डिपार्टमेंट की प्लानिंग पर टीचर्स लगा रहे पलीता, पढ़ाई को रोचक बनाने में टीचर्स का नहीं दिख रहा इंट्रेस्ट

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ALLAHABAD: परिषदीय स्कूलों में बच्चों के लिए पढ़ाई को रोचक बनाने और विषय को सही ढंग से समझाने के लिए बेसिक शिक्षा विभाग ने कई कदम उठाए हैं. विभाग की तरफ से इस बार परिषदीय स्कूलों में बांटी गई किताबों में क्यूआर कोड लगाया गया है. इसके जरिए टीचर्स विषय से संबंधित डिटेल डाउनलोड कर बच्चों को रोचक ढंग से और बेहतर तरीके से समझा सकते हैं. विभाग के इस नए कदम और प्लानिंग में टीचर्स ही पलीता लगाने में जुटे हैं. क्यूआर कोड की हकीकत जानने के लिए दैनिक जागरण आई नेक्स्ट की टीम सिटी के कुछ स्कूलों में पहुंची. पता चला कि ज्यादातर टीचर्स ने अभी तक क्यूआर कोड डाउनलोड ही नहीं किया है.

देखते ही डाउनलोड करने लगे ऐप

दैनिक जागरण आई नेक्स्ट की टीम सबसे पहले मम्फोर्डगंज स्थित बीएसए आफिस के ठीक बगल में स्थित प्राथमिक विद्यालय पहुंची. क्लासेस संचालित हो रही थीं. स्कूल के इंचार्ज हेड सेजलीन मसीह ने क्यूआर कोड की जानकारी पर कहा कि जरूरत के हिसाब से यूज करते हैं. क्लास रूम में सहायक अध्यापिका शालिनी माहेश्वरी बच्चों को पढ़ा रही थीं. उन्होंने क्यूआर कोड की जानकारी की बात तो स्वीकार की, लेकिन जब इस्तेमाल को लेकर सवाल किया गया तो हड़बड़ा गई. फिर पता चला टीम को देख उन्होंने मोबाइल में क्यूआर डाउनलोडिंग पर लगा दिया था. उन्होंने बताया कि अभी पता चला कि इसको यूज करना है. दूसरी टीचर्स का भी यही हाल था.

इंग्लिश में दी गई है जानकारी

प्राथमिक विद्यालय से निकलकर रिपोर्टर जूनियर हाई स्कूल विद्यालय में पहुंचा. वहां भी हाल प्राथमिक विद्यालय जैसा ही दिखा. टीचर मंजू रानी ने कहा कि इस ऐप का प्रयोग कभी-कभी ही करती हैं. किताबें भी अभी कुछ दिन पहले ही आयी हैं. उन्होंने ऐप की कमियां भी बताई. बताया कि ऐप में सब्जेक्ट के बारे में ज्यादा नहीं बताया गया है. पूरी जानकारी इंग्लिश में दी गई है. ऐसे में बच्चों को हर विषय इंग्लिश में समझाना मुश्किल होता है. स्कूल की हेड मीनाक्षी मधुरा श्रीवास्तव ने बताया कि क्लास रूम में मोबाइल से बच्चों को समझाने में दिक्कत होती है. आवाज बच्चों तक नहीं पहुंच पाती. सब्जेक्ट को बिना इस ऐप के समझाना ज्यादा आसान होता है.

ये आ रही दिक्कतें

- ऐप में सब्जेक्ट के बारे में इंग्लिश में जानकारी होती है.

- सभी सब्जेक्ट को इंग्लिश में समझाना आसान नहीं होता है.

- मोबाइल का वाल्यूम कम होने के कारण बच्चों को ठीक से समझ नहीं आता है.

- ज्यादातर टीचर्स हिन्दी मीडियम की स्टूडेंट्स रही है, ऐसे में इंग्लिश में मैटर समझाने में दिक्कत होती है

- अभी भी कई विषयों कि किताबें स्कूल में नहीं पहुंची हैं.

नियमित रूप से ऐप के जरिए समझाना बेहद मुश्किल होता है. कभी -कभी ऐप का यूज करके बच्चों को मैं खुद समझाती हुं.

रोजलीन मसीह

कोशिश तो रहती है बच्चों को समझाने की, लेकिन इस ऐप का यूज अभी कम ही हो रहा है.

क्षमा पाण्डेय

आज ही ऐप को जानकारी के बाद डाउनलोड किया है. बच्चों को समझाने में मुश्किल होती है.

शालिनी माहेश्वरी

मैं खुद हिन्दी मीडियम से पढ़ी हुं. ऐसे में सभी सब्जेक्ट को इंग्लिश में समझाने में दिक्कत होती है.

मंजू रानी

मोबाइल में ज्यादा वाल्यूम नहीं होता है. ऐसे में क्लासरूम में बच्चों को समझाने में बहुत दिक्कत होती है. बिना मोबाइल के समझाना आसान होता है.

मीनाक्षी मधुरा श्रीवास्तव

1,58,837

सूबे में कुल परिषदीय स्कूलों की संख्या

1,13,247

प्राथमिक स्तर के स्कूलों की संख्या

45,590

जूनियर हाई स्कूल स्तर के स्कूलों की संख्या

1,16,26,196

प्राथमिक स्तर के स्कूलों में छात्रों की कुल संख्या

38,82,100

जूनियर हाईस्कूल स्तर के स्कूलों में छात्रों की कुल संख्या

04

लाख परिषदीय स्कूलों में टीचर्स की कुल संख्या