यदि क्लॉक टॉवर देहरादून का दिल है तो पलटन बाजार को दिल तक पहुंचने वाली मुख्य धमनी कहा जा सकता है। पलटन बाजार खुद में एक हेरिटेज है। यदि देहरादून आकर किसी ने पलटन बाजार नहीं देखा तो समझो कुछ भी नहीं देखा। दैनिक जागरण आईनेक्स्ट के बिसार दी विरासत अभियान में आज हम आपको दून के ऐतिहासिक पलटन बाजार की सैर करवाएंगे।

देहरादून ब्यूरो। दून के जिस मार्केट को हम आज पलटन बाजार के रूप में जानते हैं और जो आज दून का मुख्य बाजार के रूप में पहचान बना चुका है, पहले वह राजपुर रोड का हिस्सा था। सहारनपुर रोड का निर्माण अंग्रेजों ने 1822 में करवाया था। इसके लिए मोहंड के पास टनल बनाई गई। टनल से यह रोड दून में पहुंचती थी। यहां दर्शनी गेट से इसका नाम राजपुर रोड था। धामावाला गांव होते हुए राजपुर रोड मौजूदा क्लॉकटावर से होकर राजपुर तक जाती थी। यानी जो आज पल्टन बाजार है, वह 1862 तक राजपुर रोड था।

राजपुर था प्रमुख व्यापारिक केन्द्र
मोटर मार्ग राजपुर तक था। राजपुर से आगे जौनसार बावर, जौनपुर रंवाई और टिहरी के कई क्षेत्रों के साथ ही उत्तरकाशी के लिए राजपुर से पैदल यात्रा शुरू हो जाती थी। राजपुर में होटल, खाने-पीने ढाबे, रात्रि विश्राम की सभी व्यवस्थाएं थी। लोग यहां से जरूरत का सामान ले जाते थे। बाद में मसूरी रोड बनी तो राजपुर एक तरह से खत्म हो गया। बाद में तिब्बती शरणार्थियों ने राजपुर को फिर से काफी हद तक आबाद करने का प्रयास किया।

1864 में बना छावनी
1964 में अंग्रेजों ने इस रोड के पास ओल्ड सिरमौर बटालियन की छावनी बना दी। सैन्य छावनी के अलावा इस क्षेत्र के सैन्य अधिकारियों के आवास और घुड़साल भी बनाये गये। उधर परेड ग्राउंड में पहले से गोरखा बटालियन मौजूद थी। फौज के अलावा नाई, धोबी और अन्य काम करने वाले सिविलियन के लिए फालतू लाइन में जगह दी गई। दोनों बटालियनों के सैनिकों के लिए घंटाघर का हनुमान मंदिर, सब्जी मंडी की मस्जिद, फालतू लाइन में गुरुद्वारा और कचहरी में चर्च भी बनाये गये।

1874 में प्रशासन के हवाले
बाद में तंग जगह होने के कारण सेना ने पलटन बाजार खाली कर दिया और गढ़ी डाकरा में नई छावनी बना दी गई। 1974 में सेना ने इस प्रॉपर्टी को प्रशासनिक मुखिया सुपरटेंडेंट ऑफ दून एचजी रॉस को सौंप दिया। शर्त यह थी कि इस प्रॉपर्टी का नजराना सेना के खाते में जमा किया जाता रहेगा। रॉस ने इस प्रॉपर्टी के देखरेख की जिम्मेदारी नगर पालिका को सौंप दी। बताया जाता है कि नगर पालिका लंबे समय सेना के खाते में पलटन बाजार का नजराना जमा करवाती रही।

1923 के बाद बना बाजार
1923 तक आते-आते स्वतंता संग्राम जोर पकडऩे लगा था। यह उम्मीद की जाने लगी थी कि अंग्रेजों को देश छोडऩा पड़ेगा। ऐसे समय में राय बहादुन उग्रसेन ने नगर पालिका अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने पलटन बाजार की जमीन को खुर्द-बुर्द करना शुरू किया। काफी जमीन अपने नाम कर दी और बाकी नजून भूमि नियमावली के बावजूद औने-पौने दामों पर व्यापारियों के बेच दी। व्यापारियों ने पलटन के भवनों को अपनी तरह से तोड़-मरोड़ कर दुकानें बनानी शुरू कर दी और देखते ही देखते पलटन बाजार एक बड़ा व्यावसायिक केंद्र बन गया।

अब एकरूपता देने की कवायद
हाल के वर्षों में पलटन बाजार को स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत नये सिरे से सजाने संवारने की कवायद चल रही है। इस प्रोजेक्ट के तहत कुछ काम भी हुआ है। मुख्य रूप से सीवर लाइन, पेयजल लाइन और नालियां बनाने का काम किया गया। रोड पर टाइल्स भी लगाई गई हैं। इसके अलावा एकरूपता देने के लिए सभी दुकानों के साइनबोर्ड और छज्जों को एक रंग में रंगने का प्रयास किया जा रहा है। जन विज्ञान के विजय भट्ट कहते हैं कि पुराने छज्जों को तोड़कर एकरूपता के नाम पर पलटन बाजार को बदसूरत बनाया जा रहा है।

Posted By: Inextlive