डीटीओ ने बताया कि सिटी से चलने वाली स्लीपर बसेज इल्लीगल हैं. इस वजह से यह डिसीजन लिया गया. दरअसल बसेज की एक स्टेंडर्ड हाइट होती है और इसमें छेड़छाड़ को इल्लीगल माना जाता है.

...और तब की जाती है छेड़छाड़
डीटीओ ऑफिस से मिली इन्फॉर्मेशन के मुताबिक सिटी में पिछले एक साल में 80 बड़ी बसेज का रजिस्ट्रेशन हुआ है. एमवीआई अवधेश कुमार ने बताया कि जब भी किसी बस का रजिस्ट्रेशन होता है तो एमवीआई द्वारा गाड़ी की चेसिस का इंस्पेक्शन किया जाता है. अगर चेसिस सारे मानकों के अकार्डिंग सही है तो ही गाड़ी के लिए फिटनेस सर्टिफिकेट एलॉट किया जाता है. फिटनेस सर्टिफिकेट के बिहाफ पर ही रजिस्ट्रेशन प्रोवाइड किया जाता है. सिटी में मैक्सिमम स्लीपर बसेज में रजिस्ट्रेशन करवाने के बाद स्लीपर बर्थ एड करवायी जाती है. सभी स्लीपर बसेज प्राइवेट ही हैं.

80% बड़ी बसेज में स्लीपर बर्थ
सिटी में कुल 392 बड़ी बसेज हैं, जिनमें से 200 से ज्यादा बड़ी बसेज प्राइवेट हैं. ये मानगो स्थित दो प्राइवेट बस स्टैंड बिहार स्टैंड और न्यू पुरुलिया बस स्टैंड से चलती हैं. इन बस स्टैंड से अपने स्टेट के साथ-साथ बिहार, ओडि़शा, बंगाल समेत कई और जगहों की बसेज अवेलेबल हैं. बसेज में 42 सिटिंग सीट्स और 16 स्लीपिंग बर्थ होती हैं. मानगो बस स्टैंड पर स्थित बाबा शंकर ट्रेवेल एजेंसी के ब्रोकर सुधीर कुमार ने बताया कि जेनरली लांग जर्नी के लिए लोग स्लीपिंग बर्थ ही प्रिफर करते हैं.

टारगेट पूरा करने का तरीका
ट्रैफिक डिपार्टमेंट द्वारा लिये गए इस डिसीजन को लेकर कुछ लोग तो दबी आवाज में ये भी कह रहे हैं कि ये तो ट्रैफिक डिपार्टमेंट का रेवेन्यू टारगेट पूरा करने का एक तरीका है. दरअसल ट्रैफिक डिपार्टमेंट को 1 अप्रैल को रेवेन्यू टारगेट दिया जाता है जिसे 31 मार्च तक पूरा करना होता है. ऐसे में 2012-13 में दिये गए टारगेट को पूरा करने के लिए इस फंडे को अपनाया गया है. 2012-13 में जमशेदपुर ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट को 6286.00 करोड़ का रेवेन्यू कलेक्शन का टारगेट मिला था. जिसमें से अभी तक करीब 5234.19 करोड़ रुपए ही कलेक्ट किए गए हैं.

'स्लीपर बसेज को बैन करने पर पैसेंजर्स को प्रॉब्लम होगी. बसेज में सीटिंग बर्थ तो फिर भी खाली रह जाती हैं पर स्लीपिंग बर्थ हमेशा फुल रहती हैं.'
सुधीर कुमार, ट्रेवेल एजेंट, बाबा शंकर ट्रेवेल एजेंसी, न्यू पुरुलिया बस स्टैंड

Report by: rajnish.tiwari@inext.co.in