देश की आजादी के पूूर्व से लोहड़ी हर्षोल्लास से मनाता आ रहा सिक्ख समाजईश्वर को धन्यवाद देने का भी है यह पर्व अपने-अपने तरीके से मनाते हैं सभी

प्रयागराज ब्यूरो । खेतों में अच्छी फसल देने के लिए ईश्वर को धन्यवाद के साथ लोहड़ी एक शौर्य गाथा को याद करने का पर्व है। यह पर्व सिर्फ सिख समाज का ही नहीं वरन सभी वर्गों का है। सभी इसे अपने-अपने ढंग और तरीके से मनाते और इंज्वाय करते हैं। आजादी के पूर्व का यह पर्व पंजाब एरिया में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता रहा है। सिख समाज के लोगों का मत है कि इस पौष माह में खेतों में हरियाली रहती है। इस लिए सभी ईश्वर को अच्छी फसल देने के लिए व ऐसे ही परिवार में हरियाली बनाए रखने की कामना के साथ समाज ईश्वर को धन्यवाद देते हैं।

जानिए क्या है शौर्य गाथा का मर्म
गुरु गोविंद सिंह मेमोरियल ट्रस्ट के अध्यक्ष कहते हैं कि आजादी से पूर्व पूरा पंजाब भारत का हिस्सा था। बंटवारे के बाद स्थितियां बदल गईं। लोहड़ी का पर्व काफी पुराना है। बताते हैं कि यह सिख समाज का कोई धार्मिक पर्व नहीं है। चूंकि सारे पर्व सभी मनाते रहे हैं इसलिए वह परंपरा आज भी चली आ रही है। इस पर्व को घरों अथवा सार्वजनिक स्थलों पर कैंप फायर के रूप में लोक पर्व की तरह उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस पर्व के पीछे समाज में एक कथा भी प्रचलित है। बड़े बुजुर्गों बताया करते थे कि लोहड़ी पर्व मुस्लिम राजपूत राय अब्दुल्ला खां दुल्ला भट्टी के शौर्य गाथा की यादगार भी है। यह बात बहुत कम लोगों को मालूम है। बताते हैं कि अकबर के शासनकाल में बागी नायक राजपूत राय अब्दुल्ला खां शासकीय धन लूटकर गरीबों की सहायता किया करते थे। 26 मार्च 1569 को मृत्यु दंड देकर सरकार द्वारा उनके शरीर में भूसा भरकर लाहौर के चौराहे पर लटका दिया गया था। दुल्ला भट्टी ने दो अगवा ब्राम्हण कन्याओं सुंदरी व मुंदरी को मुगल अक्रांताओं से मुक्त कराकर मकर संक्रांति की पर्व संख्या पर जंगल में ब्राम्हण युवकों के साथ अग्नि के फेरे लगवा कर शादी करवा दी थी। इसी घटना की याद में मकर संक्रांति के एक दिन पूर्व यह पर्व मनाया जाता है। बताते हैं कि नायक की कब्र लाहौर के मियांनी बाजार में आज स्थित है।


बंगाली भी शिद्दत से मनाते हैं पांगल
बंगाली समाज में मकर संक्रांति पर्व का एक विशेष महत्व है। इस पर्व को बंगाली समाज पूरे हर्षोल्लास के साथ सदियों से मनाता आ रहा है। बंगाली समाज में यह पर्व को पोष पार्वन पर्व के रूप में भी जाना जाता है। बंगाली सोशल एण्ड कल्चरल एसोसिएशन के कोषाध्यक्ष देवराज चटर्जी कहते हैं कि इस पर्व पर बंगाली समाज के लोग खीर, पीठे, पालीसेपटा जैसे व्यंजन व गजक व मूंगफली की पट्टी आदि का दान करते हैं। खजूर के गुड़ से बड़े पकवान के दान का समाज में विशेष महत्व माना गया है। कहते हैं कि इस यहीं से मानसून में बदलाव होता है। यह पर्व अच्छे से तैयार फसलों को दान करने व ईश्वर को उस फसल का अंश समर्पित करने का पर्व है।


लोहड़ी का पर्व सदियों पुराना त्यौहार है। यह ईश्वर को धन्यवाद देने व एक शौरगाथा को याद करने के दिन के रूप में मनाया जाता है। सिक्ख समाज का धार्मिक पर्व नहीं होने के बावजूद पूरा समाज हर्षोल्लास के साथ मनाता है। सिक्ख समाज के लोग इस पर्व को आजादी के पूर्व से अपने तरीके से मनाते आ रहा है।
हरजिंदर सिंह, अध्यक्ष गुरु गोविंद सिंह मेमोमोरियल ट्रस्ट


वक्त के साथ पर्वों को भी लोग अपने ढंग से मनाने का तरीका बदलते गए। यह पर्व हिन्दू समाज के हर शख्स का है। इसे मनाने के लिए पीछे प्रकृति में परिवर्तन और आने वाले दिनों में सुख समृद्धि बनाए रखने के लिए ईश्वर से प्रार्थना का दिन है। इस पर्व को बनाने के पीछे वैज्ञानिक मान्यताएं भी हैं। सिख समुदाय में अग्नि प्रज्ज्वलित करके तीन फेरे लगाए जाते हैं। इस फेरे के पीछे भी एक बड़ा रहस्य है।
आचार्य संजय वासुदेवा

बंगाली समाज इस पर्व को पोष पार्वन पर्व के रूप में भी मनाता है। यह पर्व हिन्दू समाज के हर वर्ग का है। यह पर्व खेतों में अच्छी फसल दे कर परिवार में सम्पन्नता प्रदान करने के लिए ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करने के लिए भी मनाया जाता है। इसी लिए इस पर्व पर अन्न दान का भी विशेष महत्व है। पूरा समाज इस पर्व पर सूर्य की आराधना अपने तरीके से करता है।
देवराज चटर्जी, कोषाध्यक्ष बंगाली सोसल एण्ड कल्चरल एसोसिएशन


बंगाली समाज में इस पर्व को पांगल कहा जाता है। पांगल पर्व को हम बड़े ही उत्साह के साथ मनाते हैं। हमारे समाज में इस पर्व में भी इस पर्व को मनाने के पीछे का मंतव्य परिवार में सुख समृद्धि व शांति बनाए रखने की कामना से है। रास्ते व मकसद सभी एक ही हैं, यह बात और है कि मनाने व चलने का तरीका अलग है।
अपर्णा चटर्जी, बंगाली समाज

Posted By: Inextlive