मोबाइल की मार, स्टूडेंट्स हो रहे एंग्जाइटी का शिकार

Updated Date: Tue, 27 Apr 2021 12:58 PM (IST)

- 9वीं से 12वीं क्लास तक के 400 स्टूडेंट की काउंसिलिंग में सामने आई बात

-स्टूडेंट की 3 घंटे से अधिक मोबाइल की लत बना रही एंजाइटी का शिकार

- स्टूडेंट की कमजोर हो रही याददाश्त, 35 और 40 की एज में गंभीर हो सकते है परिणाम

GORAKHPUR: क्या आपका बच्चा बात-बात पर गुस्सा कर रहा है? वो कोई भी डिसिजन लेने में असमर्थ है? उसकी यादाश्त भी कमजोर होती जा रही है? अगर ऐसा है तो सावधान हो जाएं, इन लक्षणों का होना ये साबित कर रहा है कि आपका लाडला एंग्जाइटी का शिकार हो गया है। गोरखपुर मंडलीय साइकोलॉजी सेंटर के एक्सपर्ट ने कोरोना काल में शहर के अलग-अलग स्कूलों में जाकर 9वीं से 12वीं तक के 400 स्टूडेंट्स की काउंसिलिंग की तो ये हकीकत सामने आई। एक्सपर्ट का कहना है कि इसको लेकर पेरेंट्स या स्कूल गंभीर नहीं हुए तो आगे चलकर जब ये स्टूडेंट 35 से 40 की एज में पहुंचेंगे तो इसके परिणाम और भी गंभीर हो सकते हैं।

मोबाइली की दिवानगी बना रही बीमार

एक्सपर्ट डॉ। हिमांशु पाण्डेय ने बताया कि पिछले महीने जब स्कूल खुले थे तब हमारी टीम खास तौर से 9 वीं से लगाए 12वीं तक के बड़े बच्चों की मनोदशा की काउंसिलिंग करने स्कूल्स में पहुंची। काउंसिलिंग में जो भी बातें सामने आईं वो चौकाने वाली थीं। जो स्टूडेंट्स तीन घंटे से अधिक मोबाइल यूज कर रहे थे उनके अंदर कई कमियां नजर आईं। जबिक जो स्टूडेंट मोबाइल पर अपना कम समय बीता रहे थे वे शार्प माइंड मिले। लेकिन अधिकतर स्टूडेंट मोबाइल की लत के शिकार मिले। जिसके कारण उनकी यादाश्त कमजोर होती जा रही है।

इस तरह की काउंसिलंग

- 9वीं से 12वीं क्लास तक के स्टूडेंट की हुई काउंसिलिंग

- तीन तरह के तैयार किए क्वेश्चन

- एक एंजाइटी रिलेटेड क्वेश्चन

- एक एकेडमिक परफॉर्मेंस रिलेटेड क्वेश्चन

- एक सोशल मीडिया पर टाइम स्पेंड करने से रिलेटेड क्वेश्चन

- तीनों क्वेश्चन का बारी-बारी स्टूडेंट्स से फील कराया

- स्टूडेंट के बीच साइक्रेटिकल इवैलुएशन कराया

ये निकला नतीजा -

- जो बच्चे तीन घंटे से अधिक मोबाइल यूज कर रहे हैं उनकी एकेडमिक परफॉर्मेंस में तेजी से गिरावट आ रही है।

- उनके गुस्सा होने की प्रवृति बढ़ती जा रही है।

- डे टू डे डिसीजन मेकिंग में भी कमी आ रही है।

- हर बच्चा माइल्ड एंजाइटी से गुजरता मिला।

- आने वाले समय में ये बच्चे जवान होकर अपनी सोच डेवलप करने में असमर्थ हो जाएंगे।

- यही हाल रहा तो आने वाले पांच साल में हर बच्चा मेंटल प्रॉब्लम का सामना करेगा।

- कोरोना की वजह से मेंटल हेल्थ पहले ही बच्चों की डाउन हो चुकी है।

एक्सपर्ट की सलाह

-ये अचानक से मोबाइल छीन लेने से खत्म नहीं हो सकता है।

-धीरे-धीरे बच्चों के साथ घुल मिलकर सही गलत की पहचान बतानी होगी।

- एक मार्क लेवल ऑफ इनफॉर्मेंशन डेवलप की जाए।

- ऐसा सूचना तंत्र डेवलप करें जो मोबाइल और उससे होने वाली प्रॉब्लम को अच्छे ढंग से बताया गया हो।

- बच्चे जब इस बात को खुद से समझेंगे तब वो खुद सही गलत का फैसला ले सकेंगे।

- स्कूल के प्रिंसिपल और टीचर के द्वारा क्लास में बार-बार बच्चों को इसके लिए अवेयर करना होगा।

- सरकार को भी इसके लिए अवेयरनेस प्रोग्राम चलाना होगा।

- पेरेंट्स को बच्चों के साथ टाइम स्पेंड करना होगा। इस दौरान उन्हें मोबाइल से होने वाले नुकसान को कहानियों के माध्यम से समझाना होगा।

सीबीएसई स्कूल - 119

आईसीएससीई स्कूल- 17

यूपी बोर्ड स्कूल- 489

वर्जन

गोरखपुर में कई स्कूलों में 400 बच्चों की इधर काउंसिलिंग की गई। इसके लिए कई सवाल तैयार किया गया था। बच्चों के जवाब से ही उनके मेंटल स्टेटस का पता चला कि वे एंजाइटी के शिकार हैं। बच्चों से जोर जबरदस्ती करना खतरनाक होगा। इस लिए दोस्त बनकर ही हर गलत सही की पहचान कराएं।

डॉ। हिमांशु पाण्डेय, एक्सपर्ट, मंडलीय साइकोलॉजी सेंटर, गोरखपुर

Posted By: Inextlive
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