फिल्म : साइना
कलाकार : परिणीति चोपड़ा, मानव कौल, मेघना मलिक,अंकुर विकाल, ईशान नकवी
निर्देशक : अमोल गुप्ते
रेटिंग : चार स्टार

क्या है कहानी
साइना( परिणीति चोपड़ा) एक मिडिल क्लास परिवार से है। उसकी मां ( मेघना मलिक) बचपन से स्पष्ट है कि उसे अपनी बेटी को बैडमिंटन चैंपियन बनाना है। वह साफ जानती है कि खेल में दूसरा नंबर कुछ नहीं होता है। जो विनर है वही सबकुछ है। फिल्म का एक संवाद है, मिडिल क्लास परिवार अपने सेक्युरिटी और जरूरत को पूरा करने के चक्कर में कभी अपने सपने पूरे नहीं कर पाते हैं। लेकिन साइना की मां ने वही नहीं होने दिया। उसने साइना को छोटे सपने भी नहीं दिखाए। हमेशा बड़े सपने देखने को कहा। हरियाणा जहां आज भी भ्रूण हत्या और ऑनर किलिंग के मामले सबसे अधिक हैं, वहां एक आम परिवार अपने घर की लड़की को बैडमिंटन में पहुंचाता है। साइना अपने सफर पर निकलती है, जहाँ उसे राजन (मानव कौल) उसके कोच मिलते हैं। सफर में उसे बहुत कुछ हासिल करने के साथ छोड़ना भी पड़ता है।

साइना का ऐसा है सफर
फिल्म में एक अच्छा संवाद है, सचिन ने 22 साल की उम्र में शादी की। लेकिन उसका ध्यान नहीं भटका। लेकिन मैं लड़की हूँ तो मुझे मेरे प्यार को छोड़ना पड़ेगा। एक मुकाम ऐसा आता है, जब साइना का खेल से ध्यान भटकता है और वह फॉर्म में नहीं रहती। वहां भी उसे फिनिश्ड ऑफ कहा गया। अमूमन खिलाड़ियों को कह दिया जाता है। लेकिन साइना चोट खाती है, फिर खड़ी होती है। उसके कोच राजन से वह दूरी बनाती है। लाल बहादुर शास्त्री अकादमी से वह अपने सफर को शुरू करती, बंगलुरु पहुंचती है। खेल में कोच जरूरी है, लेकिन सिर्फ कोच के कन्धों पर ही नहीं टिकना है। साइना खुद में आत्मविश्वास जगाती है और विश्व में एक नंबर पर आती है।

बायोपिक में खेल को महत्व
निर्देशक की यह खूबी रही है कि उन्होंने इस बायोपिक में खेल को महत्व दिया है, अधिक समय हम साइना को कोर्ट में ही देखते हैं। यह कहानी लड़कियों के लिए प्रेरणा है। एक सफल व्यक्ति के पीछे कितने लोगों का श्रेय होता है,यह भी फिल्म दर्शाती है। यह किसी भी तरह महिमामंडन नहीं करती है। अगर आप खुद लक्ष्य को लेकर अडिग हैं तो प्यार आपको आगे बढ़ाता है, भटकाता नहीं है। यह भी साइना दर्शाती है।

क्या है अच्छा
निर्देशन की सोच के माध्यम से हमने साइना की जिंदगी के अहम पहलुओं में झाँकने की कोशिश की है। उन्होंने कोई भी बनावटीपन, जबरदस्ती का नाटकीय रूप नहीं रखा है। फिल्म भाषणबाजी पर नहीं, क्राफ्ट पर फोकस है। जबरदस्ती के गाने भी ठूसे नहीं गए हैं। संवाद बेहद सटीक हैं। खास बात यह भी है कि निर्देशक ने शेष कलाकारों पर भी काम किया है। कास्टिंग जबरदस्त है। यह फिल्म परिणीति चोपड़ा की सबसे बड़ी जीत और श्रद्धा के लिए बड़ा नुकसान है। मेघना ने कमाल का काम किया है, उन्होंने हरियाणवी डायलेक्ट को जबरदस्त तरीके से पकड़ा है और एक मां की भूमिका में खूब अच्छा अभिनय किया है। अमूमन बायोपिक्स में केवल कलाकार बॉडी लैंग्वेज और कैरकेचर बन जाते हैं। लेकिन निर्देशक ने अपनी फिल्म की लीड को यह नहीं करने दिया है। फिल्म की नायिका प्लास्टिक सर्जरी या प्रोस्थेटिक मेकअप वाले लुक में नजर नहीं आती है। जबरदस्ती का साइना का हीरोइनज्म दिखाने की भी कोशिश नहीं की गई है। फिल्म कई जगह आपको इमोशनल करती है।

क्या है बुरा
कुछ जगह कंटीन्यूटी की कमी लगी है। फिल्म में साइना की बहन के एक भी संवाद नहीं हैं। अचानक से वह गायब हो गई हैं। कुछ दृश्यों में साइना के गाल का मास्सा छोटा बड़ा होता है। लेकिन फिल्म की खूबियों के बीच यह छोटी खामियां हैं, जिन्हें बिल्कुल नजरअंदाज किया जा सकता है। फिल्म में इमोशन को अच्छे से पिरोया गया है।

अदाकारी
परिणीति चोपड़ा के लिए फिल्म आसान नहीं रही होगी। उन्हें एक स्पोर्ट्स पर्सन के रूप में खुद को तैयार करना कठिन रहा होगा। साथ ही उन्होंने साइना की बॉडी लैंग्वेज को खूब अच्छी तरह पकड़ा है। अमोल ने उनसे काफी सहजता से काम करवाया है। मेघना मलिक फिल्म की जान हैं। मानव कौल ने एक स्ट्रिक्ट कोच की अच्छी भूमिका निभाई है। ईशान नकवी, जो शायद खुद भी वास्तविक जीवन में प्लेयर हैं। उन्होंने बेहद अच्छा अभिनय किया है। नायशा कौर भटोये ने छोटी साइना का किरदार बेहद संजीदगी से निभाया है। साइना के पिता के किरदार में सुबरज्योति बरात ने अच्छा अभिनय किया है।

वर्डिक्ट
साइना के फैंस के साथ यह फिल्म महिला फैंस और परिवार के साथ देखी जानी चाहिए और निश्चित तौर पर पसंद आएगी।

Review By: अनु वर्मा

Bollywood News inextlive from Bollywood News Desk