मां कुष्मांडा देवी शीतला माता समेत सभी दुर्गा मंदिरों में तैयारी जोरों पर नवरात्र कल से बांस-बल्लियों से की जा रही बैरिकेडिंग


वाराणसी (ब्यूरो)शक्ति की आराधना के पर्व चैत्र नवरात्रि की शुरुआत मंगलवार से होगी। सात वार नौ त्योहार वाली काशी में मां की आराधना के लिए देवी मंदिरों में तैयारी शुरू हो गई है। नव संवत्सर के साथ शुरू होने वाले चैत्र नवरात्र में माता के नौ गौरी स्वरूप का पूजन-अर्चन करने का विधान है। इनमें पहले मां शैलपुत्री देवी का भक्त दर्शन कर व्रत की शुरुआत करते हंै। काशी में देवी गौरी के नौ रूपों का मंदिर अलग-अलग स्थानों पर स्थित है। इन मंदिरों का अलग ही महात्म्य है.

मां शैलपुत्री का दरबार

नवरात्र के पहले दिन अलईपुरा स्थित मां शैलपुत्री मंदिर में दर्शन-पूजन का विधान है। इस दिन हजारों भक्तों की भीड़ मां के दरबार में होती है। इसको देखते हुए मंदिर के पास साफ-सफाई और बैरिकेडिंग का कार्य शुरू हो गया है। मां का दर्शन करने के लिए भोर से भक्तों की कतार लग जाती है, क्योंकि मां दर्शन करने से न सिर्फ कष्ट दूर होते बल्कि सारी मनोकामनाएं मां पूरी करती है.

मां पार्वती का स्वरूप है माता

ऐसी मान्यता है कि मां शैलपुत्री शैलराज हिमालय की पुत्री और माता पार्वती की स्वरूप हैं। ऐसा कहा जाता है कि एक बार माता भगवान भोले से नाराज होकर काशी चली आई थीं। उसके बाद भगवान भोलेनाथ उन्हें ढूंढते हुए काशी आए। लेकिन, देवी को यह नगरी इतनी पसंद आई कि उन्होंने वरुणा तट के किनारे ही अपना निवास बना लिया और यही विराजमान हो गईं.

संकट हरने वाली है मां संकटा

चौक से घाट की ओर जाने वाले रास्ते मां संकटा का मंदिर है, जहां पर दर्शन करने से जीवन में आने वाले सभी कष्ट खत्म हो जाते हैं। पूरे विश्व में मां का एक ही मंदिर है और कहीं नहीं है। धार्मिक मान्यता है कि जब मां सती ने आत्मदाह किया था तो भगवान शिव बहुत व्याकुल हो गये थे। भगवान शिव ने खुद मा संकटा की पूजा की थी। इसके बाद भगवान शिव की व्याकुलता खत्म हो गई थी और मां पार्वती का साथ मिला था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पांडवों जब अज्ञातवास में थे तो उस समय वह आनंद वन (काशी को पहले आनंद वन भी कहते थे) आये थे और मां संकटा की भव्य प्रतिमा स्थापित कर बिना अन्न-जल ग्रहण किये ही एक पैर पर खड़े होकर पांचों भाईयों ने पूजा की थी। इसके बाद मां संकटा प्रकट हुई और आशीर्वाद दिया कि गो माता की सेवा करने पर उन्हें लक्ष्मी व वैभव की प्राप्ति होगी। पांडवों के सारे संकट दूर हो गए.

मां दुर्गा के दर्शन से धुल जाते पाप

दुर्गाकुंड जाने पर लाल पत्थरों से बना मंदिर दिखे तो समझ जाइए आ गए मां के दरबार में। इस भव्य मंदिर के एक तरफ दुर्गाकुंड है। इस मंदिर में माता दुर्गा यंत्र के रूप में विराजमान है। मंदिर के निकट ही बाबा भैरोनाथ, लक्ष्मीजी, सरस्वतीजी, और माता काली की मूर्तियां अलग से मंदिरों में स्थापित हैं। मंदिर में देवी का तेज इतना अधिक है कि मां के सामने खड़े होकर दर्शन करने मात्र से ही कई जन्मों के पाप जलकर भस्म हो जाते हैं। इस मंदिर का निर्माण 17वीं शताब्दी में रानी भवानी ने कराया था। यह मंदिर नागर शैली में निर्मित किया गया। मान्यता है कि शुंभ-निशुंभ का वध करने के बाद मां दुर्गा ने थककर इसी मंदिर में विश्राम किया था.

अभिजीत मुहूर्त में कलश स्थापना

ज्योतिषाचार्य बब्बन तिवारी ने बताया, कलश स्थापना का कार्य वैधृति में निषेध होने से अभिजीत मुहूर्त में मंगलवार को दिन में 11:35 से दिन में 12:24 तक है.

कब कौन सा विशेष योग

9 अप्रैल - अमृत सिद्धि योग रवि योग

10 अप्रैल - सर्वार्थ सिद्धि योग मध्य रात्रि में रवि योग के साथ

11 अप्रैल - रवि योग

13 अप्रैल - रवि योग

15 अप्रैल - सर्वार्थ सिद्धि योग मध्य रात्रि में

16 अप्रैल - सर्वार्थ सिद्धि योग एवं रवि योग

Posted By: Inextlive