Subhash Chandra Bose Jayanti 2020: रोमांचक गाथा से कम नहीं नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का जीवन

Subhash Chandra Bose Jayanti 2020 23 जनवरी 1897 को कटक में जन्मे सुभाष चन्द्र 15 साल की उम्र में ही विवेकानंद साहित्य का आनंद लेने लगे थे। उस समय कौन जानता था कि आध्यात्म में रुचि रखने वाला यह बालक आगे चलकर देश की आजादी की जंग में एक अहम भूमिका निभाएगा...

Updated Date: Thu, 23 Jan 2020 12:27 PM (IST)

कानपुर (अरुण सक्सेना)। Subhash Chandra Bose Jayanti 2020 सुभाष चन्द्र बोस का सम्पूर्ण जीवन किसी रोमांचित गाथा से कम नहीं और उनकी मृत्यु एक अनसुलझी पहेली की भांति आज भी शोधकर्ताओं के लिए चुनौती बनी हुई है। 23 जनवरी, 1897 को कटक (ओडिशा) में जन्मे बोस, 15 साल की उम्र में ही विवेकानंद साहित्य का आनंद लेने लगे थे। उस समय कौन जानता था कि आध्यात्म में रुचि रखने वाला यह बालक आगे चलकर देश की आजादी की जंग में एक अहम भूमिका निभाएगा। 1956 में कोलकता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस तथा एक्टिंग गवर्नर जस्टिस पीबी चक्रबर्ती ने एक डिनर के दौरान इंग्लैंड के पूर्व प्राइम मिनिस्टर क्लेमेंट एटली से पूछ लिया कि अंग्रेज अचानक से भारत की आजादी के लिए कैसे तैयार हो गए, क्या यह निर्णय क्विट इंडिया मूवमेंट से प्रभावित था। एटली ने मुस्कुराकर जवाब दिया कि इस निर्णय के पीछे सबसे बड़ा कारण थे नेताजी, क्योंकि इंडियन नेशनल आर्मी की गतिविधियों के कारण देश की सेना की वफादारी अंग्रेजों के प्रति समाप्त हो चुकी थी।भारत वापस आने के बाद नेता जी गांधी जी के संपर्क में आए
1920 में उन्होंने आईसीएस (इंडियन सिविल सर्विसेज) की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया लेकिन जलियावाला बाग नरसंहार से आक्रोशित होकर 1921 में इस्तीफा दे दिया। भारत वापस आने के बाद नेता जी गांधी जी के संपर्क में आए और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। वे चाहते थे कि कांग्रेस प्रयास कर भगत सिंह आदि की फांसी रुकवाए किन्तु गांधी जी इससे सहमत न थे। 1938 एवं 1939 में कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए। उस समय देश में उनकी लोकप्रियता अपने शिखर पर थी और वे गांधी जी द्वारा समर्थित कैंडिडेट पट्टाभि सितारमैय्या को हराकर कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे। गांधी जी से मतभेदों के चलते उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और अपनी पार्टी फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की।जर्मनी के तानाशाह अडोल्फ हिटलर से मुलाकात कर मदद मांगी


नेताजी का मानना था कि दुश्मन का दुश्मन, दोस्त होता है। इसी के चलते उन्होंने 1941 में जर्मनी के तानाशाह अडोल्फ हिटलर से मुलाकात कर मदद मांगी तथा 1943 में जापान की सहायता से मोहन सिंह द्वारा गठित आईएनए की कमान संभाली। अक्टूबर 1943 में भारत की 'आजाद हिन्द सरकार' के गठन के साथ अन-डिवाइडेड इंडिया के पहले प्रधानमंत्री बने। इस सरकार की अपनी करेंसी, कोर्ट तथा सिविल कोड था और इसे जापान, चीन, जर्मनी, फिलीपीन्स, कोरिया, इटली तथा आयरलैंड द्वारा मान्यता प्राप्त थी। वल्र्ड वॉर-2 के दौरान आईएनए अंडमान और निकोबार आईलैंड जीतने में सफल रही। नेताजी को श्रद्धांजलि के रूप में वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा यहां के तीन आइलैंड्स के नाम बदलकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस, शहीद व स्वराज आइलैंड कर दिए गए एवं 2019 में लाल किले में उनके म्यूजियम का उद्घाटन भी किया गया।नेताजी के संघर्ष भरे जीवन में प्रेम ओस की बूंदों की तरह ही आयाबीसवीं सदी में किसी भी युद्ध के लिए सर्वाधिक धन जमा करने वाले वो सबसे बड़े भारतीय नेता थे। जो धन उन्होंने एकत्रित किया था उसकी कीमत आज की तारीख में लगभग 700 से 800 करोड़ रुपये के बीच आंकी जाती है। नेताजी के इस संघर्ष भरे जीवन में प्रेम ओस की बूंदों के सामान ही आया और उन्होंने अपनी सेक्रेटरी एमिली के संग विवाह कर लिया। एमिली को लिखे गए उनके पत्रों में उनके व्यक्तित्व के भावनात्मक पहलू की खूबसूरत छाप मिलती है।एक लिखित जवाब में ऐसे किसी भी प्लेन क्रैश से इंकार कर दिया

1945 में उनके तथाकथित प्लेन क्रैश की थ्योरी तब मुंह के बल गिर गई, जब ताइवान ने एक लिखित जवाब में ऐसे किसी भी प्लेन क्रैश से इंकार कर दिया। शोधकर्ताओं का दावा है कि रिकोजी मंदिर में रखी अस्थियां एक जापानी सैनिक इच्चोडा ओकुरा की हैं। नेताजी की गुमशुदगी की अनेक थ्योरीज में गुमनामी बाबा वाली थ्योरी ही ऐसी है, जिसमें अनेक साक्ष्य उपलब्ध हैं। अमेरिका के विख्यात हैंडराइटिंग एक्सपर्ट कार्ल बैगेट ने बोस और गुमनामी बाबा के लिखे पत्रों का अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला कि दोनों एक ही व्यक्ति थे। 1985 में गुमनामी बाबा की फैजाबाद में मृत्यु के पश्चात जब उनके सामान का निरीक्षण हुआ, तो उनके बक्से से नेताजी के फैमिली फोटोज मिले। उत्तर प्रदेश के दो पूर्व मुख्यमंत्री सम्पूर्णानंद तथा बनारसी दासगुप्त, नेताजी के सहयोगी पबित्र मोहन रॉय तथा लीला रॉय, आईएनए गुप्तचर शाखा के एसी दास, आरएसएस के पूर्व सरसंघसंचालक गोवलकर आदि गुमनामी बाबा के संपर्क में रहे।महानायक का ऐसा दुखद अंत देश की अंतरात्मा को आहत करने वालाअंत में सबसे बड़ा प्रश्न ये उठता है कि अगर गुमनामी बाबा ही बोस थे, तो क्या कारण थे जिनकी वजह से वो अपनी पहचान छिपाते रहे। शोधकर्ताओं के अनुसार गुमनामी बाबा के खतों का साइकॉलजिस्ट्स ने अध्ययन किया और इस नतीजे पर पहुंचे कि शायद वह पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर से ग्रस्त थे। किसी भी महानायक का ऐसा दुखद अंत देश की अंतरात्मा को आहत करने वाला है।editor@inext.co.in

Posted By: Shweta Mishra
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