वर्चुअल व‌र्ल्ड में खोकर बदल गए खुशियों के मायने

2019-07-16T06:00:44Z

डिजीटल होती जा रही खुशियां

फोटो का क्रेज जिंदगी भी डाल रहा रिस्क में

देहरादून।

वर्चुअल व‌र्ल्ड लोग आज इतना खो चुके हैं कि खुशियों के मायने ही बदलने लगे हैं। खुशियां अब डिजिटल होती जा रही हैं। लोग अपने परिवार और दोस्तों के साथ टूर को एंज्वॉय करने की जगह सोशल साइट्स पर फोटो अपडेट करने में वक्त बिता रहे हैं। यही नहीं फोटो पर लाइक्स और कमेंट कम आने पर टेंशन में भी आ जाते हैं। ऐसे लोग इमोशनली वीक हो रहे हैं तो फोटो के लिए अपनी जिंदगी भी जोखिम में डाल ले रहे हैं।

आंख से नहीं लैंस से देख रहे दुनिया

इन दिनों लोग दुनिया आंखों से नहीं बल्कि लैंस से देख रहे हैं। फोटो खींचने की होड़ में अपने साथ वालों के साथ उन पलों को एंज्वॉय नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में खुशियां सिर्फ दिखावे जैसी होती जा रही हैं। यही नहीं लोग देश-विदेश की सैर कर आने के बावजूद उन लोकेशंस को करीब से नहीं जान पा रहे हैं। बल्कि वहां के बारे में कुछ पूछने पर सिर्फ क्लिक की गई पिक्चर्स टटोलने लगते हैं।

नई चीजों की भी नहीं खुशियां

बात सिर्फ घूमने की ही नहीं है बल्कि किसी के पास कोई नई चीज आती है तो उसकी फोटो खींचकर सबसे पहले सोशल साइट पर अपडेट की जाती है। और लोगों द्वारा तारीफ करने पर ही खुशी होती है। जबकि पहले तक कोई भी नई चीज खरीदने पर सबसे पहले परिवार वालों के साथ लोग उस पल को एंज्वॉय करते थे। आस-पड़ोस में मिठाई बांटी जाती थी। लेकिन अब इन बातों से किसी को कोई मतलब नहीं रहा।

ऐसे-ऐसे मामले

केस नंबर-1

आरिफा स्पॉट पर सेल्फी ले रही थी। खूबसूरत वादियों को मोबाइल में कैद कर रही थी। तभी पैर फिसला, गनीमत रही कि ग्रुप के साथियों ने उसे बचा लिया। नहीं तो जरा सी चूक खतरनाक हो सकती थी।

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केस नंबर-2

मिली ने नई कार खरीदी। जिसे लेकर घर भी नहीं पहुंची थी कि पहले ही फोटो सेशन शुरू कर दिया। सोशल साइट पर फोटो अपलोड कर दिए। परिवार वालों को भी सोशल साइट से ही पता चला कि मिली ने नई कार ले ली है। मिली भी घर से पहले सहेलियों के साथ घूमने निकल गई। जिस पल को परिवार वालों के साथ बांटना था, वो खुशी उन्हें नहीं मिल पाई।

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शिफ्ट हो जाता है फोकस

मनोवैज्ञानिकों की मानें तो ऐसे में फोकस शिफ्ट हो जाता है। जो पल अपनों के साथ जीने के होते हैं उसे वर्चुअल व‌र्ल्ड में जिया जाता है और खुश्यिां भी वहीं तलाशी जाती हैं। ऐसे में यदि कोई ऐसा कमेंट आ जाए जो पसंद न आए तो तनाव भी होने लगता है।

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ऐसे लोग इमोशनली वीक होने लगते हैं। उन्हें हर खुशी सिर्फ वर्चुअल व‌र्ल्ड में नजर आती है। जो कि कहीं न कहीं नुकसानदायक भी है। दरअसल लोग जिंदगी के असली पलों को जीना भूल गए हैं।

-डा। श्रवि अमर अत्री, साइकोलोजिस्ट

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इन बातों का रखें ध्यान

हालांकि पिक्स सोशल साइटस पर अपलोड करने में बुराई भी नहीं है। लेकिन उन पलों को परिवार के साथ इंजॉय करना भी बेहद जरूरी है। हर चीज को दिखावे के लिए न करें। दोस्तों के साथ बांटे दुनिया के नही।


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