खेल के नाम पर खेल

- 450 से अधिक सेल्फ फाइनेंस कॉलेज
- खेल में पार्टिसिपेशन दो फीसदी भी नहीं
मेरठ.
सीसीएसयू से एफिलिएटेड कॉलेजों में स्पोट्र्स के नाम पर बड़ा खेल हो रहा है. हर साल स्टूडेंट्स से स्पोट्र्स फीस के रूप में मिल रहे करोड़ों रुपए कॉलेज डकार रहे हैं. इस घोटाले में सबसे अधिक सेल्फ फाइनेंस कॉलेज शामिल हैं, लेकिन एडेड और गवर्नमेंट कॉलेज भी इस घोटाले के राजदार हैं. हर साल अंतर महाविद्यालय स्तर पर होने वाली तमाम खेल प्रतियोगिताओं में दस फीसदी कॉलेज भी शामिल नहीं होते. हैरत की बात ये है कि स्टूडेंट्स से स्पोट्र्स फीस लेने के बावजूद, पैसा कहां और किस मद में खर्च होता है इसका भी पता नहीं चलता.
500 से अधिक कॉलेज
सीसीएस यूनिवर्सिटी से 450 सेल्फ फाइनेंस कॉलेज एफिलिएटेड हैं. इसके अलावा 65 एडेड और गवर्नमेंट कॉलेज हैं. हर साल यूनिवर्सिटी एडमिनिस्टे्रशन क्रिकेट, कुश्ती, खो-खो, वॉलीबाल, एथलेटिक्स समेत कई अन्य खेलों की अंतरमहाविद्यालय प्रतियोगिता आयोजित कराता है. लेकिन कॉलेज एडमिनिस्टे्रशन की उदासीनता की वजह से हजारों टैलेंट का गला घोंटा जा रहा है. 500 से अधिक कॉलेजों के अंतरमहाविद्यालय खेल प्रतियोगिताओं में महज दस फीसदी कॉलेजों का ही पार्टिसिपेशन होता है.
कहां जाते हैं करोड़ों रुपए
यूनिवर्सिटी से तकरीबन तीन लाख रेग्यूलर स्टूडेंट्स जुड़े हैं. एडेड और गवर्नमेंट कॉलेज में स्टडी कर रहे हर स्टूडेंट्स से 100 रुपए स्पोट्र्स फीस के नाम पर लिया जाता है, जिसमें से 65 रुपए कॉलेज के फंड में और 35 रुपए यूनिवर्सिटी के फंड में डिपॉजिट होता है, लेकिन इन कॉलेज में स्पोट्र्स एक्टिविटीज और स्पोट्र्स फैसिलिटीज नहीं होती. खानापूर्ति के नाम पर अंतर महाविद्यालय कॉम्प्टीशन में जरूर चंद कॉलेज पार्टिसिपेट करते हैं. सेल्फ फाइनेंस कॉलेज की स्थिति तो और भी बुरी है. यहां स्टूडेंट्स से स्पोट्र्स फीस के नाम पर 100 रुपए से लेकर एक हजार रुपए तक वसूला जाता है, जबकि यूनिवर्सिटी के फंड में प्रति स्टूडेंट्स सिर्फ 50 रुपए डिपॉजिट होता है. तकरीबन ढाई लाख स्टूडेंट्स से औसतन 100 रुपए एक्स्ट्रा स्पोट्र्स फीस को जोड़ दें तो भी हर साल तकरीबन ढाई करोड़ रुपए स्टूडेंट्स से सेल्फ फाइनेंस कॉलेज वसूल रहे हैं, लेकिन कॉलेजों में स्पोट्र्स एक्टिविटीज की बात करें तो नतीजा जीरो है.
नहीं है फिजीकल टीचर
सीसीएसयू से एफिलिएटेड कॉलेजों  में स्पोट्र्स एक्टिविटीज हो भी तो कैसे. 80 फीसदी सेल्फ फाइनेंस कॉलेजों में तो फिजीकल टीचर ही नहीं हैं. स्टूडेंट्स से स्पोट्र्स फीस तो ले ली जाती है, लेकिन उन्हें स्पोट्र्स फैसिलिटीज मुहैया नहीं कराई जाती.
घोट रहे टैलेंट का गला
सीसीएसयू से जुड़े कॉलेजों से नेशनल और इंटरनेशनल लेवल के खिलाड़ी तैयार हुए हैं. अलका तोमर, सुशील कुमार समेत कई ऐसे इंटरनेशनल प्लेयर हैं, जिन्होंने सीसीएसयू का नाम रोशन किया है, फिर भी कॉलेज एडमिनिस्टे्रशन टैलेंट का गला घोंट रहें है. सुविधाएं और मौका न मिलने की वजह से न जाने कितने खिलाडिय़ों का नेशनल और इंटरनेशनल स्तर पर नाम नहीं चमक पा रहा है.
किस मद में गया पैसा
कॉलेजेज में स्पोट्र्स फीस के नाम पर आ रहा पैसा किस मद में खर्च हो रहा है. इसका किसी को पता नहीं है और न ही यूनिवर्सिटी एडमिनिस्टे्रशन को इससे कोई सरोकार है. कॉलेज स्टूडेंट्स से पैसा ले रहे हैं, लेकिन अंतरमहाविद्यालय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा नहीं ले रहे हैं, न ही कॉलेज लेवल पर कोई स्पोट्र्स एक्टिविटीज ऑर्गनाइज करा रहे हैं, जहां पैसा खर्च हो रहा है. फिर भी ये पैसा कहां जा रहा है, इसका कोई ब्यौरा नहीं है.
डीए, टीए, किट कुछ नहीं
सोर्सेज की मानें तो अंतरमहाविद्यालय प्रतियोगिता में पार्टिसिपेट करने के लिए तमाम कॉलेजेज में स्टूडेंट्स तो इंट्रेस्ट दिखाते हैं, लेकिन कॉलेज के प्रिंसीपल्स और एडमिनिस्टे्रशन की उदासीनता की वजह से स्टूडेंट्स ख्ेाल प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने से वंचित हो जाते हैं. ये ही नहीं तमाम कॉलेजेज से हिस्सा लेने वाले प्लेयर्स को कॉलेज की ओर से डीए, टीए और किट ही नहीं दी जाती.
यूनिवर्सिटी को नुकसान
ये ही नहीं स्पोट्र्स फीस के नाम पर तमाम कॉलेज यूनिवर्सिटी को भी चूना लगा रहे हैं. नियमानुसार सेल्फ फाइनेंस कॉलेज 50 रुपए और एडेड कॉलेज 35 रुपए स्पोटर्स फीस यूनिवर्सिटी को जमा करते हैं. लेकिन कई कॉलेज यूनिवर्सिटी में स्पोट्र्स फीस जमा ही नहीं करते. ड्यू होने के बावजूद कर्मचारियों और अधिकारियों से सेटिंग करके अपने एग्जाम फार्म क्लीयर करा लेते हैं.
बॉक्स
टोटल कॉलेज     - तकरीबन 500
सेल्फ फाइनेंस    - 450
एडेड-गवर्नमेंट    - 65
रेग्यूलर स्टूडेंट-  - तकरीबन 3 लाख


             प्रति स्टूडेंट

स्पोट््र्स फीस एडेड      - 100 रुपए
स्पोट्र्स फीस सेल्फ फाइनेंस - 100 और इससे ज्यादा
यूनिवर्सिटी फंड सेल्फ फाइनेंस - 50 रुपए
यूनिवर्सिटी फंड एडेड    -35 रुपए
कॉलेज फंड सेल्फ फाइनेंस     -100 या इससे ज्यादा
कॉलेज फंड एडेड      - 65 रुपए

वर्जन
कॉलेज स्पोट्र्स एक्टिविटीज में बिल्कुल भी इंटे्रस्ट नहीं दिखाते हैं. प्रतियोगिताओं से पहले कॉलेजेज को लेटर भेजा जाता है, लेकिन प्रिंसीपल्स और मैनेजमेंट की बेरुखी से अधिकतर कॉलेजेज के खिलाड़ी पार्टिसिपेट नहीं करते. कोई दंड का प्रावधान तो है नहीं कि उन्हें जबरदस्ती पार्टिसिपेट कराया जाए.
- डॉ. जीएस रुहेल, स्पोट्र्स ऑफिसर
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एक स्कूल ऐसा भी, जहां
कूड़े के ढेर पर होती है पढ़ाई
- सरकारी स्कूल के साथ सरकार की बेतहासा मनमानी
- पं. बख्शी दास इंटर कॉलेज के पास फेंका जाता है शहर का कूड़ा
- रुमाल बन चुका है ड्रेस कोड का हिस्सा

मेरठ. इस सिटी में एक स्कूल ऐसा भी है, जहां कूड़े के ढेर पर पढ़ाई होती है. यहां पढऩा बार्डर पर जंग लडऩे जैसा है. इस स्कूल के आसपास वो तमाम चीजें मौजूद हैं, जो यहां के बच्चों को मौत के मुंह में ढकेलने के लिए काफी हैं. इस स्कूल में क्या नहीं है. दम घोंटू माहौल. शहर भर की गंदगी. कैंसर को जन्म देने वाली तमाम जहरीली गैसें और ढेरों बीमारियां. टीचर और बच्चों के मुंह पर बंधा रुमाल स्कूल के ड्रेस कोड में मानो शामिल हो गया है. इस स्कूल में नहीं है तो सिर्फ ताजी हवा और स्वच्छ माहौल जहां स्टूडेंट्स खुलकर सांस ले सकें. पढ़ सकें.
सजा भुगतने को मजबूर
शहर का कूड़ा जहां डाला जाता है. आवारा पशु जिस कूड़े पर मंडराते हैं. उसी कूड़े के इर्द-गिर्द एक स्कूल भी स्थापित है. पंडित बख्शी दास इंटर कॉलेज. इस स्कूल के दोनों तरफ आपको दूर-दूर तक कूड़ा ही कूड़ा नजर आएगा. यहां पढऩे वाले बच्चों के लिए स्कूल में पांच घंटे बिताना किसी सजा से कम नहीं है.
हमारी खता क्या है?
यहां के बच्चों से दो चार होते ही उनकी मजबूरी सामने आ गई. वो बस इतना ही बोले कि आखिर हमारी खता क्या है? क्या गरीब होना गुनाह है? क्या पढ़ाई करना कोई गुनाह है? बच्चे तो बच्चे यहां के टीचर भी यही पूछते हैं कि क्या यहां के स्कूल में आना कोई गुनाह है? पंडित बख्शी दास स्कूल में पढ़ रहे तकरीबन एक हजार बच्चों की पीड़ा कुछ ऐसी ही है. स्कूल के पीछे बने नगर निगम के कूड़ा घर से निकलने वाली दुर्गंध ने स्टूडेंट्स का जीना दूभर कर दिया है. आलम ये है कि यहां पढ़ रहे स्टूडेंट्स क्लास में कम और बिस्तर पर ज्यादा रहते हैं.
पहले नहीं था ऐसा

हापुड़ रोड स्थित पंडित बख्शी दास इंटर कॉलेज का माहौल पहले ऐसा नहीं था. 8 फरवरी 1956 को स्थापित इस स्कूल में स्टूडेंट्स एडमिशन लेना गर्व की बात समझते थे. लेकिन आज नगर निगम की मनमानी के कारण यहां पढऩा उन्हें सजा जैसा लगता है.
मौत की पढ़ाई
इस स्कूल में पढ़ रहे तकरीबन एक हजार बच्चे मौत की पढ़ाई पढ़ रहे हैं. जी हां, नगर निगम की मेहरबानी के चलते इन मासूमों को दिन में कई घंटे तक ऐसी जहरीली गैसों के बीच सांस लेना पड़ता है, जिनके चलते वे बीमारी का शिकार हो रहे हैं. आए दिन बच्चों की बेहोशी, खांसी, उल्टियां, चक्कर आने की प्रॉब्लम अब रोजमर्रा की बात हो गई है. इस स्कूल में सांस लेना ही बीमारी का कारण नहीं है. बल्कि यहां के नल का पानी पीकर भी कई बार बच्चे बीमार हो चुके हैं. टीचर और बच्चे मुंह पर रुमाल बांधे बिना नहीं रह सकते हैं.
लगा चुके हैं जाम
स्कूल के बगल में कुछ साल पहले बनाए गए कूड़े के हब के खिलाफ स्कूल के स्टूडेंट्स और टीचरों ने क्या नहीं किया. कितने ही अफसरों को शिकायत भेजी. कई बार जाम तक लगाया, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला.
क्या हैं मानक
नियमानुसार पहले से ही स्थापित किसी स्कूल, कॉलेज, अस्पताल आदि के बाहर कूड़ा डालना या गंदगी फैलाना गुनाह है. लेकिन हमारे नगर निगम को इस गुनाह की कोई परवाह नहीं है. पर डे भारी मात्रा में कूड़ा फेंकने की हिमाकत कर रहा है.
वर्जन
स्कूल में इतनी बदबू आती है कि पढ़ाई में मन ही नहीं लगता, लेकिन मजबूरी है आखिर क्या करें.
- विशाल कुमार, स्टूडेंट

कूड़े से निकलने वाले दुर्गंध से बच्चों का जीना मुहाल है. कई बार छात्रों को उल्टियां हुई है और बेहोश भी हुए हैं. शिकायत भी की गई, लेकिन कोई रिजल्ट नहीं निकला.
- सुरेश चंद, कार्यवाहक प्रिंसीपल

पहले जब इस विद्यालय में आए थे तो चारों तरफ हरियाली थी, अब चारों तरफ प्रदूषण है. पिछले दस सालों से प्रदूषण झेल रहे हैं.
- नरेन्द्र त्यागी, शिक्षक

कुछ दिन पहले हमने खुद विजिट किया था. यहां कूड़ा डालने पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है. अगर फिर भी कूड़ा डाला जा रहा है तो कार्रवाई की जाएगी.
- राजवीर सिंह, नगर स्वास्थ्य अधिकारी

पहले से स्कूल स्थापित है तो उसके आस-पास कूड़ा डालना गलत है. नगर निगम को कार्रवाई के लिए लिखा जाएगा.
- डीसी पांडे, अधिकारी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड

प्राणघातक हैं गैसेज
पंडित बख्शी दास इंटर कॉलेज के किनारे कूड़े के अंबार से निकलने वाली बदबू तो असहनीय है ही साथ ही यह प्राणघातक भी है. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारी डीसी पांडे की मानें तो कूड़ा जलाने का प्रावधान नहीं है, खासकर पॉलिथीन और प्लास्टिक आदि. उन्होंने बताया कि इसके जलाने से निकलने वाली नाइट्रोजन और कार्बन डाई आक्साइड आदि गैसेज शरीर के लिए प्राणघातक हैं.
 
वर्जन
मामला मेरे संज्ञान में नहीं है, लेकिन यदि कॉलेज के करीब कूड़ा डाला जा रहा है तो गलत है. समाधान के लिए लिखा जाएगा.
- मंजू सिंह, जेडी माध्यमिक शिक्षा

कूड़ा तो प्रॉब्लम है
- जेएनएनयूआरएम के तहत सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट पर प्रोग्र्रेस नहीं
- मेरठ में रोजाना डंप हो रहा है करीब 750 टन कूड़ा
- करीब पचास फीसदी घरों से कूड़ा कलेक्शन तो हो रहा है, लेकिन निस्तारण नहीं है
- रोजाना कूड़ा शहर के खाली पड़े जगहों पर फेका जा रहा है
- इससे बदबू फैल रही है औैर बीमारी का खतरा बढ़ गया है
- शहर में टेंपरोरी डंपिंग ग्र्राउंड एक है, दिल्ली रोड मुकुट महल के पीछे
- फिलहाल कूड़े का रेट 560 रुपए प्रति टन दे रहा है निगम
- अस्सी वार्डों में कूड़ा डालने के तीन सौै से अधिक प्वाइंट
- डंपिंग ग्र्राउंड के लिए अब्दुल्लापुर रोड के गावड़ी गांव में नगर निगम करीब 48 एकड़ जमीन अधिग्र्रहित कर चुका है, लेकिन किसान रेट विवाद को लेकर काम नहीं करने दे रहे.
- निजी कंपनी एटूजेड को शहर का कूड़ा उठवाकर उसे बहु उपयोगी बनाना है.
- कूड़े से प्लास्टिक, ब्रिक, खाद और बिजली बनाने की प्लानिंग है
- लेकिन गावड़ी में अभी तक प्लांट नहीं लगवाया जा सका है
- कूड़ा निस्तारण की व्यवस्था ना होने से तेजी से आबोहवा दूषित हो रही है.
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कॉलेजों में नहीं होते
दीक्षांत समारोह
- यूनिवर्सिटी में भटकते हैं डिग्री लेने

मेरठ. सीसीएसयू का दीक्षांत समारोह इस बार मार्च में होगा. यूनिवर्सिटी में पिछले दो सालों से दीक्षांत समारोह आयोजित करने की स्वस्थ परंपरा फिर से शुरू हो गई है. बड़े धूमधाम से ये समारोह मनाया जाता है. गवर्नर आते हैं. साथ में देश की बड़ी हस्ती बतौर अतिथि समारोह की शोभा बढ़ाती है. पर अफसोस की इस समारोह में छात्रों की संख्या काफी कम रहती है. इस साल की शुरुआत में जब गवर्नर बीएल जोशी दीक्षांत समारोह में आए थे तो उन्होंने खुद इस बात पर खेद जताया था. साथ ही उन्होंने कहा था कि अब हर वर्ष विश्वविद्यालयों में दीक्षांत समारोह आयोजित किए जाएंगे. कॉलेजों को भी यही परंपरा फिर शुरू करनी होगी.
हम भूल गए
गवर्नर की इस बात पर तत्कालीन कुलपति प्रो. एनके तनेजा ने कॉलेजों में दीक्षांत समारोह आयोजित करने के प्रस्ताव को कार्य परिषद में रखने की तैयारी कर ली थी. विचार था कि कॉलेजों के जो छात्र यूनिवर्सिटी आकर डिग्री लेने के लिए धक्के खाते हैं, उन्हें कॉलेजों से ही डिग्री मिल जाए. कॉलेजों में दीक्षांत समारोह आयोजित किया जाए. लेकिन यह विचार कार्य परिषद में रखा नहीं गया. और कॉलेजों को क्या पड़ी है सिरदर्दी लेने की. 

थी परंपरा
ऐसा नहीं है कि सीसीएसयू से एफिलिएटेड कॉलेजों में दीक्षांत समारोह नहीं आयोजित होते थे. यूनिवर्सिटी के कॉन्स्टीट्यूंट कॉलेज एलएलआरएम कॉलेज में हर साल दीक्षांत समारोह आयोजित किया जाता है. मेरठ कॉलेज, एनएएस आदि में तीस साल पहले तक दीक्षांत समारोह आयोजित करने की परंपरा थी. लेकिन सिस्टम में खामियों की वजह से यह स्वस्थ परंपरा खत्म हो गई. इन कॉलेजों के प्रिंसीपल भी समारोह आयोजित कराने में कोई रुचि नहीं लेना चाहते हैं.
क्यों जरूरी है
आखिर दीक्षांत क्यों? इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए ज्यादा दिमाग लगाने की जरूरत नहीं है. दीक्षा पूरी होने के बाद छात्र को उपाधि देने के लिए सालाना जलसा छात्र के उत्साहवर्धन के लिए तो जरूरी है ही. वहीं, जानी-मानी हस्तियों से मेडल और डिग्री लेते छात्रों को देख अन्य छात्रों में भी जोश भरता है. उनमें अच्छा परफॉर्म करने की चाह पैदा होती है.

वर्जन
मेरा मानना है कि इस पर यूनिवर्सिटी स्तर से प्राचार्यों की एक बैठक होनी चाहिए. परीक्षा, रिजल्ट और उसके बाद डिग्री समय से मिल जाएगी तो दीक्षांत समारोह हो सकते हैं.
- डॉ. एनपी सिंह, प्रिंसीपल, मेरठ कॉलेज

तीस साल से तो दीक्षांत समारोह आयोजित करने की कोई परंपरा कॉलेजों में नहीं है.
- डॉ. वीके गौतम, प्रिंसीपल, एनएएस कॉलेज

इस विचार पर हम मनन करेंगे. हमारे जमाने में भी कॉलेजों से ही डिग्री मिला करती थी. लेकिन कुछ कारणों से यह परंपरा खत्म हो गई.
- डॉ. विपिन गर्ग, वीसी, सीसीएसयू

ना यूजीसी की तरफ से हमें कोई ग्रांट मिली है. और ना ही यूनिवर्सिटी की तरफ से दीक्षांत समारोह आयोजित करने के आदेश मिले हैं. अगर समय से रिजल्ट और डिग्रियां मिल जाती हैं तो हम कॉन्वोकेशन जरूर कराएंगे. 70 और 80 के दशक में दीक्षांत समारोह होते थे. मेरे समय में भी कॉन्वोकेशन हुआ था. यह एक अच्छी परंपरा है.
डॉ. सीमा जैन, प्रिंसीपल, आरजीपीजी कॉलेज

दीक्षांत समारोह आयोजित करने के आदेश यूनिवर्सिटी से प्राप्त नहीं हुए हैं. इस साल तो संभव ही नहीं है क्योंकि नवंबर में ही तैयारी शुरू हो जाती है. ये काफी बड़ा कार्यक्रम होता है. 70 के दशक में कॉन्वोकेशन होते थे लेकिन अब ये परंपरा बंद हो चुकी है. मेरी राय में दीक्षांत समारोह होने चाहिए. ये समारोह छात्रों के लिए यादगार होता है.
- डॉ. इंदु शर्मा, इस्माईल गल्र्स पीजी कॉलेज

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