कुमाऊं मंडल में बैठकी होली पौष माह के पहले संडे से शुरू हो जाती है जो देर शाम तक यह चलती है। बैठकी होली शास्त्रीय संगीत की बैठकों की तरह होते हुए भी लोगों से इस प्रकार जुड़ी रहती है कि उस महफिल में बैठे लोग अपने को कलाकार या गायक के तौर पर प्रस्तुत करता है। यानी मंच और श्रोता के बीच कोई दूरी नहीं होती है। तमाम रागों से सजी बैठकी होली की इस परंपरा में अनगिनत ऐसे गीत हैं। जिन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी गाया जा रहा है।

-कुमाऊं की फेमस बैठकी होली अब दून में भी छोड़ रही है अपनी छाप
-जहां होली से कई दिन पहले से शुरू हो जाते हैं होली के गीत

देहरादून, 21 मार्च (ब्यूरो)।
राजधानी दून में भी इन दिनों हर जगह होली की धूम है। लेकिन, कई स्थानों पर सफेद व लाल साड़ी में होली के पारंपरिक गीतों के साथ कई टोलियां नजर आ रही हैं। जिनके हाथों में ढोलक और जुबां पर शानदार पारंपरिक गीत भी। जी हां, यही कुमाऊंनी बैठकी होली है। जहां महिलाएं बैठक कर होली के गीत गाते हैं और इनको होलियार कहते हैं।

खास पहचान रखती है बैठकी
दरअसल, कुमाऊं की बैठकी होली का देशभर में खासी पहचान है। होली के कई दिन पहले ही सफेद और लाल कलर की साड़ी में होली के गीत गाकर होली मनाने वाले होलियार का खासकर कुमाऊं में ही प्रचलन रहा है। लेकिन, कुमाऊं के लोग अब दून में नौकरी और अन्य कारोबार में शामिल होने के कारण प्रवास करने लगे हैं। जाहिर है कि होली की ये कला संस्कृति भी अब पिछले कई सालों से दून में बढ़ते जा रही है। होली के दौरान होली के गीत गाने वाली इन महिला-पुरुषों टोलियों को बैठकी होली कहा जाता है। जिसमें तमाम प्रकार की होली संबंधी गीत भी गाए जाते हैं। बताया गया है कि अल्मोड़ा की शास्त्रीय संगीत पर आधारित होली गायन की परंपरा है। हालांकि, उत्तराखंड में खड़ी और बैठकी यानि दो प्रकार से होली मनाए जाने की परंपरा है। लेकिन, कुमाऊं की बैठकी होली की खासियत कुछ और है। पारंपरिक परिधान में सजे होलियार होली के कई दिन पहले से ही तमाम इलाकों में पहुंचकर होली के गीत गाते हैं।

बैठकी होली की विशेषता
बैठकी होली से जुड़े लोगों का कहना है कि बैठकी होली शास्त्रीय संगीत पर आधारित है। दिन से लेकर देर शाम, कई बार पूरी रात तक लोग होली का गायन करते हैं। कुमाऊंनी संस्कृति में बैठकी होली का अलग ही महत्व है। माना जाता है कि 15वीं शताब्दी से यहां होली गायन की इस परंपरा की शुरुआत हुई। चंद वंश के शासनकाल में यह चंपावत से शुरू हुई और धीरे-धीरे सभी जगह फैल गई। बैठकी होली भगवान गणेश के पूजन से शुरू होती है।

सफेद और लाल साड़ी ही क्यों?
बबीता शाह लोहानी बताती है कि कुमाऊं में काला रंग निषेध माना जाता है। होली को खास बनाने के लिए महिलाओं की टोली सफेद व लाल रंग की साड़ी पहनती है। जिसमे सफेद साड़ी में लाल रंग का बॉर्डर होता है। सफेद साड़ी पहनने का कारण प्रकृति के सभी रंगों को होली के रंग में समाहित करना है।

गाए जाते हैं गीत
सिद्धि को दाता, विघ्न विनाशन, होली खेलें गिरिजापति नंदन
ठाडी भरूं राजा राम जी देखें बैठी भरूं भीजे चुनरी जल कैसे।

रामायण-महाभारत का वर्णन
राग-दादरा और राग कहरवा में गाये जाने वाले होली के गायन पक्ष में कृष्ण राधा राजा, हरिशचन्द्र, श्रवण कुमार समेत रामायण और महाभारत काल की गाथाओं का वर्णन किया जाता है। उत्तराखंड में 3 तरह की होली मनाई जाती है। इस होली मेंं सर्वधर्म के लोग भी भाग लेते रहे है।


बैठकी होली वसंत पंचमी के दिन से शुरू हो जाती है। इसमें होली पर आधारित गीत घर की बैठक में राग रागनियों के साथ हारमोनियम और तबले पर गाए जाते हैं। बैठकी होली के सामाजिक शास्त्रीय संदर्भों के बारे में गहराई से अध्ययन किया जाता है।
बबीता शाह लोहानी, सचिव, हमारी पहचान रंगमंच संस्था
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Posted By: Inextlive