मुंबई (आईएएनएस)। सत्रह वर्षीय यशस्वी जायसवाल तब से सुर्खियां बटोर रहे हैं, जब वह लिस्ट ए क्रिकेट में दोहरा शतक बनाने वाले सबसे कम उम्र के बल्लेबाज बने। 17 साल और 292 दिनों की उम्र में, मुंबई के सलामी बल्लेबाज यशस्वी ने अक्टूबर में मुंबई और झारखंड के बीच विजय हजारे ट्रॉफी मैच के दौरान 203 रन बनाए।

भदोही के एक गांव से भारतीय ड्रेसिंग रूम तक का सफर

विजय हजारे ट्रॉफी में उनके प्रदर्शन से भारतीय टीम में उनका चयन हुआ जो अगले साल दक्षिण अफ्रीका में खेले जाने वाले अंडर -19 विश्व कप के लिए दक्षिण अफ्रीका की यात्रा करेंगे। हालांकि, युवा क्रिकेटर का यहां तक का सफर आसान नहीं रहा। उत्तर प्रदेश के वाराणसी के पास भदोही के एक छोटे से गांव से आने वाले यशस्‍वी को भारतीय ड्रेसिंग रूम में जगह बनाने के लिए बहुत मुश्किलों से गुज़रना पड़ा। बिना बिजली व शौचालय वाले टेंट में रहने से लेकर मुंबई की सड़कों पर पानी पूरी बेचने तक 17-वर्षीय यशस्‍वी को बहुत संघर्ष करना पड़ा।

सचिन को माना भगवान

यशस्‍वी ने आईसीसी को बताया, 'मुझे क्रिकेट पसंद है और खेल खेलने से मुझे बहुत खुशी मिलती है। मैं सचिन सर को बल्‍लेबाजी करते देखता था और उसी समय से मैं मुंबई में रहना और मुंबई का प्रतिनिधित्व करना चाहता था।' 'जब मैं अपने पिता के साथ यहां (मुंबई) आया था, तो मैं आजाद मैदान जाया करता था। मुझे वहां क्रिकेट खेलना बहुत पसंद था। मैंने आजाद मैदान में अभ्यास करना शुरू कर दिया, लेकिन मेरे पिता ने कहा: चलो घर (उत्तर प्रदेश) वापस लौट जाते हैं लेकिन मैंने कहा: यहां रहेंगे और मुंबई के लिए खेलेंगे।'

टेंट में गुजारे दिन &

उनके पिता के एक दुकानदार होने के नाते भारत की व्यापारिक राजधानी में रहने के लिए इतना पैसा नहीं था और उन्होंने उत्तर प्रदेश वापस जाने का फैसला किया। लेकिन यशस्वी ने अपना ध्यान केवल क्रिकेट खेलने और अपनी आइडल - सचिन तेंदुलकर का अनुसरण करने पर लगाया। यशस्‍वी ने अपनी कठिनाइयों के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा, 'मैं अपना सारा सामान लेकर आजाद मैदान आ गया। उस समय, एक मैच हो रहा था और पप्पू सर ने बताया कि अगर मैंने अच्‍छा प्रदर्शन किया तो रहने के लिए एक टेंट होगा। मैंने वह मैच खेला और मैंने वास्तव में अच्छा प्रदर्शन किया। नतीजतन, मुझे टेंट में रहने को मिला। लेकिन मेरे लिए जीना आसान नहीं था। टेंट में बिजली और शौचालय नहीं था। गर्मियों, यह बहुत गर्म हुआ करता था और बारिश के मौसम में, पानी टेंट के भीतर आ जाता। मेरे लिए वहां रहना आसान नहीं था, लेकिन मेरे दिमाग में केवल एक ही चीज चल रही थी क्रिकेट।'

सुबह शतक लगाता, शाम को पानी पूरी बेचता

उस समय के दौरान, मुझे अपने परिवार से पैसों का ज्यादा सहयोग नहीं मिला। इसलिए, मैं शाम को पानी पूरी बेचता था और कुछ पैसे कमाता था। हर दूसरे बच्चे की तरह, यशस्‍वी को भी शर्मिंदगी महसूस होती थी, जब उसके साथी उसकी दुकान पर पानी पूरियां खाने आते थे। यह एक शर्मनाक स्थिति थी। जब, मैं जिन खिलाड़ियों के साथ खेलता था, वे उस दुकान पर पानी पूरी लेने आते थे जहां मैं काम करता था। मुझे यह बहुत बुरा लगता था क्योंकि मैं सुबह शतक बनाता था और शाम को, पानी पूरी बेचता। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि यह एक छोटी सी नौकरी थी या नहीं, यह नौकरी मेरे लिए ही महत्वपूर्ण थी। फिर भी, मेरा एकमात्र ध्यान क्रिकेट पर था।

ज्‍वाला सर से मुलाकात ने बदली जिंदगी

उन्होंने कहा, हालांकि, उनकी जिंदगी ने एक महत्वपूर्ण मोड़ लिया जब वह ज्वाला सर से मिले, जिन्होंने उन्हें अन्य चीजों के बारे में नहीं सोचने की सलाह दी, लेकिन सिर्फ क्रिकेट पर ध्यान केंद्रित करने के लिए। मुझे नहीं पता था कि मुझे क्या करना है। एक दिन, मैं आज़ाद मैदान में अभ्यास कर रहा था, ज्वाला सर ने मुझे देखा। उन्‍होंने मुझसे पूछा कि मैं यहां क्या कर रहा था। उसके बाद मेरा पूरा जीवन बदल गया। 'मेरे पास खाना खरीदने के लिए पैसे नहीं थे और मेरे पास रहने के लिए जगह नहीं थी। हालांकि, सर ने मुझे सिर्फ क्रिकेट पर ध्यान देने के लिए कहा और यह भी कि वह हर चीज का ध्यान रखेंगे।

Posted By: Mukul Kumar

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