- शहर के स्कूलों के बाहर पैरेंट्स संग बच्चों ने भी दिखाई दिलचस्पी

GORAKHPUR: मम्मी मेरी कमर में दर्द हो रहा है, जल्दी बैग पकड़ो कंधा टूट जाएगा, मेरी रीढ़ की हड्डी में दर्द रहता है. ये बातें आजकल आम हो गई हैं. इस तरह की शिकायत हर दिन स्कूल गोइंग किड्स अपने पैरेंट्स से करते हैं. वहीं कोई रिलेटिव आया तो वो अलग एडवाइज देता है कि तेरा बच्चा क्यों एक तरफ झुकता चला जा रहा है. इसके अलावा और भी तमाम दिक्कतें हैं जो भारी बस्ता बच्चों को देता है. इसके बाद भी न ही पैरेंट्स कोई आवाज उठा पाते हैं और न ही प्रशासन की तरफ से मनमानी करने वाले स्कूलों को सुधारने के लिए ही कोई पहल की जाती है. ये रोज-रोज का दर्द बच्चों के लिए जिंदगी भर की परेशानी न बन जाए इसके लिए स्कूल और प्रशासन दोनों को ही कुछ करना होगा. इसी सोच को लेकर शुरू हुए दैनिक जागरण आई नेक्स्ट के कैंपेन भारी बस्ता के तहत सिटी के स्कूलों के बाहर चले सिग्नेचर कैंपेन में पैरेंट्स ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया और जिम्मेदारों से बच्चों को भारी बस्ते के बोझ से मुक्ति दिलाने की अपील की.

सिग्नेचर कर दर्ज कराया विरोध

दैनिक जागरण आई नेक्स्ट के कैंपेन भारी बस्ता के तहत सिटी के तमाम स्कूल्स के बाहर एक स्टॉल लगाया गया जहां लगे पोस्टर पर बच्चों संग पैरेंट्स ने भी स्कूल बैग के वजन को लेकर अपना विरोध दर्ज कराया और इस कैंपेन का हिस्सा बने. इस दौरान पैरेंट्स ने दैनिक जागरण आई नेक्स्ट टीम से अपनी परेशानियां भी शेयर कीं.

बैग है भारी इसलिए साथ जाते स्कूल

कई पैरेंट्स का कहना था कि बच्चों का बैग इतना भारी है कि उन्हें स्कूल तक छोड़ने आना पड़ता है. वहीं छुट्टी के समय भी पहले से आकर स्कूल के बाहर खड़ा रहना पड़ता है ताकि बैग उठाने में बच्चे को परेशान ना होना पड़ा. कई पैरेंट्स का ये भी कहना था कि डॉक्टर की एडवाइज के बाद भी स्कूल्स सुधरने का नाम नहीं लेते और उनकी मनमानी के चलते बच्चों की सेहत खराब हो रही है. एक मां तो ऐसी भी दिखीं जो बच्चे के साथ स्टूडेंट बन गई हैं. वे डेली बैग उसी स्टाइल में टांगती हैं जैसे बच्चे टांग कर जाते हैं. यही नहीं छुट्टी के समय स्कूलों के बाहर ढेरों गाडि़यों में पैरेंट्स द्वारा वेट करने की वजह भी भारी बस्ता ही है.

कोट्स

मेरे बच्चे की पीठ में कई दिन से दर्द हो रहा था. वो मुझसे रोज कहता था लेकिन मैंने सोचा चलो ठीक हो जाएगा. इसके बाद भी दर्द नहीं ठीक हुआ तो डॉक्टर से राय ली तो उन्होंने कहा कि कम एज में ज्यादा भारी बैग उठाने से ये प्रॉब्लम आ रही है.

अखिलेश सिंह, पैरेंट

बच्ची का बैग उठाया तो पता चला कि ये क्यों रोज दर्द की शिकायत करती है. स्कूल बैग का भार इतना अधिक है कि इसे मैं उठाऊं तो बीमार पड़ जाऊंगा, इसलिए एक समय मैं और छुट्टी के समय पत्‍‌नी बच्ची को लाने जाती हैं ताकि उसे परेशान ना होना पड़े.

- पंकज शुक्ला, पैरेंट

मेरे बच्चे जब स्कूल से आते हैं तो भारी बैग की वजह से उनके कंधे पर निशान पड़ जाता है. यही हाल हर दिन होता है. आए दिन वे पीठ दर्द की शिकायत भी करते हैं. स्कूल को चाहिए कि वे बच्चे की आधी किताबें वहीं पर जमा करा लें ताकि रोज-रोज उन्हें परेशान ना होना पड़े.

संजय मद्धेशिया, पैरेंट

वर्जन

आर्मी स्कूल में तो बच्चों के लिए अलग-अलग लॉकर बना हुआ है. इसी में बच्चों की अधिकतर किताबें रखी जाती हैं. बच्चे केवल रफ कॉपी या किताब ही अपने साथ ले जाते हैं. वे उतनी भारी नहीं होतीं कि उन्हें इससे कोई दिक्कत हो. हर स्कूल को खास तौर से छोटे बच्चों के लिए इस तरह की व्यवस्था करनी चाहिए.

विशाल त्रिपाठी, कोऑर्डिनेटर सीबीएसई