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सीएल-2 शराब के गोदाम हैं जिले में

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सीएल-2 शराब के गोदाम मुंडेरा में हैं

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सीएल-2 शराब के गोदाम सिविल लाइंस

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आबकारी निरीक्षक हैं चेकिंग के लिए

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के करीब आबकारी विभाग के हैं सिपाही

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देशी शराब की दुकान हैं जिले के अंदर

-गाड़ी के अभाव में दुकानों की चेकिंग करने से कतराते रहते हैं आबकारी निरीक्षक

-प्रॉपर चेकिंग न होने से ही मनबढ़ चंद लाइसेंस होल्डर उठाते हैं पूरा लाभ

PRAYAGRAJ: कंपनी से शराब निकलकर जिले के सीएल-2 गोदाम तक आती है। डिमांड के आधार पर गोदाम से दुकान के लिए शराब निकाली जाती है। गोदाम से निकाली गई शराब को दुकान तक ले जाने का जिम्मा ठेकेदार का होता है। गोदाम से भेजी गई शराब ही दुकान पर पहुंची, इस बात की तत्काल चेकिंग विभाग नहीं करता। लाइसेंस होल्डर खुद स्टॉक रजिस्टर में ब्योरा दर्ज कर सेलिंग शुरू कर देता है। संसाधनों का रोना रो रहे विभाग के लोग दुकानों की औचक चेकिंग का सिर्फ कोरम पूरा करते रहते हैं। विभाग की इसी ढिलाई का फायदा शराब के दुकानदार उठाते हैं। सोमवार को दैनिक जागरण-आई नेक्स्ट द्वारा की गई पड़ताल में इस तरह की बातें सामने आई। फूलपुर में शराब से हुई सात लोगों की मौत के बाद आबकारी विभाग के अधिकारी से लेकर चपरासी तक चौकन्ने हैं।

रिपोर्टर को देखते ही हुए चौकन्ना

-रिपोर्टर सोमवार दोपहर कलक्ट्रेट स्थित आबकारी विभाग के दफ्तर पहुंचा।

-जिला आबकारी अधिकारी सस्पेंड हो चुके हैं, दफ्तर में दो निरीक्षक मिले।

-पूछने पर रिपोर्टर द्वारा परिचय देते ही सभी लोग काफी चौकन्ना हो गए।

-फूलपुर में शराब से हुई सात की मौत को लेकर सवार करते ही वह सन्नाटे में आ गए।

-रिपोर्टर द्वारा काफी कुरेदने के बाद भी वह नाम बताते से कतराते रहे।

-पहले रिपोर्टर का मोबाइल चेक किया कि कहीं बात रिकॉर्ड तो नहीं की जा रही।

-रिपोर्टर का मोबाइल देखने के बाद जब संतुष्ट हुए तो कुछ बताने को राजी हुए।

-एक सवाल के जवाब में बताया गया कि शराब की फैक्ट्री में कई जगह से माल आता है।

-यह फैक्ट्री अलीगढ़, गोरखपुर, बिजनौर, रामपुर जैसे स्थानों पर है।

-फैक्ट्री में ही शराब बनने के बाद वहीं पर बोतल में भरकर बार कोड के साथ पैकिंग की जाती है।

-इसके बाद फैक्ट्री द्वारा ही डिमांड के आधार पर शराब सीएल-2 गोदाम पर भेजी जाती है।

-फैक्ट्री से निकली शराब की पूरी जिम्मेदारी विभाग व सप्लायर यानी फैक्ट्री की होती है।

-इसके बाद जिले के लाइसेंस होल्डर यानी ठेकेदार विभाग को डिमांड लेटर भेजते हैं।

-इसी डिमांड के आधार पर गोदाम यानी सीएल-2 से सम्बंधित दुकान के लिए शराब दे दी जाती है।

-इस गोदाम से दुकान तक शराब ले जाने की जिम्मेदारी लाइसेंस होल्डर की बताई गई।

-अब दुकान पर गोदाम की ही शराब पहुंची या कोई और इस बात की चेकिंग तत्काल विभाग नहीं करता।

-ठेकेदार अपने स्टाक रजिस्टर में खुद इंट्री करने के बाद सेलिंग शुरू कर देता है, इसी अनदेखी का फायदा चंद दुकानदार उठाते हैं

गाड़ी तो दूर भत्ता तक नहीं मिलता

संसाधनों का रोना रो रहे निरीक्षकों ने बताया कि दुकानों की चेकिंग के लिए गाड़ी होनी चाहिए। विभाग निरीक्षकों को गाड़ी तो दूर भत्ता तक नहीं देता। गाड़ी का प्रबंध करने के लिए निरीक्षकों को जिला आबकारी अधिकारी का मुंह ताकना पड़ता है। वह गाड़ी दिए तो ठीक नहीं खुद से प्रबंध करने पड़ते हैं। शायद यही वजह है कि दुकानों के औचक निरीक्षक व चेकिंग जैसी कार्रवाई सिर्फ कागज पर ही होती है।

(नोट: विभाग के जिम्मेदारों ने रिपोर्टर से बात की। हालांकि जब मामला ऑफिशियल वर्जन का आया तो सभी ने वर्जन देने से मना कर दिया.)