-डिजिटाइजेशन की ओर यूनिवर्सिटी के बढ़े कदम

-यूपीडेस्को की दो एजेंसीज ने किया डेमोस्ट्रेशन

-पिछले कई सालों से डिजिटाजेशन का इंतजार

GORAKHPUR: बरसों से डिजिटाइजेशन के इंतजार में पड़ी लाइब्रेरी की दशा अब जल्द संवर जाएगी. गोरखपुर यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स को मोबाइल पर लाइब्रेरी एक्सेस करने का मौका मिलेगा, वहीं वह अपनी मनचाही किताबों को डाउनलोड भी कर सकेंगे. इसके लिए यूनिवर्सिटी में एक बार फिर कवायद तेज हो गई है. बुधवार को कार्यदायी संस्था की दो फर्म ने अपना डेमो दिया है, जिसके बाद उसमें से एक्सपीरियंस्ड फर्म का सेलेक्शन करने की प्रॉसेस शुरू हो गई है. फर्म से उनकी वर्क स्ट्रैटजी और डीटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट मांगी गई है. साथ ही इसका खर्च कितना होगा, यह भी डिमांड की गई है. सब कुछ ठीक रहा तो इस महीने के आखिर से यूनिवर्सिटी को डिजिटल करने की प्रॉसेस शुरू हो जाएगी और स्टूडेंट्स को जल्द अपने मोबाइल पर लाइब्रेरी एक्सेज करने का मौका मिल जाएगा.

डेमो देने वाला हो गया था गायब

यूनिवर्सिटी के डिजिटलाइजेशन के लिए जिम्मेदारों ने काफी तेजी से कदम बढ़ाया. उन्होंने 11 जुलाई को कार्यदायी संस्था के एक वेंडर को डेमो देने के लिए बुलाया था. इसमें फाइनेंस ऑफिसर बीरेंद्र चौबे के साथ ही रूसा के को-ऑर्डिनेटर प्रो. राजवंत राव, डॉ. दिव्या रानी सिंह, लाइब्रेरियन प्रो. हर्ष कुमार सिन्हा के साथ ही जिम्मेदार सुबह 9 बजे से ही उसका इंतजार करते रहे, लेकिन न तो वह पहुंचा और न ही उसने फोन ही पिक किया. इस मामले में फाइनेंस ऑफिसर ने बताया कि इस वेंडर से अब काम नहीं लिया जाएगा. यूपीडेस्को के दूसरे वेंडर को कॉल कर दी गई है. बुधवार को दोबारा डेमो की डेट दी गई थी. इस दौरान दो कंपनियां पहुंची थीं, लेकिन एक अनएक्सपीरियंस्ड थी, जिसकी वजह से एक्सपीरियंस फर्म से जरूरी डीटेल और दस्तावेज मांगे गए हैं.

2017 में भी हुआ था डेमो

लाइब्रेरी के डिजिटाइजेशन को लेकर कवायद 2016 के लास्ट से ही शुरू हो गई थी. लाब्रेरियन हर्ष कुमार सिन्हा ने लाइब्रेरी ऑटोमेशन और डिजिटलाइजेशन के लिए काम शुरू कराया. इसके लिए बीएचयू के साथ ही कई रिनाउंड यूनिवर्सिटी में काम कर चुकी कार्यदायी संस्था ने डेमो भी दे दिया. लेकिन तब पेंच यहां आकर फंस गया कि यूनिवर्सिटी सिर्फ एक लाख रुपए तक ही पेमेंट कर सकती है, जबकि संस्था को भारी-भरकम रकम दी जानी थी. इसकी वजह से मामला अटक गया और लाइब्रेरी का डिजिटाइजेशन नहीं हो सका.

खबर के बाद फिर कवायद शुरू

डिजिटल लाइब्रेरी की कवायद तो 10 साल पहले शुरू हुई, लेकिन यह पूरी नहीं हो सकी. इसको लेकर दैनिक जागरण आई नेक्स्ट ने 6 जुलाई के एडिशन में 'अभी पुराने युग में चल रही है गोरखपुर विश्वविद्यालय की गाड़ी' हेडिंग से खबर पब्लिश की, जिसमें लाइब्रेरी के डिजिटाइजेशन पर खास फोकस किया गया. इसके बाद जिम्मेदारों की नींद खुली और रूसा के पैसों से लाइब्रेरी डिजिटाइजेशन के लिए भी मद निकाला गया और इसके लिए कार्यदायी संस्था यूपीडेस्को को फाइनल किया गया है.

लाइब्रेरी के डिजिटाइजेशन के लिए दो फर्म का डेमो हुआ था, इसमें एक एक्सपीरियंस फर्म थी, जिससे बजट और जरूरी कागजात की डिमांड की गई है. अगर यह यूनिवर्सिटी के बजट में होगा, तो इसी फर्म को जिम्मेदारी दे दी जाएगी. इस मंथ के लास्ट से काम शुरू होने की उम्मीद है.

- शत्रोहन वैश्य, रजिस्ट्रार, डीडीयूजीयू