गणेश चतुर्थी व्रत के करने से इस लोक और परलोक दोनों ही सुधर जाते हैं।इस व्रत को करने से व्रती के सब कष्ट दूर हो जाते हैं। धर्म,अर्थ,काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

पूजन विधि-विधान

संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी व्रत प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाता है परंतु माघ श्रावण मार्ग शीर्ष और भाद्र पद में करने का विशेष महत्व है।व्रती इस दिन स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर दाहिने हाथ में पुष्प,अक्षत,गंध और जल लेकर संकल्प लेकर विद्या,धन,पुत्र, पौत्र प्राप्ति, समस्त रोगों से मुक्ति और समस्त संकटों से छुटकारे के लिए एवं श्री गणेश जी की प्रसन्नता के लिए मैं संकष्ट चतुर्थी व्रत करता हूं।इस संकल्प के बाद दिन भर मौन अथवा उपवास रखकर सामर्थ्यानुसार गणेश जी की मूर्ति को कोरे कलश में जलभरकर ,मुंह बांध कर स्थापित करें।गजानन महाराज का चिंतन करते हुए उनका आह्वान करें फिर गणेश जी का धूप-दीप,गंध,पुष्प,अक्षत,रोली आदि से षोडशोपचार पूजन सांयकाल में करें।

पूजन में 21 लड्डुओं का भोग लगाएं

पूजन के अंत में 21 लड्डुओं का भोग लगाएं।इसमें 5 गणपति के सम्मुख भेंट कर शेष ब्राह्मणों और भक्तों में बांट दें।साथ में दक्षिणा भी दें और कहें रात में चंद्रोदय होने पर यथाविधि चन्द्रमा का पूजन कर छीरसागर आदि मंत्रों से अर्ध्यदान देते हुए नमस्कार करें और कहें कि हे देव सब संकटों का हरण करें तथा मेरे अर्ध्य दान को स्वीकार करें।यह प्रार्थना करें कि आप फूल और दक्षिणा समेत पांच लड्डुओं को मेरी आपत्तियां दूर करने के लिए स्वीकार करें।वस्त्र से ढका पूजित कलश,दक्षिणा और गणेश जी की प्रतिमा आचार्य को समर्पित करें फिर भोजन ग्रहण करें।

व्रत महात्म्य

सतयुग में नल नामक एक राजा था,जिसकी दमयंती नामक रूपवती पत्नी थी,जब राजा नल पर विकट संकट आया और उनका घर आग में जल गया अपना सब कुछ खोने के बाद अंत में राजा को पत्नी के साथ जगह जगह भटकना पड़ा।इन सब मे राजा अपनी पत्नी पुत्र से भी अलग हो गया।इस प्रकार कष्ट पाते हुए रानी दमयंती शरभंग ऋषि की कुटिया में पहुंची और अपनी दुख भरी कथा सुनाई इस पर ऋषि ने उन्हें चतुर्थी व्रत का महात्म्य और विधि-विधान समझाया।

-ज्योतिषाचार्य पं राजीव शर्मा।

बालाजी ज्योतिष संस्थान,बरेली।

Posted By: Vandana Sharma

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