आगरा. फोन के इस्तेमाल से रोकने पर झुंझलाहट जाते हैं, बिना फोन के आप कुछ देर भी नहीं रह सकते फोन में बैटरी खत्म होने वाली है, बैग में फोन है कि नहीं. फोन का नेट क्यों नहीं चल रहा, फोन कहीं छूट तो नहीं गया. ऐसे तमाम तरह के डर के अगर आप भी शिकार हैं, तो सावधान हो जाएं. आप नोमोफोबिया की गिऱफ्त में हैं. मोबाइल का अधिक यूज करने से होने वाली इस बीमारी के पीडि़त शहर में तेजी से बढ़ रहे हैं. इनके इलाज के लिए जिला अस्पताल में मन कक्ष बनाया गया है. यहां मोबाइल की लत के शिकार लोगों की काउंसिल करने के साथ ही उन्हें जरूरी ट्रीटमेंट दिया जा रहा है.

शारीरिक और मानसिक असर

मनोचिकित्सक डॉ. एसपी गुप्ता बताते हैं कि फोन का एडिक्शन लोगों के मन और शरीर दोनों पर असर डालता है. लोग स्मार्ट फोन पर डिपेंड होना शुरू हो जाते है. फोन न होने की स्थिति में खुद को रेस्टलेस महसूस करने लगते है. ऐसी स्थिति में इंसान में चिड़चिड़ापन, बैचेनी, गुस्सा, असंतोष आदि उत्पन्न होना शुरू हो जाता है. जो उसमें डिप्रेशन, स्ट्रेस और चिंता का घर बना लेता है. दुनिया भर में हुए सर्वे के दौरान 85 प्रतिशत लोगों ने स्वयं से स्वीकारा कि वह अपने फोन के बिना एक दिन भी नहीं रह सकते है. फोन न होने की स्थिति में उनको बेचैनी सी महसूस होने लगती है. मानो ऐसा लगता है कि कुछ छूट सा गया है. जिसके बिना नहीं रह पा रहे है.

कंप्यूटर विजन सिंड्रोम के शिकार

अमेरिका की विजन काउंसलि के सर्वे के दौरान पाया गया कि 70 प्रतिशत लोग मोबाइल की स्क्रीन देखते समय अपनी आंखों को सिकोड़ लेते है. लगातार ऐसा करने पर कंप्यूटर विजन सिंड्रोम बीमारी से ग्रसित हो जाते हैं. इसमें व्यक्ति को आंख सूखने और धुंधले दिखने की समस्या हो जाती है.

रीढ़ की हड्डी और फेफड़ों पर पड़ता है असर

डाक्टर्स के अनुसार मोबाइल फोन का प्रयोग अधिकतर लोग सिर झुकाकर करते है. घंटो ऐसी स्थिति में फोन का प्रयोग करते रहने से उनकी रीढ़ की हड्डी में फर्क पड़ना शुरू हो जाता है. झुके रहने के कारण लोग प्रॉपर सांस नहीं ले पाते हैं. खींचकर फुल सांस न ले पाने के कारण लोगों को फेफड़ों में संबंधित समस्याएं तेजी से उत्पन्न हो रहीं हैं.

किडनी फेल होने का खतरा सबसे ज्यादा

स्मार्ट फोन का अधिकांश प्रयोग करने वाले लोग सिर झुकाकर फोन में नजरें जमाए रहते हैं. इससे उनको गर्दन में कई प्रकार की समस्याएं पैदा होना शुरू हो जाती हैं. इसे डॉक्टर की भाषा में टेक्स्ट नेक नाम से जाना जाता है. साथ ही कई केसों में यह भी निकलकर आया है कि लोग अपने स्मार्ट फोन को बाथरूम में ले जाते हैं और घंटो वहीं बैठकर नेट का प्रयोग करते रहते हैं. जिससे हर छह में से एक के फोन पर ई-कोलाई बैक्टीरिया की वजह से डायरिया और किडनी फेल होने तक की संभावना बढ़ जाती है.

मन कक्ष में आने वाले लोगों की संख्या

साइकेट्रिक ओपीडी में मरीज- एक हजार हर महीने

फोन लत से परेशान - हफ्ते में 8 से 10

मन कक्ष में रूम- 3

क्या है नोमोफोबिया

फोन चार्ज है कि नहीं, फोन में नेटवर्क नहीं आ रहे, फोन की बैटरी डिस्चार्ज होने वाली है. कहीं फोन खो न जाए. इस तरह के डर को नोमोफोबिया कहते है. स्मार्ट फोन की लत यानि नोमोफोबिया हमारे शरीर के साथ साथ हमारे दिमागी सेहत को भी प्रभावित करती है.

मन कक्ष की स्थिति

मरीज (हफ्ते में)

10

ऐसे होता है इलाज

थेरेपी

काउंसलिंग