बीती सदी के उत्तराद्र्ध में भारत समेत एशियाई रंगमंच की विशिष्टताओं ने यूरोप और दुनिया के दूसरे थियेटर पर गहरा असर डाला है. यह कहना है फ्रांस के मशहूर रंगकर्मी आसिल रईस का. रईस शुक्रवार को वरिष्ठ रंगकर्मी योगेंद्र दुबे की स्मृति में आयोजित राष्ट्रीय व्याख्यान माला में बतौर चीफ गेस्ट बोल रहे थे. सात समंदर पार का भारतीय रंगमंच विषय पर आयोजित व्याख्यान माला का आयोजन नागरी प्रचारिणी में सांस्कृतिक संस्था रंगलीला और छांव फाउंडेशन द्वारा किया गया था.


आगरा। रईस ने बताया कि फ्रांस, यूके, इटली और जर्मनी सहित समूचे यूरोप में एशियाई प्रस्तुति कलाओं और उनके भीतर मौजूद अभिनेताओं के वजूद का असर समूचे पश्चिम के थियेटर को प्रभावित कर रहा है। कार्यक्रम में बोलते हुए वरिष्ठ फ्र ांसीसी पत्रकार और वहां के रंगमंच से जुडी रॉसलिंन हिम्स ने कहा कि उन्होंने गिरीश कर्नाड के नाटकों का गहरा अध्ययन किया है और इस निष्कर्ष पर पहुंची हैं कि उनका लेखन अप्रतिम है। भारतीय रंगकर्म की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि संस्कृत नाटकों से लेकर आज के आधुनिक नाटकों तक, उन्होंने जितना पढ़ा और देखा है ।

इसे विकसित करने की आवश्यकता है
वरिष्ठ रंगकर्मी अनिल शुक्ल ने बताया कि वरिष्ठ रंगकर्मी और पत्रकार स्व। योगेंद्र दुबे की स्मृति में प्रारंभ की जाने वाली इस व्याख्यान श्रंखला में प्रतिवर्ष देश और दुनिया के नामचीन रंगकर्मी और पत्रकार भाग लेंगे। कार्यक्रम का विषय प्रवर्तन करते हुए वरिष्ठ लेखक अरुण डंग ने कहा कि सारी दुनिया में भारतीय रंगमंच की धूम है लेकिन दुर्भाग्य से भारत में ही इसकी पूछ नहीं हो रही है। इसे विकसित करने की आवश्यकता है। डॉ। राजेश कुमार ने आगरा और ब्रज की गौरवपूर्ण संस्कृति परम्पराओं का उल्लेख किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ गीतकार सोम ठाकुर ने की। संचालन उर्दू की मशहूर लेखिका प्रो.नसरीन बेगम ने किया। धन्यवाद ज्ञापन छांव फाउंडेशन आगरा के आशीष शुक्ल ने किया। इस अवसर पर स्व। दुबे की पत्नी ममता दुबे ने भी अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम का प्रबंधन मनीषा शुक्ला, रामभरत उपाध्याय, अजय तोमर, अशोक कुमार, प्रज्ञान दुबे, रवि प्रजापति और पुरुषोत्तम ने किया।

Posted By: Inextlive