कानपुर। Motera Stadium गुजरात के अहमदाबाद में बना मोटेरा क्रिकेट स्टेडियम जिसे सरदार पटेल स्टेडियम के नाम से भी जाना जाता है, यहां पहला मैच साल 1983 में भारत बनाम वेस्टइंडीज के बीच खेला गया था। यह टेस्ट मैच था, जब दोनों टीमों के खिलाड़ी मैदान में उतरे तो सबसे ज्यादा खुशी उस शख्स को हुई जिसने यह मैदान बनावाया। उन शख्स का नाम है, मुरुगेश जयकृष्णा। 76 साल के हो चुके मुरुगेश भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के वाइस प्रेसीडेंट और गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके हैं। मुरुगेश ने जब अहमदाबाद में क्रिकेट स्टेडियम बनवाने का सपना देखा था, तब वह सिर्फ 38 साल के थे। आज जब मोटेरा स्टेडियम नए अवतार में सबके सामने आया है तब मुरुगेश उन पुरानी यादों को ताजा करते हुए सामने आए हैं। इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में मुरुगेश ने उन तमाम मुश्किलों का जिक्र किया जो स्टेडियम स्टेडियम निर्माण में बाधा बनी हुईं थी।

1981 में शुरु हुई थी निर्माण की कहानी

मोटेरा स्टेडियम के निर्माण का पहली बार जिक्र साल 1981 में हुआ। तब मुरुगेश ने बोर्ड के बाकी अधिकारियों के साथ मिलकर एक मीटिंग में इस बात पर डिस्कशन किया था। मुरुगेश चाहते थे कि गुजरात स्टेट एसोसिएशन के पास अपना एक मैदान हो, जहां टेस्ट मैच आयोजित करवाया जा सके। इसके लिए उन्होंने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी से बात की। मुरुगेश का नेताओं के साथ मिलना-जुलना बहुत मुश्किल नहीं था क्योंकि उनके पिता जयकिशन हरिवल्लभदास कई बार शहर के मेयर रह चुके थे। खैर सीएम के साथ मुलाकात के बाद मुरुगेश को जमीन देने के लिए सरकार राजी हो गई।

शहर के बाहर दी गई जमीन

पुरानी बातों को याद करते हुए मुरुगेश कहते हैं, 'अगर मैं मुख्यमंत्री के काफी करीब होता तो जमीन फ्री में मिल जाती या फिर यह किसी प्राइम लोकेशन में होती। जैसे कि मुंबई का वानखेड़े मरीन ड्राइव के पास है वहीं बंगलुरु का स्टेडियम सिटी सेंटर पर स्थित है। मगर गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन को स्टेडियम निर्माण के लिए जगह मोटेरा में मिली, जो शहर से एकदम बाहर है। इसके अलावा वहां काफी बड़े-बड़े गड्ढे थे। ऐसी जगह स्टेडियम खड़ा करने के लिए काफी पैसों की जरूरत थी। गुजरात की राज्य सरकार ने एक पैसे की मदद नहीं की। हम फंडिंग के लिए इधर-उधर घूम रहे थे।' कुछ लोग कहते हैं कि स्टेडियम की जमीन फ्री में दी गई थी मगर मुरुगेश का दावा है कि उन्होंने जमीन 8 रुपये प्रति स्कॅवायर फुट के हिसाब से खरीदी थी।

गड्ढे भरने में लग गए 29 लाख रुपये

मुरुगेश की मानें तो मोटेरा में स्टेडियम निर्माण के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी, वहां मौजूद बड़े-बड़े गड्ढों का भरना। जिसके लिए 29 लाख रुपये खर्च हो गए। उस वक्त भारतीय क्रिकेट बोर्ड के पास इतना पैसा भी नहीं था और सरकार ने पैसे से बिल्कुल भी मदद नहीं की। तब मुरुगेश ने पैसा कमाने के लिए स्टेडियम के कॉरपोरेट बॉक्स बेचने शुरु कर दिए। हालांकि स्टेडियम अभी बना नहीं था मगर जब यह बनकर तैयार होता तो कॉरपोरेट बॉक्स उसी का होता जो इसे अभी खरीद लेता। उस वक्त एक कॉरपोरेट बॉक्स की कीमत 4.5 लाख रुपये थी। इतनी बड़ी रकम देखकर कोई इसे खरीदने नहीं आया, तब मुरुगेश ने अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को यह बॉक्स बेचे जिसके चलते उनके पास 35 लाख रुपये इकठ्ठा हो गए थे। पैसे आने के बाद स्टेडियम निर्माण का काम शुरु हुआ और 15 बुल्डोजर मंगलवार गड्ढों को भरा गया।

बैंको से उधार लेकर बनवाया गया स्टेडियम

मुरुगेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि इस स्टेडियम का निर्माण जल्द से जल्द हो सके। वह कहते हैं, 'मैंने स्टेडियम का निर्माण कर रहे कामगारों के लिए तीन रसोइए मंगवाएं, ये सभी कंस्ट्रक्शन साइट पर मजदूरों को खाना देते थे। दिन-रात वहां काम चल रहा था। मैं उन सभी कामगारों को धन्यवाद देना चाहता हूं।' चूंकि उस समय मुरुगेश का पास इतना पैसा नहीं था, इसके लिए उन्होंने कई अर्धसरकारी संस्थानों से पैसा लिया और उन्हें गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन का लाइफ टाइम मेंबर बनाया गया। इसके अलावा कई को-ऑपरेटिव बैंकों से लोन लेकर स्टेडियम निर्माण प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया।

स्टेडियम के खिलाफ 15 कंप्लेन हुई थी दर्ज

मोटेरा स्टेडियम आज भले ही दुनिया का सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम बनने जा रहा है, मगर एक वक्त ऐसा था जब उसके निर्माण को रोकने के लिए 15 शिकायतें दर्ज की गई थी। मुरुगेश कहते हैं, 'मोटेरा स्टेडियम को लेकर उस वक्त काफी राजनीति हुई थी। आधे लोग सीएम के फेवर में थे वह इसके स्टेडियम के पक्ष में थे। वहीं जो मुख्यमंत्री के खिलाफ थे वह स्टेडियम निर्माण से खुश नहीं थे। इन लोगों ने करीब स्टेडियम के कंस्ट्रक्शन को लेकर 15 याचिकाएं डाली थी। तब मैं रोज एक कोर्ट से दूसरी कोर्ट चक्कर काटता था।' यही नहीं जब स्टेडियम धीरे-धीरे बनकर तैयार हुआ और पहले मैच के आयोजन की बारी आई तो, सरकारी तंत्र से जुड़े लोगों ने फ्री में पास मांगने शुरु कर दिए, न देने पर पानी और बिजली सप्लाई बंद करने की धमकी दी गई।

इंदिरा गांधी के नाम पर होना था नामकरण

मुरुगेश ने तत्कालीन मुख्यमंत्री से अखबार में एक बयान दिलवाया कि, सरकार में किसी भी शख्स को फ्री पास नहीं दिया जाएगा। सभी को टिकट खरीदने होंगे तब जाकर मैच का आयोजन हो पाया। यही नहीं स्टेडियम निर्माण के बाद इसके नामकरण की बारी आई तो इंदिरा गांधी के नाम पर इसका नाम रखा जाना था मगर सीएम सोलंकी ने इसका विरोध किया और तब इसे गुजरात स्टेडियम ही कहा गया।'

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