सीटिंग परमिट पर स्लीपर कोच का खेल

2019-07-10T06:01:03Z

रांची: सिटी में करोड़ों का कारोबार करने वाली बस सर्विसेज के द्वारा भयंकर जालसाजी को अंजाम दिया जा रहा है। राजधानी से लंबी दूरी तक लोगों को सफर करा रही 400 बसों में से 100 से अधिक बसों में स्लीपर कोच लगाया गया है और ये बसें अवैध तरीके से सड़कों पर दौड़ रही हैं। परिवहन विभाग की आंखों में धूल झोंककर बस संचालक खुलेआम इस तरह से नियम-कायदों की धज्जियां उड़ा कर अपनी जेब भर रहे हैं। जबकि बस संचालक जब बसों के परमिट के लिए विभाग में आवेदन करते हैं तो 42 और 51 सीट की बस दर्शाते हैं। उसमें स्लीपर का कोई जिक्र नहीं होता, क्योंकि इसके लिए तय मानकों का पालन करना होगा साथ ही इसकी अनुमति भी नहीं है। इसके बाद जब परमिट पास हो जाता है तो बसों में मनमाने तरीके से स्लीपर्स लगाकर यात्रियों से मनमाना किराया वसूला जाता है। इससे जहां यात्रियों की सुरक्षा खतरे में रहता है वहीं सरकार को भी सालाना लाखों रुपए के रेवेन्यू का लॉस हो रहा है। ऐसा भी नहीं है कि विभाग के अफसर इससे अंजानं हैं। इसके बाद भी ये गोरखधंधा जारी है।

बोर्ड में ही सिमटी सुविधाएं

बस संचालक बड़े-बड़े बोर्ड लगाकर टू बाय टू डीलक्स, सुपर डीलक्स का दावा करते हुए बस का किराया तो मनमाना बढ़ा देते हैं, लेकिन ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के अनुसार डीलक्स बसों में महज 35 सीटें ही होनी चाहिए। यदि बस डीलक्स है तभी उसका किराया डीलक्स का होगा। लेकिन बस वाले 45-50 सीट लगाकर भी डीलक्स का किराया या उससे अधिक किराया वसूला रहे हैं।

क्या है बसों के लिए नियम

ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया ने निजी और सरकारी बसों के लिए प्रावधान तय कर रखे हैं। अथॉरिटी के नियमानुसार डीलक्स बसों में पैसेंजर्स के बैठने की 35 सीटें और सेमी डीलक्स बसों में यात्रियों के बैठने की 53 सीटें निर्धारित की गई हैं। इसके अलावा सेमी डीलक्स डीलक्स बसों में स्लीपर का कोई प्रावधान नहीं है। वहीं, सेमी डीलक्स बस के लिए 35,00 रुपये और डीलक्स बस के लिए 6800 रुपए हर तीन माह का टैक्स निर्धारित है। यह सरकार को राजस्व के रूप में प्राप्त होता है। लेकिन स्लीपर कोच के लिए कोई प्रावधान नहीं है। इसके बाद भी बस संचालक अपनी मनमानी कर रहे हैं।

एक्शन के लिए नहीं चलता अभियान

शहर से खुलने और आने वाली बसों में अवैध स्लीपर हटाने के लिए 11 अगस्त 2014 को तत्कालीन ट्रैफिक एसपी राजीव रंजन ने एक अभियान चलाया था। इस दौरान उन्होंने तीन स्लीपर बसों पर पांच हजार रुपए का फाइट काटा था। तब उन्होंने कहा था कि राजधानी से चलने वाली या गुजरने वाली जिन यात्री बसों में स्लीपर हैं वे अवैध हैं। क्योंकि झारखंड सरकार बसों के लिए जो परमिट जारी करती है उसमें स्लीपर का टैक्स शामिल नहीं होता है। उन्होंने कहा था कि यात्रियों के लिए स्लीपर जानलेवा हैं। दुर्घटना होने के बाद स्लीपर में सोए हुए लोगों की जान जाने का खतरा ज्यादा होता है। सारे बस संचालकों को निर्देश दिया था कि वे बसों से स्लीपर हटा लें। इसके लिए लगातार अभियान चलाया जाएगा। लेकिन कभी भी अभियान नहीं चला। इसी का फायदा बस ऑनरों ने उठाया और वे अब भी सीटिंग बसों के परमिट पर ही आराम से स्लीपर कोच लगाकर बंपर कमाई कर रहे हैं।

परमिट के बाद बॉडी से छेड़छाड़

झारखंड में स्लीपर बसों के परमिट का कोई प्रावधान नहीं है। ऐसे में बस संचालक अपनी मर्जी से बसों में स्लीपर बना दे रहे हैं। हालांकि परमिट लेने के दौरान एमवीआई (मोटर व्हीकल इंस्पेक्टर) को सिर्फ सीट ही दिखायी जाती है। लेकिन परमिट मिलते ही बस की बॉडी से छेड़छाड़ कर स्लीपर बनवा दिया जा रहा है।

वर्जन

कई राज्यों में स्लीपर बसें वैध हैं। उसी आधार पर हम लोग भी यहां प्रयास कर रहे हैं। बिना अनुमति के जिन गाडि़यों में भी स्लीपर कोच लगाए गए हैं उनमें भी मापकों का पालन किया गया है।

कृष्णमोहन सिंह

अध्यक्ष

बस ऑनर एसोसिएशन

बसों में अगर स्लीपर अवैध हैं तो इस संबंध में परिवहन विभाग से जानकारी ली जाएगी। इसके बाद ही कार्रवाई की जा सकती है।

अजीत पीटर डुंगडुंग

पूर्व एसपी ट्रैफिक, रांची


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