इं‍डिया के रिटेल सेक्टीर में रिलायंस बिग बाजार और स्पें सर जैसे कई बडे खिलाडी पहले से मौजूद हैं. भारती भी वालमार्ट के साथ मिलकर मैदान में मौजूदगी दर्ज करा चुकी है. जब इन कंपनियों ने मैदान में कदम खा था तो शोर मचा था कि छोटे रिटेलर्स बाजार से साफ हो जाएंगे.


वह बाजार से साफ हुए या नहीं रिलांयस के 100 से ज्यादा और स्पेंसर के कई दर्जन आउटलेट बंद हो चुके हैं. ताजा मामला दिल्ली स्थित रिलायंस औक स्पेंसर के आउटलेट बंद होने का है. वहीं छोटे दुकानदार अपना काम जारी रखे हुए हैं. एक नजर इस एफडीआई से होने वाले नफा नुकसान पर

Positive side of FDI

महंगाई हो सकती है कम
हाल ही में एक रिपोर्ट आई थी जिसमें कहा गया था कि देश में रोजमर्रा के सामानों के होलसेल और रिटेल रेट में 40 प्रतिशत तक का फर्क है. यानी जो दाम होलसेल में है रिटेल में उसके दाम बढ़कर लगभग डेढ़ गुने हो जाते हैं. देश में महंगाई बढ़ने का एक कारण यह भी है. एमआरपी यानी मैक्सिमम रिटेल प्राइस एक पैमाना भर है जिसे कुछ इस तरह तय किया जाता है कि डिस्ट्री ब्यूिशन चेन में शामिल हर किसी को अपना मार्जिन मिल सके. जो एक्चुिअल प्राइस और एमआरपी के बीच का फर्क है. इसी मार्जिन को लेकर सारी लडाई है.

किसानों का फायदा
भारत में फूड्स आइटम्स का बड़ा हिस्सा बर्बाद हो जाता है. अरबों रुपए की फल सब्जियां तो खेतों में ही बर्बाद हो जाती हैं. इसका हल किसी के पास नहीं है. यदि हम पॉजिटिव आस्पेक्ट पर नजर डालें तो रिटेल में एफडीआई का फायदा यहां हो सकता है. अपनी लागत घटाने के लिए रिटेल कंपनिय़ां खेतों से सीधे खाद्यान्न लाकर बेच सकती हैं. इससे एक सप्लाई चेन बनेगी जिससे अनाज, फल-सब्जियां सड़ने से बचेंगी.

Negative side of FDI

Employment पर असर
इंडिया में रिटेल  4 करोड़ लोग आश्रित हैं. इस क्षेत्र में विदेशी निवेश से इन के सामने संकट पैदा हो सकता है. इंटरनेशनल एक्सपिरियंस  के मुताबिक बड़े सुपर बाजार छोटे रिटेलरों को बाजार से बाहर कर देते हैं.

बाजार पर कब्जा
ग्लोबल रिटेल कंपनियां कीमतें अपने नियंत्रण में रखेंगी. जिससे जरूरी सामान, खाद्य पदार्थ भी उनके नियंत्रण में होगा. मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर से नौकरियां लगभग खत्म हो जाएंगी, क्योंकि यह कंपनियां बाहर से सामान खरीदेंगी ना कि घरेलू स्रोतों से. आबादी के 50 फीसदी लोग कृषि कार्यों से जुड़े हैं. गौरतलब है कि देश में 43 फीसदी जमीन पर खेती होती है.

हो जाएंगे dependent
खेती का जीडीपी में योगदान 18 फीसदी है. रिटेल में एफडीआई का असर इस क्षेत्र पर पडऩा तय है. देश में हजारों टन अनाज हर साल सड़ जाता है, स्टोरेज सुविधा बढऩे से इसे बचाया जा सकेगा. खतरा ये है कि ज्यादा पैदावार के चक्कर में किसान हाइब्रिड बीजों और केमिकल पर निर्भर हो जाएंगे.

बड़ा सवाल

दुनिया में फलों व सब्जियां पैदा करने के मामले में दूसरे नंबर पर है. हर साल फल सब्जियों का पैदावार 2 करोड़ टन होता है. इस वक्त देश में 5,386 कोल्ड स्टोरेज मौजूद हैं, लेकिन दुख की बात यह है कि 80 फीसदी में सिर्फ आलू रखे जाते हैं. आप कह सकते हैं कि इन्हें कोल्ड स्टोरेज नहीं बल्कि गोदाम कहा जाना चाहिए.

इस वक्त किसानों को अपने उत्पाद का सिर्फ एक तिहाई मूल्य मिलता है. मतलब एक रुपये में केवल 33 पैसे ही किसान के जेब में गिरते हैं. वहीं हॉर्टीकल्चर में उन्हें औसतन 12 से 15 फीसदी लागत ही मिलती है.  गौर करने की बात यह है कि किसान हर साल आलू औसतन 2 से 3 रुपए प्रति किलोग्राम बेचते हैं, जबकि कंज्यूमर को ये 10 से 12 रुपए प्रति किलो मिलते हैं.

देश में टमाटर उत्पादक किसानों को सिर्फ 30 फीसदी लाभ मिलता है, जबकि अन्य विकसित देशों के बाजार में यह मुनाफा 50 से 70 फीसदी तक होता है. ऐसे में क्या उन्हें एफडीआई का फायदा मिलेगा? यह बड़ा सवाल है.

Posted By: Kushal Mishra