पौषमास में धनु की संक्रान्ति होती है। अतः इस मास में भगवत्पूजन का विशेष महत्व है। दक्षिण भारत के मन्दिरों में धनुर्मास का उत्सव मनाया जाता है। पौष कृष्ण अष्टमी को श्राद्ध करके ब्राह्मण भोजन कराने से उत्तम फल मिलता है। पौष कृष्ण एकादशी को उपवास पूर्वक भगवान का पूजन करना चाहिए। यह सफला एकादशी कहलाती है। इस व्रत को करने से सभी कार्य सफल हो जाते हैं। पौष मास की कृष्ण द्वादशी को सुरूपा द्वादशी का व्रत होता है। यदि इनमें पुष्य नक्षत्र का योग हो तो विशेष फलदायी होता है। यदि इस व्रत का प्रचलन गुजरात प्रान्त में विशेष रूप से लक्षित होता है। सौन्दर्य, सुख, सन्तान और सौभाग्य की प्राप्ति के लिए इसका अनुष्ठान किया जाता है।

ब्रह्मणों को सोने की कोई चीज व वस्त्र दान करें

विष्णुधर्मोत्तरपुराण में बताया गया है कि पौष शुक्ल द्वितीया को आरोग्य प्राप्ति के लिए' आरोग्य' व्रत किया जाता है। इस दिन गोश्रृंगोदक( गायों की सींगों को धोकर लिये हुए जल) से स्नान करके सफेद वस्त्र धारण कर सूर्यास्त के बाद बालेन्दु( द्वितीया के चन्द्रमा) का गन्ध आदि से पूजन करें। जब तक चन्द्रमा अस्त न हों तब तक गुड़, दही, परमान्न(खीर) और लवण से ब्राह्मणों को संतुष्ट कर केवल गोरस (छांछ) पीकर जमीन पर शयन करें। इस प्रकार प्रत्येक शुक्ल पक्ष की द्वितीया को एक वर्ष तक चन्द्र पूजन करके बारहवें महीने(मार्गशीर्ष)- में इक्षुरस से भरा घड़ा, सोना (स्वर्ण) और वस्त्र ब्राह्मण को देकर उन्हें भोजन कराने से रोंगो की निवृत्ति और आरोग्यता की प्राप्ति होती है।

पौष शुल्क त्रयोदशी को भगवान के पूजन का विशेष महत्व

पौष शुक्ल सप्तमी को 'मार्तण्डसप्तमी' कहते हैं। इस दिन भगवान सूर्य के उद्देश्य से हवन करके गोदान करने से वर्ष पर्यन्त उत्तम फल प्राप्त होता है। पौष शुक्ल एकादशी 'पुत्रदा' नाम से प्रसिद्ध है। इस दिन उपवास से सुलक्षण पुत्र की प्राप्ति होती है। भद्रावती नगरी के राजा वसुकेतु ने इस व्रत के अनुष्ठान से सर्वगुण सम्पन्न पुत्र प्राप्त किया था। पौष शुक्ल त्रयोदशी को भगवान के पूजन तथा घृतदान का विशेष महत्व है।

ब्राह्मणों को इन चीजों का दान करने से भगवान विष्णु होते हैं प्रसन्न

माघमास के स्नान का प्रारम्भ पौष की पूर्णिमा से होता है। इस दिन प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर मधुसूदन भगवान को स्नान कराया जाता है, सुन्दर वस्त्रों से सुसज्जित किया जाता है। उन्हें मुकुट, कुण्डल, किरीट, तिलक, हार तथा पुष्पमाला आदि धारण कराये जाते हैं। फिर धूप-दीप, नैवेद्य निवेदित कर आरती उतारी जाती है। पूजन के अनन्तर ब्राह्मण भोजन तथा दक्षिणा दान का विधान है। केवल इस एक दिन का ही स्नान सभी वैभव तथा दिव्यलोक की प्राप्ति कराने वाला कहा गया है। पौषमास के रविवार को व्रत करके भगवान सूर्य को निमित्त अर्घ्य दान दिया जाता है तथा एक समय नमक रहित भोजन किया जाता है। महाभारत में कहा गया है कि जो मनुष्य पौष के माह में एक ही बार भोजन करता है, वह सुन्दर, दर्शनीय तथा यश का भागी बनता है। वामन पुराण मे आया है कि पौष के माह में गृह, नगर, वाहन आदि का जो ब्राह्मण को दान करता है उससे भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं।

- ज्योतिषाचार्य पंडित गणेश प्रसाद मिश्र

सूर्य का धनु राशि में प्रवेश, 15 दिसंबर से 13 जनवरी तक सभी शुभ कार्य वर्जित

Posted By: Vandana Sharma