बरेली ब्यूरो । शादियों का सीजन चल रहा है। डीजे की धुन पर हर किसी के पांव थिरकने लगते हैं। बारात में बैंड बाजा की धुन पर और शादी व अन्य समारोह में डीजे की धमक पर युवाओं के साथ छोटे-छोटे बच्चे भी थिरकते नजर आते हैं। बच्चों को डीजे पर थिरकता देख उनके पेरेंट्स भी खुश होते हैं, लेकिन यह खुशी आपके लाडले को बीमार कर सकती है। दरअसल डीजे का शोर बच्चे की सुनने की क्षमता प्रभावित करने के साथ बहरापन की समस्या भी हो सकती है। शहर के ईएनटी स्पेशलिस्ट्स के पास इस तरह के मामले पहुंच रहे हैं। ऐसे में एक्सपर्ट बच्चों को तेज आवाज वाली जगहों पर न ले जाने की सलाह दे रहे हैं।

नॉर्मल से दस गुना ज्यादा शोर
कानों के लिए नार्मल आवाज 12 डेसीबल तक ठीक है। इससे ज्यादा आवाज कानों के लिए बहुत खतरनाक होती है। शादियों में बजने वाले डीजे साउंड की आवाज बहुत तेज होती है। बड़ी बात तो यह है कि एक नहीं कई स्पीकर एक साथ यूज किए जाते हैं। जबकि तेज आवाज बच्चों को बहरा बना सकती व बिहेवरल डिसेबल की प्रॉब्लम भी जनरेट करती है। जानकारों की मानें तो 80 डेसीबल से ज्यादा आवाज कानों को नुकसान पहुंचाती है। जबकि शादियों में डीजे का साउंड 100 से 150 डेसिबल तक होता है। इससे सुनने की क्षमता के साथ ही कई अन्य तरह की प्रॉब्लम भी हो सकती है।

यह हो सकती है परेशानी
-बिहेवरल डिसेबल
-बहरापन
-सिरदर्द की समस्या
-सुनने की शक्ति कम होना
-कानों में टिनिटस की समस्या
-चिड़चिड़ापन

कैसे हो बचाव
-बच्चों को लगभग 50 मीटर तक डीजे से दूर रखें
-अगर बच्चे जाएं तो कान में कॉटन या ईयर लीड का यूज करें
-अगर घर में प्रोग्राम हो तो कम से कम आवाज रखने को कहें
-बच्चों को डीजे फ्लोर पर जाने से रोकें


नियमों का हो रहा उल्लंघन
किसी भी कार्यक्रम में रात दस बजे तक ही डीजे या लाउडस्पीकर बजाने की परमिशन है। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी सख्त आदेश जारी कर रखे हैं। बावजूद इसके शहर में लोग इसकी जमकर अनदेखी कर रहे हैं। रात दो-तीन बजे तक होटल्स और मैरिज लॉन में डीजे की धमक पर लोग थिरकते रहते हैं। लेकिन उन पर कार्रवाई नहीं होती है, जिससे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की भी धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

डॉक्टर्स का क्या है कहना
गला, नाक, कान विशेषज्ञ डॉ गौरव गर्ग का कहना है कि ध्वनि ज्ञानेद्रिंयों पर डीजे साउंड का बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता है। यह मस्तिष्क को भी प्रभावित करता है। जिसकी वजह से बच्चों में विहेवरल डिसेवल की प्रॉब्लम हो जाती है। 100 डेसिबल से ऊपर साउंड बहुत बड़ी समस्या को जन्म देता है। लगभग 25 से 30 परसेंट तक बच्चे चिड़चिड़ेपन को शिकार हो रहे हैं। इस पर रोक लगाना जरूरी है, क्योंकि इससे बहरापन भी हो सकता है।