दु:ख भूलकर दूसरों का दर्द दूर किया

Updated Date: Thu, 23 Jan 2014 05:16 PM (IST)

DEHRADUN : कौन कहता है कि आसमान में सुराख हो नहीं सकता एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों. यह पक्तियां 24 वर्षीय ममता रावत के ऊपर बहुत सटीक बैठती हैं. सिर से पिता का साया बचपन में ही उठ जाने के बाद कुदरत ने ऐसा कहर बरपाया कि सब कुछ तबाह हो गया. इसके बाद भी ममता ने हार नहीं मानी 16-17 जून 2013 को आई त्रासदी में अपना दु:ख भूल कर दूसरों के दर्द में शरीक होकर हाथ बटाने में पूरी कोशिश की. ममता की इस बहादुरी से एनआईएम उत्तरकाशी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनयरिंग भी प्रभावित है.


कुदरत ने बरपाया कहरममता रावत उत्तरकाशी के भैंकुली की रहने वाली है। 2012 में असी गंगा में बाढ़ आने से ममता का पूरा मकान बाढ़ की चपेट में आ गया। खेत-खलिहान तबाह हो गए। फिर क्या था ममता ने खुद ही अपनी पीड़ा को सहने का बीड़ा उठाया। एनआईएम ने मदद के तौर पर रातें गुजारने के लिए तिरपाल मिली। घर में मां, भाई-भाभी और छोटा भतीजा है। सबकी तबियत अक्सर खराब रहती है। 24 साल की उम्र में ही सभी का जिम्मा ममता का जिम्मे आ गया। आपदा में मदद के लिए ममता को बकायदा मुंबई से सम्मान के लिए 15 अगस्त को पहुंचने का बुलावा भी आया।आपदा में लोगों की भरपूर मदद
जून महीने में आई आपदा के दौरान करीब से दर्द को पहचाने वाली ममता से रहा नहीं गया। ममता ने राहत कैंप्स से प्रभावितों तक दिन-रात राहत सामग्रियां पहुंचाई। उन्होंने घर-घर तक  अकेले कंबल, खाद्य सामग्री और पानी प्रभावितों तक पहुंचाया। सबसे बड़ी बात ये रही कि आपदा के दौरान राहत सामग्री लेकर जो मददगार और संस्थाओं के मददगार दूसरे राज्यों या शहरों से उत्तरकाशी जिले में पहुंचे थे। या फिर प्रभावितों को रहने के लिए दिक्कतें हो रही थी, उन्हें ठहरने के लिए ठौर-ठिकाना मिल पाना इतना आसान नहीं था, लेकिन ममता ने ऐसे लोगों को अपने पशु हॉस्पिटल के मिले एक कमरे में ही ऐसे लोगों को रात्रि विश्राम दिलवाया। यही नहीं प्रभावितों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने में भी पूरी मदद की। दु:ख भूलकर दूसरों का दर्द दूर कियाकौन कहता है कि आसमान में सुराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों। यह पक्तियां 24 वर्षीय ममता रावत के ऊपर बहुत सटीक बैठती हैं। सिर से पिता का साया बचपन में ही उठ जाने के बाद कुदरत ने ऐसा कहर बरपाया कि सब कुछ तबाह हो गया। इसके बाद भी ममता ने हार नहीं मानी, 16-17 जून 2013 को आई त्रासदी में अपना दु:ख भूल कर दूसरों के दर्द में शरीक होकर हाथ बटाने में पूरी कोशिश की। ममता की इस बहादुरी से एनआईएम उत्तरकाशी (नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ माउंटेनयरिंग) भी प्रभावित है। रेस्क्यू व सर्वाइवल की दी ट्रेनिंग


आपदा की इस घड़ी में आगे भी ऐसी परिस्थितियों का सामना न करना पड़े। बीएसएफ ने इंटरनेशनल माउंटेनियर्स लवराज धर्मशक्तू के गाइडेंस में कोटमा गांव में वन वीक का रेस्क्यू एवं सर्वाइवल ट्रेनिंग कैंप का आयोजन किया गया। बीएसएफ डीसी लवराज धर्मशक्तू वह अधिकारी हैं, जिन्होंने पांच बार दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फतह किया है। इसमें यहां के युवाओं, स्टूडेंट्स ने बीएसएफ के इन जांबाज सैनिकों व अफसरों से नदी-नालों को कैसे पार किया जाए, कैसे पर्वतों को पार किया जाए और कैसे टरलिन ट्रेवल्स की हेल्प से प्रभावित लोगों व सामग्रियों को पार किए जाए, इसकी बारीकियों से लोगों को अवेयर किया ताकि भविष्य में इस प्रकार की आपदा की सामना किया जा सके।

Posted By: Inextlive
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