लोगों को बेहतर सुरक्षा त्वरित कार्रवाई और अपराधियों पर शिकंजा कसने के लिए शहर में कमिश्नरेट पुलिसिंग सिस्टम लागू किया गया. इस बदलावा लोगों को भी उम्मीद जगी कि अब हालात सुधरेंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं. शहर में 94 सनसनीखेज मर्डर और मौतों के मामले ऐसे हैं जिनमें एक साल बाद भी पुलिस न तो फाइनल रिपोर्ट लगा पाई है और न ही चार्जशीट. क्योंकि इसके लिए इंतजार है विसरा जांच रिपोर्ट का.

कानपुर(ब्यूरो)। लोगों को बेहतर सुरक्षा, त्वरित कार्रवाई और अपराधियों पर शिकंजा कसने के लिए शहर में कमिश्नरेट पुलिसिंग सिस्टम लागू किया गया। इस बदलावा लोगों को भी उम्मीद जगी कि अब हालात सुधरेंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं। शहर में 94 सनसनीखेज मर्डर और मौतों के मामले ऐसे हैं, जिनमें एक साल बाद भी पुलिस न तो फाइनल रिपोर्ट लगा पाई है और न ही चार्जशीट। क्योंकि इसके लिए इंतजार है विसरा जांच रिपोर्ट का। लेकिन बार-बार रिमांइडर के बावजूद रिपोर्ट नहीं आई। जिससे न तो मौत की वजह पता चल पाई और न हत्यारों का सुराग। जिससे मृतकों के परिजनों को न्याय का इंतजार लंबा होता जा रहा है। जैसे जैसे दिन बीत रहे हैं उम्मीद टूटती जा रही है। हाल ये हो गया है कि लोग कहने लगे हैं विसरा गया मतलब केस ख्त्म।

क्यों नहीं आती विसरा रिपोर्ट
कभी कभी आंखों के सामने वारदात का सही चेहरा आ जाता है, उसके बाद भी विसरा जांच के लिए क्यों भेजा जाता है? इसकी सही वजह कोई बताए या न बताए लेकिन दैनिक जागरण आई नेक्स्ट इसका खुलासा जरूर करेगा। दरअसल बड़े मामलों में वारदात के बाद मैनेजर(आरोपियों को बचाने वाले) एक्टिव हो जाते हैैं। एक पक्ष को बचाने के लिए इनके पास केवल विसरा जांच का रास्ता होता है। विसरा जांच के लिए गया तो समझिए कि पूरा मामला ठंडे बस्ते में चला गया। संबंधित थाना, पोस्टमार्टम और लैब तक की सेटिंग कर एक पक्ष को फायदा पहुंचाने का काम किया जाता है।
1: &सैंपल नॉट फाउंड&य
चकेरी में मार्च 2020 में सनसनीखेज वारदात में मां-बेटे की हत्या की गई थी। कमरे के अंदर डेडबॉडी मिली थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह स्पष्ट नहीं हुई तो विसरा लेकर जांच के लिए फोरेंसिक लैब भेज दिया गया लेकिन जांच रिपोर्ट आज तक नहीं आई। सीनियर ऑफिसर्स के आदेश पर विवेचक कई बार रिमांइडर भेज चुके हैं। इसके बाद भी रिपोर्ट नहीं आई। तीन बार रिमाइंडर के जवाब में &सैंपल नॉट फाउंड&य लिखकर भेजा गया। मामले में कई विवेचक बदल चुके हैैं। आज तक मर्डर की गुत्थी नहीं सुलझी।


2: एक साल से रिपोर्ट का इंतजार
बाबूपुरवा स्थित एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में मुनीम मिर्जापुर जिगना निवासी लवकुश यादव का संदिग्ध हालात में शव मिला था। जांच में हत्या की पुष्टि हुई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक हत्यारों ने मारपीट के बाद हाथ से गला घोंटकर उसकी हत्या की। पीठ और पेट मे अंदरूनी चोटें मिलीं, लेकिन मौत की सही वजह नहीं मिल पाई। इस पूरे मामले में विवेचक ने बिसरा रिपोर्ट जांच के लिए भेजी। एक साल से ज्यादा हो गया, लेकिन रिपोर्ट नहीं आ सकी।

3: सैंपल इज डेस्ट्रायड
बाबूपुरवा के ढकना पुरवा में कैटरिंग का काम करने वाली युवती की 2020 में दीपावली के ठीक पहले संदिग्ध हालात में मौत हो गई। भाई ने पड़ोस में रहने वाली सहेलियों पर गलत इलाज कराने और झाड़ फूंक कराने का आरोप लगाया है। पुलिस ने दोनों सहेलियों को पूछताछ के लिए थाने बुलाया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की सही वजह न आने के कारण विसरा जांच के लिए भेजा गया। इस केस में तीन विवेचक बदल गए। सभी ने रिमाइंडर भेजे लेकिन लास्ट रिपोर्ट &सैैंपल इज डेस्ट्रायड&य की आई तो फाइल बंद कर दी गई।

4: न रिपोर्ट आई, न वजह पता चली
फरवरी 2020 में महाराजपुर थानाक्षेत्र के टौंस में पिता पुत्र की डेडबॉडी मिली थी। दोनों की शिनाख्त पुलिस ने नर्वल निवासी सुरेंद्र और सुंदर के नाम से हुई थी। पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत की वजह का पता नहीं चल पाया। जिसकी वजह से विसरा सुरक्षित कर जांच के लिए भेजा गया। एक साल से ज्यादा का समय हो गया। लेकिन विसरा रिपोर्ट नहीं आ सकी।


केस की दिशा तय करने में अहम
शहर के कई मामलों की जांच कर रहे विवेचकों ने बताया कि विसरा रिपोर्ट किसी भी मामले को निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए बहुत जरूरी है। बड़े मामलों की पेंडेंसी बढऩे पर 15-15 दिन के अंतर पर तीन रिमाइंडर भेजे जाते हैैं। ऐसे में जो भी रिपोर्ट लैब से आती है, उसके मुताबिक कार्रवाई की जाती है। अगर रिपोर्ट नहीं आती तो पार्ट में चार्जशीट लगाई जाती है। जिसका सीधा फायदा आरोपी को मिलता है।

क्या होता है विसरा
किसी व्यक्ति की मौत के बाद मौत की वजह को पता लगाने के लिए मृतक के शरीर के कुछ आंतरिक अंगों को सुरक्षित रखा जाता है, इसे विसरा कहते हैं। बिसरा की केमिकल टेस्टिंग करने के बाद मौत की वजह स्पष्ट हो जाती है। विसरा सैम्पल की जांच फॉरेंसिक साइंस लेबोरेट्री में होती है। किस अंग को कितना सुरक्षित रखना है यह भी निश्चित होता है। मृतक के शरीर से 100 ग्राम खून, 100 ग्राम पेशाब, 500 ग्राम लीवर सुरक्षित रखा जाता है जिससे बाद में जांच करने पर सही वजह पता की सके। सरल शब्दों में कहा जाए तो मानव शरीर के अंदरुनी अंगों जैये फेफड़ा, किडनी, आंत को विसरा कहा जाता है।

ऐसे भेजते हैं जांच के लिए नमूना
विसरा को तीन शीशे के जार में सुरक्षित रखा जाता है, एक में जितने भी पाचन तंत्र हैं उन्हें रखते हैं, दूसरे में ब्रेन, किडनी, लीवर और तीसरे में ब्लड को रखा जाता है। देश में प्वाइजनिंग इंफार्मेशन सेंटर बहुत कम हैं, जहां यह डाटा बनाया जा सके कि देश में कितने लोग जहर खाने से मर रहे हैं। यूपी में तो एक भी ऐसा सेंटर नहीं है।

विसरा रिपोर्ट में देरी का है यह खेल
पुलिस को किसी मामले में 90 दिन के भीतर चार्जशीट पेश करनी होती है। उससे पहले विसरा की रिपोर्ट आ जानी चाहिए। कुछ केसेस में छह महीने से ज्यादा समय लग जाता है। ऐसे में केस की कार्यवाही अटक जाती है। सूत्रों के अनुसार विसरा रिपोर्ट में लैब और पुलिस यानी दोनों की ओर से जानबूझ कर देर की जाती है। इसके चलते जांच लटकी रहती है। जांच पेंडिंग होने का सीधा लाभ आरोपी को मिलता है, कोर्ट में केस कमजोर होता है। कई मामलों में आरोपी से मिलीभगत कर पुलिस खुद ढीला डाल देती है।

संदिग्ध मौत पर होती है जांच
जब मृत्यु का कारण स्पष्ट न हो तब पोस्टमार्टम करवाया जाता है। सडक़ दुर्घटना, गोली लगने या गंभीर चोट के कारण मृत्यु होती है तो वहां पोस्टमार्टम में कारण स्पष्ट हो जाता है। अगर मौत संदिग्ध परिस्थिति में हो और अंदेशा हो कि जहर या अन्य किसी कारण मौत हुई है तो विसरा की जांच की जाती है। जहर देने की आशंका हो तो विसरा की जांच की जाती है। डेड बॉडी अगर नीली पड़ी हुई हो, जीभ, आंख, नाखून आदि नीला पड़ा हुआ हो या मुंह से झाग आदि निकलने के निशान हों तो जहर देने की संभावना रहती है। तब पोस्टमॉर्टम के बाद डेड बॉडी से विसरा निकाला जाता है।


विसरा जांच: फैक्ट फाइल
भेजे गए सैैंपल : 94
गंभीर मामले : 69
रिपोर्ट आई सिर्फ: 03
रिमाइंडर भेजे गए : 69
सैैंपल डेस्ट्रायड: 31
सैैंपल आर नॉट फाउंड : 29
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जो विसरा जांच के लिए आता है। उसकी जांच नंबर के मुताबिक की जाती है। विसरा को सुरक्षित रखने के सारे प्रयास किए जाते हैैं। कुछ सैैंपल कैरी करने के दौरान डिस्टर्ब हो जाते हैैं, कोशिश की जाती है कि रिपोर्ट समय से भेजी जाए।
डॉ। आनंद कुमार शर्मा, फोरेंसिक लैब, आगरा

Posted By: Inextlive