आप अगर यहां एक विशुद्ध जीवन की तरह बैठते हैं और बस खुद पर गौर करते हैं-उस सब को एक किनारे रख देते हैं, जो आपकी मां या पिता ने आपको बताया, यहां तक कि आपका यह सोचना कि आप एक इंसान, एक आदमी या औरत हैं - यह सब आपको किसी दूसरी चीज की तुलना में सिखाया गया है। अगर आप यहां बस एक विशुद्ध जीवन की तरह बैठते हैं, किसी की बेटी, पत्नी या पति की तरह नहीं - अगर आप एक पल के लिए अपनी सारी पहचानों को अलग रखने को तैयार हैं, तो आप देखेंगे कि आप बस एक विशुद्ध ऊर्जा हैं। यह हर इंसान के लिए एक स्पष्ट, एक बिल्कुल अलग अनुभव है, अगर वे इच्छुक हों तो। जीवन पूरा यही है।

यह ऊर्जा आपमें अभी एक व्यक्ति के रूप में काम कर रही है। आप इस ऊर्जा पर क्या छाप अंकित करते हैं, यह आपके ऊपर है। आप इस पर किसी भी तरह की छाप या असर पड़ने दे सकते हैं। आप अपनी मां को, या किसी सिनेमा के अभिनेता को, या किसी किताब को अपने ऊपर गहरा प्रभाव या छाप डालने दे सकते हैं। यह छाप बेहतर है या वह छाप बेहतर है, इस पर फैसला देना मेरा काम नहीं है। कुछ छापें आपको दुनिया में असरदार बनाती हैं और कुछ छापें आपको प्रभावपूर्ण नहीं बनातीं। कुछ छापें आपके अंदर खुशी लाती हैं, कुछ छापें आपको नाखुश करती हैं।

वह छाप चाहे जो भी हों, चाहें वह खुशी लाती हैं या दुखी करती हैं, बाहर से मिली छाप एक खास किस्म की सीमा है, जो आप अपने अंदर खड़ी कर रहे हैं। एक छाप अपने आप में एक कैद है। आप खुद के लिए एक सुंदर जेल का निर्माण कर रहे हैं। हो सकता है कि आप इसको लेकर बहुत खुश हों कि आपने इसे कितनी खूबसूरती से बनाया है, लेकिन जब आप बाहर पहुंचने की कोशिश करते हैं, सिर्फ तभी आपको एहसास होता है कि यह जेल कितना सीमित करने वाला है। हो सकता है कि आप बहुत खुश हों और कभी बाहर न पहुंचना चाहें। मैं तमामों लोगों को जानता हूं जो डोसा खाते, कॉफी पीते, और ऊंघते बैठे हुए खुश हैं। खुशी के बारे में यही उनकी सोच है। मैं इसके खिलाफ नहीं हूं, बात बस इतनी है कि कोई भी प्राणी किसी सीमित चीज से कभी संतुष्ट नहीं होगा।

कुछ समय बाद, यही डोसा उनमें एक कैंसर बन जाता है। जरूरी नहीं कि शरीर का कैंसर, लेकिन यह परेशान करता है और उनको खा जाता है - बस जीवन के सुख-आराम ही लोगों को खाए जा रहे हैं। अमीर लोग गरीब लोगों की अपेक्षा बहुत ज्यादा पीड़ा सह रहे हैं, क्योंकि जीवन के सुख-आराम उन्हें खाए जा रहे हैं। अगर आप किसी सीमा में ठहर जाते हैं, तो यह जीवन आपको उसमें रहने नहीं देगा। यह उस सीमा को तोड़ना चाहता है और उससे आगे जाना चाहता है। अगर इस लालसा को आपके अंदर सचेतन अभिव्यक्ति मिलती है, तो हम इसे आध्यात्मिक प्रक्रिया कहते हैं। सीमाओं को तोड़ने की और आजाद होने की यह लालसा हर किसी में होती है। जो भी तरीका वे जानते हैं, वे उसी तरीके से आजाद होने की कोशिश कर रहे हैं।

कोई सोचता है कि अगर उसे एक करोड़ डॉलर मिल जाए, तो वह आजाद होगा, तो वह उस दिशा में काम कर रहा है। कोई सोचता है कि अगर वह अपना सारा पैसा दे डाले, तो वह आजाद हो जाएगा, तो वह वही कर रहा है। कोई सोचता है कि अगर वे एक उचित पारिवारिक संरचना बना लेते हैं, तो वे आजाद हो जाएंगे; कोई दूसरा सोचता है कि अगर वे परिवार से दूर चले जाएं, तो वे आजाद हो जाएंगे। इस तरह, आजादी के बारे में तरह-तरह की सोच मौजूद हैं, लेकिन कहीं न कहीं, जाने में या अनजाने में, हर किसी में उस चीज से आजाद होने की लालसा है, जिसने उन्हें बांध रखा है। आप किससे आजाद होना चाहते हैं, यह इस पर निर्भर करता है कि क्या आपको बांधे हुए है, लेकिन बुनियादी रूप से, हर कोई आजाद होना चाहता है।

क्या है पूर्ण आजादी?

आप कितने आजाद होना चाहेंगे? अगर आप इस पर वाकई गौर करते हैं, तो आप देखेंगे कि आप पूरी तरह से आजाद होना चाहते हैं। पूर्ण आजादी क्या है? अगर आप वास्तव में आजाद होना चाहते हैं, तो आपको जन्म और मृत्यु की प्रक्रिया से ही आजाद होना होगा। आपको अपने शरीर से आजाद होना होगा और अपने मन से आजाद होना होगा। वरना कोई आजादी नहीं होगी।

-सद्गुरू जग्गी वासुदेव

सब कुछ अच्छा होने के लिए भाग्य पर निर्भरता गलत: सद्गुरू जग्गी वासुदेव

Posted By: Vandana Sharma

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