती कीमतों और बिजली की बढ़ती जरूरतों से जुड़ी समस्याओं के बीच लंदन के इंपीरियल कॉलेज के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी खुशखबरी दी है जो आने वाले सालों में पूरी दुनिया के लिए एक वरदान साबित हो सकती है। इंपीरियल कॉलेज के वैज्ञानिकों ने साइनोबैक्टीरीया यानी नील हरित शैवाल का यूज करके एक ऐसा इलेक्ट्रॉनिक सर्किट तैयार किया है जो रोशनी को बिजली में बदल सकता है।

 

कैसे किया ये कमाल
इस प्रयोग के दौरान वैज्ञानिकों में एक नॉर्मल इंकजेट प्रिंटर से उन्होंने ऐसा कार्बन नैनोट्यूब इलेक्ट्रोड सरफेस प्रिंट किया है जिसके ऊपर सायनोबैक्टीरिया मौजूद है। वैज्ञानिकों का कहना है कि कोयले को जलाकर या हाइड्रो इलेक्ट्रिक सिस्टम से पावर जनरेट करने की महंगी तकनीकों के अलावा दुनिया में सबसे सस्ता इलेक्ट्रिक जनरेटर सोलर बेस्ड ही है, लेकिन वो रात में बिजली नहीं बना सकता। सोलर एनर्जी में इस्तेमाल होने वाले सोलर सेल सिर्फ धूप की रोशनी में ही एक्सपोज होते और काम करते हैं। दूसरी ओर साइनोबैक्टीरिया दिन के उजाले के साथ साथ रात के अंधेरे में भी बिजली बना सकता है।

 

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साइनोबैक्टीरिया वाले सोलर पैनल और बैट्री से बन सकती है कंपोस्ट खाद
साइनोबैक्टीरिया से बने किसी भी इलेक्ट्रिक जनरेटर डिवाइस की एक और बहुत ही बड़ी खासियत यह है, कि ये सभी डिवाइस बायोडिग्रेडेबल होंगी। नेचर कम्युनिकेशन मैगजीन में छपे इसके रिसर्च पेपर में मुख्य वैज्ञानिक और राइटर Marin Sawa बताते हैं कि साइनोबैक्टीरिया इलेक्ट्रिक सर्किट और उससे बनी बैट्री की लाइफ पूरी होने के बाद उन्हें बगीचों में या कंपोस्ट में भी डिकंपोज यानि गलाया जा सकता है।

 

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सस्ती और इनवायरमेंट के लिए फायदेमंद तकनीक
साइनोबैक्टीरिया इलेक्ट्रिक सर्किट से बने सोलर पैनल और बायोडिग्रेडेबल बैटरी बहुत ही सस्ती, आसानी से उपलब्ध और एनवायरनमेंट के लिए फायदेमंद होगी क्योंकि इन में कोई भी हैवी मेटल और प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं होगा और यही समय की जरूरत है। लेकिन Marin Sawa का कहना है कि अभी इस टेक्नोलॉजी को ऐसे ही इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है हमें इस पर अभी बहुत काम करना होगा तब हम इसे आम लोगों के इस्तेमाल लायक बना पाएंगे।

 

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वैज्ञानिको ने दिखाया इस तकनीक का नायाब नमूना
इस नई रिसर्च के मुताबिक साइनोबैक्टीरिया इलेक्ट्रिक सर्किट से जुड़े 9 कनेक्टेड सेल्स मिलकर एक डिजिटल क्लॉक को चला सकते हैं या एक LED लाइट के फ्लैश को जला सकते हैं। यही नहीं वैज्ञानिकों ने यह साबित करके दिखाया है कि ये इलेक्ट्रिक सेल्स 100 घंटो तक के लिए भी लगातार पावर जनरेशन कर सकते हैं चाहे दिन हो या रात।

Posted By: Chandramohan Mishra