आई इंस्पायर

- हर संडे ई-रिक्शे से खाना लेकर पहुंचते हैं डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल, मरीजों और तीमारदारों को देते हैं फूड

- मरकरी कोचिंग के बच्चों में जागा समाजसेवा का भाव, मिल रही सराहना

अंकित चौहान, बरेली : डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल में मरीजों और तीमारदारों को संडे के दिन खाने की चिंता नहीं रहती है. इस दिन इन्हें घर का बना खाना मिलता है, वह भी भरपेट. इन जरूरतमंद लोगों के लिए60 बच्चों का एक ग्रुप अन्नदाता है. जी हां, भूखों का पेट भरकर समाजसेवा का यह कार्य बच्चे कर रहे हैं और वह भी ऐसे बच्चे जो क्लास 8 या नाइंथ में पढ़ते हैं. इनका इरादा नेक है और मन साफ. शायद यही वजह है कि उनके इस काम की हर तरफ से सराहना मिल रही है. जो दुआएं मिल रही हैं वो अलग.

60 बच्चों का है ग्रुप

शहर के आलमगिरी गंज में मरकरी कोचिंग में पढ़ने वाले करीब 60 बच्चों ने अपना एक ग्रुप बनाया है और वह यह सेवा कार्य पूरे मन से कर रहे हैं. उनका उद्देश्य है कि डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल में कोई भी मरीज भूखा न रहे. इसके लिए वह अपने कोचिंग डायरेक्टर से मदद लेते हैं. 20-20 बच्चों के तीन ग्रुप हर संडे पहुंचते हैं.

ज्यादा क्वांटिटी में बनवाते हैं खाना

डायरेक्टर विवेक अग्रवाल ने हर बच्चों को शुरुआत में सिर्फ चार से पांच रोटी या पूड़ी लाने को कहा लेकिन धीरे-धीरे बच्चों ने क्वांटिटी बढ़ा ली. वह 40 पूड़ी तक बनवा लेते हैं. इसके अलावा कोई बच्चा काफी क्वांटिटी में सब्जी लाता है तो कोई परांठा.

एक दिन नहीं गए तो परेशान हुए मरीज

मरकरी कोचिंग के डायरेक्टर विवेक अग्रवाल बताते हैं कि पिछले संडे उनके यहां माता रानी का जागरण था, जिस कारण उन्होंने बच्चों को खाना लाने के लिए मना कर दिया. तो वह जब इस संडे यहां पहुंचे तो एक बुजुर्ग ने उनसे आकर कहा कि आपके साथ खाना बांटने वाले बच्चे पिछले संडे क्यों नहीं आए थे, हम तो भूखे ही बैठे रहे. इसके बाद बच्चों ने कहा कि अब कोई संडे मिस नहीं करेंगे.

वर्जन-

अक्सर मां हमें बताती थीं कि कोई भी तुमसे हेल्प मांगे और तुम्हारे अंदर से हेल्प करने की आवाज उठे तो जरूर हेल्प करो, बस फिर क्या था, हम सबने गरीब मरीजों को खाना बांटने की शुरुआत की.

- राघव अग्रवाल, जीआरएम स्कूल.

- हमारी बुक्स में कई ऐसे चैप्टर हैं जिसमें जरुरतमंद लोगों की मदद करना सबसे बड़ा कर्म माना जाता है. बस हम लोग वही कर रहे हैं. यह काम हम हमेशा करते रहेंगे.

- उमंग अग्रवाल, जीआरएम स्कूल

जब लोग खाना खाने के बाद हमें दुआएं देते हैं, इतनी खुशी मिलती है जितनी मनमर्जी का गिफ्ट पाकर भी नहीं मिली. जब हम अपने घर जाकर पेरेंट्स से यह मूवमेंट शेयर करते हैं तो वह भी एप्रीसिएट करते हैं.

वल्लभ अग्रवाल, बीबीएल स्कूल.

वर्जन-

बच्चों ने एक महीने पहले यह आइडिया शेयर किया था. सभी संडे की मौज मस्ती छोड़ सुबह ही खाना लेकर मेरे घर आ जाते हैं, मैं ई-रिक्शा में रखकर डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल लाता हूं, और बच्चे फूड बांटते हैं. आशीर्वाद पाकर बच्चों का मनोबल बढ़ता है.

- विवेक अग्रवाल, डायरेक्टर, मरकरी कोचिंग.

वर्जन

बच्चों के ग्रुप मरीजों और तीमारदारों का जो खाना बांट रहे हैं, वह ठीक प्रकार से पका हुआ और प्योर है इसलिए हेल्थ प्रबंधन को कोई आपत्ति भी नहीं है. वही बच्चों को यह प्रयास अतुलनीय है. इससे समाज के अन्य लोगों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए.

डॉ. विनीत शुक्ला, सीएमओ.

Posted By: Inextlive