गोरखपुर को चपेट में ले रहा स्वाइन फ्लू, तीन दिन में छह मरीज चिह्नित

-कुछ सेलेक्टेड एरियाज में भरे हुए हैं सुअर, घरों में भी पहुंचकर करते हैं परेशान

GORAKHPUR: शहर में स्वाइन फ्लू दस्तक दे चुका है. अब तक आधा दर्जन से ज्यादा लोगों में इसकी पुष्टि हो चुकी है और वह हॉस्पिटलाइज हैं. इन्हें यह बीमारी कहा से मिली, यह एक बड़ा सवाल है, लेकिन इन सबके बीच शहर के कुछ ऐसे मोहल्ले हैं, जो स्वाइन फ्लू के खतरनाक वायरस साथ लेकर चलने वाले सुअरों से घिरे हुए हैं. स्वाइनफ्लू वायरस के इंटरमीडिएट वेक्टर यह सुअर इनफ्लूएंजा जैसे सिम्प्टम रखने वाले इन वायरसेज को दूसरों तक आसानी से पहुंचा रहे हैं, जिसकी वजह से स्वाइनफ्लू जैसी खतरनाक बीमारी पांव पसारने लगी है. सुअर के साथ ही काली मिट्टी और गंदगी में पाए जाने वाले जानवर भी इसके वेक्टर के तौर पर काम करते हैं.

रिकॉर्ड में 1270 'यमदूत'

स्वाइन फ्लू और इंसेफेलाइटिस जैसी खतरनाक बीमारी को बांटने वाले इन सूअरों की तादाद शहर में 1270 है. यह शहर के 65 बाड़ों में पाले गए हैं. यह हाइवे, मार्केट, घनी आबादी के साथ ही सिटी के नए डेवलप हुए एरियाज में हैं. सबसे ज्यादा सुअरों की तादाद बसंतपुर और जटेपुर उत्तरी इलाके में है. जीएमसी के आंकड़ों में बसंतपुर में 418 और जटेपुर उत्तरी में 53 सुअर पाले गए हैं. यह सभी स्वाइन फ्लू के वेक्टर का काम करते हैं और आसपास के रहने वालों के लिए खतरा पैदा करते हैं.

किसी उम्र में हो सकता है स्वाइन फ्लू

आमतौर पर यह सुनने में आता है कि बड़ी उम्र के लोगों को ही स्वाइन फ्लू का वायरस अटैक कर रहा है, लेकिन यह वायरस किसी भी उम्र के लोगों को अपना शिकार बना सकता है. सबसे ज्यादा खतरा 10 साल या उससे कम उम्र के बच्चों को है, जो अगर इनकी चपेट में आ जाते हैं तो इम्युनिटी पॉवर कम होने की वजह से इनका वार नहीं सह पाते और इसकी वजह से इनकी मौत तक हो जाती है.

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सुअर की आंत में पनपता है वायरस

एक्सप‌र्ट्स की मानें तो लोगों को मौत के मुहाने पर पहुंचाने वाला यह वायरस सुअर की इंटेस्टाइन में पनपता है. इसके बाद जब सुअर काली मिट्टी या कीचड़ में बैठता है तो वहीं अपना मल्ल त्याग करता है. साथ ही यह वायरस भी बाहर आ जाता है. इसके बाद जब वेस्ट सूख जाता है तो यह बायोडिग्रेड होने लगता है, जिससे इसके वायरस हवा में फैलते हैं और आसपास के लोगों तक इसका असर फैलने लगता है. वहीं, सुअरों को भी यह वायरस जकड़ लेता है. इसके बाद यह जहां खांसते और छींकते हैं, वायरस आसपास मौजूद लोगों को अपना शिकार बनाता है. यह संक्रामक रोग है, इसलिए इसका संक्रमण फैलता ही जाता है.

यह हैं सिम्प्टम्स -

- नाक का लगातार बहना, छींक आना

- कफ, कोल्ड और लगातार खांसी

- मांसपेशियों में दर्द या अकड़न

- सिर में भयानक दर्द

- नींद न आना, ज्यादा थकान

- दवा खाने पर भी बुखार का लगातार बढ़ना

- गले में खराश का लगातार बढ़ते जाना

ऐसे फैलता है स्वाइन फ्लू

- स्वाइन फ्लू का वायरस हवा में ट्रांसफर होता है

- खांसने

- छींकने

- थूकने

- पेशाब

- टॉयलेट

िप्रकॉशन -

- सुअर जहां बैठे, वहां मिट्टी का तेल डाल दें

- तेल न हो तो चूने का छिड़काव करें

- फिनायल की गोली या लिक्विड भी डाला जा सकता है.

- पालने वाले सुअर को बंद रखें

- जहां आसपास सुअर रह रहे हैं वहां हाईजीन मेनटेन रखी जाए.

होने के बाद करें -

- प्रिकॉशन ही इससे बचने का सबसे बड़ा उपाय है.

- जिसको स्वाइन फ्लू हुआ है वह नाक और मुंह पर कपड़ा बांधें

- अपने यूज की सारी चीजें अलग कर लें

- साबुन, तौलिया, ब्रश, गद्दा, रजाई दूसरे का न दें.

- यह बीमारी अपने से क्योर हो जाती है.

- शुरुआत में पैरासीटमॉल जैसी दवाएं बुखार कम करने के लिए दी जाती हैं.

- अगर दो हफ्ते तक प्रॉब्लम खत्म न हो, तो डॉक्टर को दिखाकर सलाह लें

- आराम करना

- खूब पानी पीना

- शरीर में पानी की कमी न होने देना

- बीमारी के बढ़ने पर एंटी वायरल दवा ओसेल्टामिविर (टैमी फ्लू) और जानामीविर (रेलेंजा) का इस्तेमाल किया जाता है.

स्वाइन फ्लू वायरल डिजीज है, जो संक्रमण से फैलती है. इसके वायरस सुअर की आंत में पनपते हैं. प्रिकॉशन ही इससे सबसे बड़ा बचाव है. जितनी हाईजीन मेनटेन की जाए, उतनी ही बचत होगी. अगर सिंप्टम नजर आते हैं और यह दो हफ्ते से ज्यादा रहते हैं, तो फौरन ही डॉक्टर को दिखाकर सलाह लेनी चाहिए.

- डॉ. संदीप श्रीवास्तव, फिजिशियन