- जेल मुख्यालय लखनऊ में सहेजी गई क्रांतिकारियों से जुड़ी यादें

LUCKNOW : देश की आजादी में अपना सर्वस्व न्योछावर करने वाले अमर शहीद किन परिस्थितियों में जेल में रहे, यह अब आम जनता भी जान सकेगी। इसके लिए प्रदेश में पहली बार एक म्यूजियम बनाया गया है। इस म्यूजियम को पर्यटन से भी जोड़ा जा रहा है, ताकि अधिक से अधिक बच्चे स्वतंत्रता सेनानियों ने जेल में किस तरह अपने दिन बिताए, ये जान सकें। यह म्यूजियम जेल मुख्यालय लखनऊ में बनाया गया है।

एक दीवार काकोरी के क्रांतिकारियों के नाम

इस म्यूजियम में यूपी की विभिन्न जेलों से लाई गई सामग्री रखी गई है। इस म्यूजियम की एक दीवार काकोरी के क्रांतिकारियों को समर्पित की गई है। इस दीवार पर काकोरी कांड में शामिल क्रांतिकारियों के जीवन, उनके पत्रों एवं अन्य सामान को सहेजा गया है। वहीं दूसरी दीवार पर बड़े राजनेता, स्वाधीनता संग्राम सेनानियों की तस्वीर और उनके जीवन से संबंधित सामग्री लगाई गई है।

देखें बिस्मिल से जुड़ी ये यादें

म्यूजियम में पं। राम प्रसाद बिस्मिल की कंघी, बर्तन, चप्पल, कुर्ता तो आप देख ही सकते हैं। साथ ही यहां आपको वह कंटेनर भी देखने को मिल जाएगा जिसमें उनकी मां ने उनके लिए देसी घी भेजा था।

30 किलो की बेडि़यां

इस म्यूजियम में आप पं। राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान, ठाकुर रोशन सिंह, राजेंद्रनाथ लहरी और सचिंद्रनाथ सान्याल को पहनाई गई 30 किलो की बिडि़यां देख सकते हैं। यहां बिस्मिल की लिखी एक कविता की प्रति और अशफाकउल्ला खान, बिस्मिल, लाहरी को दिए गए मृत्युदंड की प्रति भी देख सकते हैं। इस म्यूजियम में 5 किलो से 35 किलो तक की बेडि़यां दर्शकों के लिए रखी गई हैं।

बाक्स

ये हैं मुख्य आकर्षण

- वे चरखे जिन्हें क्रांतिकारियों ने चलाया था

- क्रांतिकारियों द्वारा बनाई गई दरी एवं चादरें

- उस दौर की हथकडि़यां, बेडि़यां, जंजीरें

- फांसी का फंदा

- क्रांतिकारियों द्वारा लिखे गए पत्र और किताबें

नोट- यहां आप जेल में अपनाया जाने वाला पुराना सिक्योरिटी सिस्टम भी देख सकते हैं।

बाक्स

अन्य प्रमुख आकर्षण

- सचिंद्रनाथ सान्याल को जापान से 17 जुलाई 1938 को बरेली सेंट्रल जेल भेजा गया रास बिहारी बोस का पत्र

- 95 साल पुरानी फांसी देने में यूज होने वाली रस्सी, जिससे 50 से अधिक लोगों को बरेली जेल में फांसी दी गई।

- जेल में कैदियों को जिन तांबे और एल्युमिनियम के बर्तन में खाना दिया जाता था।

- 1888 की वह आटे की चक्की, जिसका यूज जेल में कैदी करते थे।

Posted By: Inextlive