प्रयागराज (ब्यूरो) पौष पूर्णिमा तिथि रविवार की रात लगने के कारण कल्पवास करने वाले यहां पहले ही पहुंच चुके थे। सोमवार की भोर से स्नान का सिलसिला आरंभ हो गया। सूर्योदय के बाद स्नानार्थियों की संख्या बढ़ती गई। स्नान पर्व पर कोरोना संक्रमण की बंदिशों और उसके भय से श्रद्धालु बेफिक्र रहे। कोविड-19 की गाइड लाइन का उन्होंने सतर्कता के साथ पालन किया। अधिकतर श्रद्धालु मास्क लगाकर मेला क्षेत्र में आए। संगम में डुबकी लगाकर निकलने वालों ने सूर्यदेव को अघ्र्य देकर सकल सिद्धि की कामना किया। मेले में यूपी के अलावा आसपास के प्रांतों से भी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे हुए हैं। वैसे कुछ लोग 15 जनवरी मकर संक्रांति से कल्पवास कर रहे हैं, लेकिन ज्यादातर गृहस्थों ने पौष पूर्णिमा से कल्पवास शुरू किया, क्योंकि यहीं से माघ मास का आरंभ होता है। कल्पवास का सिलसिला माघी पूर्णिमा तक चलेगा।

क्या होता है कल्पवास
कल्पवास पौष माह के 11वें दिन से प्रारंभ होकर माघ माह के 12वें दिन तक किया जाता है। मान्यता है कि सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के साथ शुरू होने वाले एक मास के कल्पवास से एक कल्प जो ब्रह्मा के एक दिन के बराबर होता है जितना पुण्य मिलता है। कल्पवास की न्यूनतम अवधि एक रात्रि हो सकती है।

क्या करते हैं कल्पवास के दौरान
साफ सुथरे श्वेत या पीले रंग के वस्त्र धारण करते हैं। इनमें से सबसे ज्यादा महत्व ब्रह्मचर्य, व्रत, उपवास, देव पूजन, सत्संग और दान का माना गया है। इसका जिक्र वेद और पुराणों में भी मिलता है। कल्पवास एक कठिन साधना है जो मोक्ष के रास्ते तक ले जाती है। कल्पवास के दौरान खुद पर पूरे नियंत्रण रखकर संयम बरतते हुए ध्यान और आराधना में लीन होना पड़ता है। पद्म पुराण में महर्षि दत्तात्रेय ने कल्पवास के नियमों के बारे में चर्चा की है। कल्पवासी को 21 नियमों का पालन करना होता है।

इन नियमों का पालन करते हैं कल्पवासी
कल्पवासियों को सत्यवचन, अहिंसा, इन्द्रियों पर नियंत्रण, सभी प्राणियों पर दयाभाव, ब्रह्मचर्य पालन, व्यसनों का त्याग, ब्रह्म मुहूर्त में जागना, नित्य तीन बार पवित्र नदी में स्नान, त्रिकाल संध्या, पितरों का पिण्डदान, दान, अन्तर्मुखी जप, सत्संग, संकल्पित क्षेत्र के बाहर न जाना, किसी की भी निंदा ना करना, साधु सन्यासियों की सेवा, जप एवं संकीर्तन, एक समय भोजन, भूमि शयन, अग्नि सेवन न कराना और देव पूजन।

कैसे करे आरंभ और क्या है लाभ
कल्पवास के पहले दिन तुलसी और शालिग्राम की स्थापना और पूजन किया जाता है। कल्पवासी रहने के स्थान के पास जौ के बीज रोपता है। अवधि पूर्ण हो जाने पर वे इस पौधे को अपने साथ ले जाते हैं। तुलसी को गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है। महाभारत के एक प्रसंग में बताया गया है कि मार्कंडेय ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा कि प्रयाग तीर्थ सब पापों को नाश करने वाला है, और जो कोई एक महीना, इंद्रियों को वश में करके यहां पर स्नान, ध्यान और कल्पवास करता है, उसके लिए स्वर्ग में स्थान सुरक्षित हो जाता है।