तो इस कारण लक्ष्य से भटक जाते हैं हम नहीं मिलती मनचाही सफलता

2018-07-02T12:05:18Z

हमारे जीवन का एक बड़ा दोष यह है कि हम लक्ष्य पर ही अधिक ध्यान दिया करते हैं। हमारे लिए लक्ष्य इतना अधिक आकर्षक होता है और ऐसा मोहक होता है कि हम कार्य की बजाय लक्ष्य पर ही अधिक ध्यान देने लगते हैं।

हमारे जीवन का एक बड़ा दोष यह है कि हम लक्ष्य पर ही अधिक ध्यान दिया करते हैं। हमारे लिए लक्ष्य इतना अधिक आकर्षक होता है और ऐसा मोहक होता है कि हम कार्य की बजाय लक्ष्य पर ही अधिक ध्यान देने लगते हैं। यह हमारे मन पर इतना प्रभाव डालता है कि लक्ष्य की प्राप्ति के साधनों की बारीकियां हमारी नजरों से निकल जाती हैं। यदि हम इस विषय पर छानबीन करें, तो पाएंगे कि 99 प्रतिशत मामलों में साधन की ओर ध्यान न देने कारण हम लक्ष्य के रास्ते से भटक गए।
हमें आवश्यकता है अपने साधनों को मजबूत बनाने की और उन्हें पूर्ण रूप से क्षमतावान बनाने के लिए उनकी ओर अधिक ध्यान देने की। यदि हमारे साधन बिल्कुल ठीक हैं, तो साध्य की प्राप्ति तो होगी ही। हम यह भूल जाते हैं कि कारण ही कार्य का जन्मदाता है। कार्य आप-ही-आप पैदा नहीं हो सकते हैं। जब तक कार्य बिल्कुल ठीक, योग्य और सक्षम न हों, कार्य की उत्पत्ति नहीं होगी। एक बार हमने यदि ध्येय निश्चित कर लिया और उसके साधन पक्के कर लिए, तो फिर हम ध्येय को लगभग छोड़ दे सकते हैं। हमें अपना ध्यान सिर्फ काम पर लगाना चाहिए।


 
साधन की ओर ध्यान
हमें यह पूरा मालूम है कि अगर साधन दोषरहित होगा, तो साध्य कहीं नहीं जाएगा। जब कारण विद्यमान है, तो कार्य की उत्पत्ति तो होगी ही। इसके बारे में विशेष चिंता की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि कारण के विषय में हम सावधान रहें, तो कार्य स्वयं आ ही जाएगा। कार्य है ध्येय की सिद्धि। कारण है साधन। इसलिए साधन की ओर ध्यान देते रहना जीवन का एक बड़ा रहस्य है।
आसक्ति दुख का सबसे बड़ा कारण
गीता में भी हमने यही पढ़ा और सीखा है कि हमें लगातार भरसक काम करते ही जाना चाहिए। काम चाहे कोई भी हो, अपना पूरा मन उस ओर लगा देना चाहिए। साथ ही ध्यान रहे हम उसमें आसक्त न हो जाएं। आसक्ति हमारे दुख का सबसे बड़ा कारण है। हम जानते हैं कि वह हमें चोट पहुंचा रही है और उसमें चिपके रहने से केवल दुख ही हाथ आएगा, लेकिन फिर भी हम उससे छुटकारा नहीं पा सकते हैं।


कर्म पथ से ध्यान न हटे
कई बार हम देखते हैं कि मधुमक्खी तो शहद चाटने आती है, लेकिन उसके पैर मधुचषक से चिपक जाते हैं। फिर वह चाहकर भी उससे छुटकारा नहीं पा सकती है। बार-बार हम भी अपनी यही स्थिति अनुभव करते हैं। यही हमारे अस्तित्व का संपूर्ण रहस्य है। हम न चाहते हुए भी कई ऐसे कार्यो को करते चले जाते हैं, जो हमें सिर्फ अपने लक्ष्य पथ से भटका देते हैं। हमें यह पक्का करना होगा कि किसी भी विषय द्वारा अपने कर्म पथ से हमारा ध्यान न हटे। हममें इतनी शक्ति हो कि हम इच्छानुसार भटकाने वाले कर्म को छोड़ सकें।
-स्वामी विवेकानंद

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