मन की स्वतंत्रता है संन्यास तो फिर मन क्या है? ओशो से जानें

2018-12-05T10:31:59Z

संन्यास क्या है? संन्यास मन की स्वतंत्रता है। यदि तुम मन को नहीं समझते हो तो संन्यास को समझना भी कठिन होगा। मन अतीत का संग्रह है।

प्रश्न: ओशो! आपने कहा है कि हमें दूसरों के साथ संबंध नहीं जोड़ना चाहिए, लेकिन हममें से अधिकतम लोग जो पश्चिम से हैं, वहां हमारे मित्र और संबंधी हैं, हमने यहां जो कुछ पाया है, उसे उनके साथ बांटकर हम उन्हें अपना सहभागी बनाना चाहते हैं। संन्यास के बारे में हमें उन्हें क्या बताना चाहिए? आपके बारे में हमें उन्हें क्या बताना चाहिए? और जो स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता है, उसे हम कैसे अभिव्यक्त कर सकते हैं?

कुछ बातें ऐसी हैं, जिन्हें बताया नहीं जा सकता, तुम मौखिक रूप से उन्हें नहीं बता सकते। पर ऐसी बातों को बांटने का एक उपाय है और वह है तुम्हारे स्वयं के अस्तित्व के द्वारा। लोगों को यह बताने के लिए कि संन्यास क्या होता है, केवल एक ही उपाय है कि तुम स्वयं एक सच्चे संन्यासी बनो। यदि तुम एक संन्यासी हो तो तुम्हारा पूरा सन्यस्त अस्तित्व ही वह सबकुछ कहेगा, जो शब्दों में नहीं कहा जा सकता है। यदि तुम वास्तव में एक संन्यासी हो तब तुम्हारी पूरी जीवन-शैली इतनी प्रेरणादायक बन जाएगी कि जिसका विचार भी नहीं किया जा सकता है। जो जीवंत है, उसे कहा नहीं जा सकता। भाषा उसे अभिव्यक्त करने में शक्तिहीन है। भाषा केवल मृत तथ्यों को ही बतला सकती है। तुम संन्यास के बारे में कुछ बातें बता सकते हो, लेकिन वह सत्य न होगा।

तुम संन्यास के बारे में कोई बात कैसे बता सकते हो? संन्यास तो एक आंतरिक खिलावट है, वह तो एक आंतरिक स्वतंत्रता है, वह तो भीतरी परमानंद है और वह एक वरदान है। निश्चित रूप से तुम संन्यास के बारे में बता सकते हो, लेकिन यह बताना तुम्हारे शब्दों से नहीं तुम्हारे अस्तित्व के द्वारा होगा, तुम्हारे प्रमाणिक अस्तित्व के द्वारा, तुम कैसे चलते हो, तुम कैसे बैठते हो, तुम कैसे देखते हो, तुम्हारी आंखें, तुम्हारा पूरा शरीर और तुम्हारी श्वास... अपने प्रमाणिक अस्तित्व द्वारा ही तुम उसे बांटोगे। तुम्हारे चारों तरफ का मौन, तुम्हारा निरंतर बढ़ता हुआ परमानंद ही सबकुछ बता देगा। तुम्हारी प्रेम तरंगे तुम्हारे बारे में सबकुछ बता देंगी और केवल वे ही बता सकती हैं। केवल एक ही उपाय है कि संन्यासी बनो।

संन्यास क्या है? संन्यास मन की स्वतंत्रता है। यदि तुम मन को नहीं समझते हो, तो संन्यास को समझना भी कठिन होगा। मन, अतीत का संग्रह है। वह सब जो तुमने अनुभव किया है, वह सब जो तुमने जाना है, वह सब जो तुमने अभी तक जिया है, वह सब जिससे अब तक तुम गुजर कर आए हो, वह सब तुम्हारी स्मृति में एकत्रित हो गया है और यह संग्रहित अतीत ही मन है। चूंकि संग्रहीत अतीत ही मन है, इसलिए मन हमेशा मृत होता है, क्योंकि वह अतीत को ढोता है। वह हमेशा मुर्दा बना रहता है, वह कभी भी जीवंत नहीं होता है। जब भी कोई चीज मृत हो जाती है, वह मन का एक भाग बन जाती है। वह ठीक उस धूल की भांति है, जो यात्रा के दौरान एक यात्री के वस्त्रों पर जम जाती है।

संन्यास है: अतीत से मुक्त हो जाना और इसी क्षण में जीना। अतीत का बोझ अपनी खोपड़ी में लादे हुए न चलना ही संन्यास है। क्षण-क्षण में जीना, अतीत के प्रति मृत हो जाना जैसे मानो वह कभी था ही नहीं... मानो तुम्हारा एक नया जन्म हुआ है। प्रत्येक क्षण युवा, नूतन और निर्मल बने रहो। यदि तुम अतीत की धूल इकट्ठी करते हो तो तुम दिन-प्रतिदिन मंद और सुस्त होते चले जाओगे, तुम्हारी चेतना का दर्पण धूल से भरता चला जाएगा और तुम्हारा यह दर्पणरूपी अस्तित्व किसी भी चीज को प्रतिबिंबित करने में समर्थ न हो सकेगा।

संन्यास का अर्थ है: सभी बाधाओं को पार करना... अतीत की ओर देखकर यह समझना कि वह अब नहीं है और वह व्यर्थ है, एक बोझ है... उसे हटाकर अलग रख दो। तब तुम अभी और यहीं हो, वर्तमान में हो और इस प्रमाणिक क्षण में हो। संन्यास का अर्थ है समयातीत होकर रहना, न तो अतीत के द्वारा प्रभावित होना और न ही भविष्य के साथ कहीं दूर बह जाना। न तो अतीत का कोई भार हो और न भविष्य के लिए कोई कामना हो। संन्यास है लक्ष्यहीन और अकारण जीवंत होकर जीना। यदि कोई कहता है कि संन्यास परमात्मा को प्राप्त करने का एक साधन है, तो वह व्यर्थ की मूर्खतापूर्ण बात कहता है। संन्यास इच्छा प्राप्ति का साधन नहीं है।

संन्यास का अर्थ है इस तरह से जीना जैसे मानो तुमने संसार में सबकुछ प्राप्त कर लिया हो। अब कोई भी कामना नहीं है। चाहे तुम धन, शक्ति या प्रतिष्ठा की कामना करो अथवा परमात्मा या मोक्ष की कामना करो, इससे कोई भी फर्क नहीं पड़ता। मूलभूत बात तो एक सी है कि तुम कामना कर रहे हो।जब भी तुम कामना करते हो, तो भविष्य आ जाता है और जब भी भविष्य होता है तो वह कुछ और न होकर अतीत का ही एक प्रक्षेपण होता है। जब भी भविष्य होता है, वह एक संशोधित ज्ञात की सीमा में होता है।

ओशो

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