यहां-वहां से दवाइयां मांगने का काम मैंने साल 2008 से शुरु किया. इस काम की प्रेरणा ऐसे मिली कि दिल्ली में जमनापार लक्ष्मीनगर में मेट्रो ट्रेन के लिए बन रहे एक फ्लाई-ओवर का स्तम्भ गिर गया था.

मैं उस समय नोएडा से लौट रहा था. वहां घायल लोगों को देखकर मेरे मन में पहली बार ये ख्याल आया कि गरीब लोगों के लिए दवाइयां मांगी जाएं. दिमाग में बात आई कि ऐसा काम करो जो कोई नहीं कर रहा हो और मैंने दवाइंया मांगने का काम शुरु कर दिया.

जब मुझे बताया गया कि मैं डॉक्टर नहीं हूं, फार्मासिस्ट नहीं हूं, तो मैंने अपने हाथ से दवा बांटना बंद कर दिया. अब मैं अस्पतालों में जाता हूं और वहां दवाइयां देकर आता हूं जहां डॉक्टर जरूरतमंदों में इन्हें बांट देते हैं.

खुदगर्ज हूं मैं

अब लोग मुझे फोन करके बुलाते हैं और अपने घरों में पड़ी दवाइयां दे देते हैं. मैं फिर भी यहां-वहां जाकर चिल्ला-चिल्लाकर कहता हूं कि पुरानी दवाएं मुझे दे दो. इससे कुछ लोगों को परेशानी होती है. उनकी नींद खराब हो जाती है क्योंकि मैं जोर-जोर से चिल्लाता हूं. लोगों को शक भी होता है कि मैं दवाइयों को कहीं बेच देता हूं.

हमारी सोच बड़ी गलत है. घर में दवाएं पड़ी है, हम सोचते हैं कि कब दवा एक्सपायर हो और कब कूड़े में फेंक दे. इसी वजह से हर साल अरबों रुपए की दवाएं कूड़े में चली जाती हैं. पर मैं बड़ा खुदगर्ज आदमी हूं. ये काम मैं अपने लिए कर रहा हूं. मैं वो कर रहा हूं जो मुझे अच्छा लगता है.

मेरी बात का बुरा मत मानिए, मदर टेरेसा ने जो किया क्या वो समाज सेवा थी. मदर टेरेसा वो कर रही थीं जिससे उन्हें खुशी मिलती थी जिसे वो बयां नहीं कर सकती थीं.

मदर टेरेसा को अपने काम से खुशी मिलती थी, मैं जो कर रहा हूं, उससे मेरी आत्मा को खुशी मिलती है. कोई भी संस्था समाज की सेवा नहीं करती, अपनी खुशी के लिए काम करती है. जो मुझे अच्छा लग रहा है, मैं बस वही कर रहा हूं.

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