-स्कूलों में महापुरुषों की मनाई जाने वाली जयंती में भाषण देने के लिए पढ़ते है बुक्स

-शहर की लाइब्रेरीज में सिर्फ कोर्स की बुक्स पढ़ते हैं स्टूडेंट

बरेली: तेजी से बढ़ते वेस्टर्न कल्चर और बुक्स में जरूरत से ज्यादा स्लेबस की वजह से आज का यूथ महापुरुषों को भूलता जा रहा है। यह बात हम बनी शहर की तीन बड़ी लाइब्रेरी की डिटेल बता रही है। आंकड़ों पर गौर करें तो आज से 10 साल पहले यूथ महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और विवेकानंद आदि को जानने के लिए और उनके जैसा बनने के लिए उनकी बुक्स पढ़ता था, लेकिन अब सिर्फ स्कूली बच्चे स्कूलों में मनाई जाने वाली जयंती के लिए ही बुक्स पढ़ रहे हैं। क्योंकि जयंती पर डिबेट कॉम्पटीशन होता है जिसके लिए वे बुक्स इश्यू कराते हैं।

युगवीणा लाइब्रेरी

कैंट स्थित युगवीणा लाइब्रेरी में वैसे तो करीब 20 हजार से अधिक बुक्स है। लाइब्रेरी में जानकारी ली तो पता चला कि महापुरुषों की बुक्स हैं, लेकिन सिर्फ 10 से 12 किताबें ही हैं। क्योंकि कोई पढ़ता ही नहीं है। इसलिए वह सिर्फ वहीं बुक्स रखते हैं जिनकी यूथ डिमांड करते हैं।

बरेली कॉलेज

बरेली कॉलेज की मेन लाइब्रेरी में करीब 50 हजार से अधिक बुक्स है। लाइब्रेरी में स्टूडेंट्स पढ़ाई करें इसकी अच्छी व्यवस्था है, महापुरुषों की भी बुक्स है लेकिन इसके बाद भी स्टूडेंट्स में क्रेज नहीं दिख रहा। वहीं सिर्फ 5 से 10 परसेंट ही स्टूडेंट्स बुक्स इश्यू कराते हैं।

एमजेपीआरयू

एमजेपीआरयू लाइब्रेरी में एक लाख से अधिक बुक्स हैं। जिसमें उपन्यास सहित महापुरूषों की भी बुक्स मौजूद हैं। लेकिन स्टूडेंट्स में कोर्स बुक्स अलावा किसी बुक्स में इंटरेस्ट नहीं ले रहा है। लाइब्रेरी मैनेजर का कहना है सिर्फ 10 से 15 परसेंट स्टूडेंट ही बुक्स इश्यू कराते हैं।

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कॉम्पटीशन बना चैलेंज

स्टूडेंट्स के मुताबिक उनके पास कोर्स की स्टडी के साथ ही कॉम्पटीशन की तैयारी करने का भी चैलेंज है। ऐसे में उनके पास किसी उपन्यास, महापुरुष या फिर किसी की आत्मकथा को पढ़ने का समय ही नहीं बचता है। इसलिए वे सिर्फ अपने कोर्स की बुक्स पढ़ पाते हैं।

सोशल साइट-एनवॉयरमेंट का असर

शिक्षाविदों की ही माने तो सोशल साइट्स की वजह से बुक्स रीडिंग में गिरावट आई है। क्योंकि ज्यादातर यूथ के हाथ में स्मार्ट फोन रहता है। ऐसे में वे जब भी खाली समय पाता है तो मोबाइल में बिजी हो जाता है। उसका मन महापुरुषों की बुक्स पढ़ने में नहीं लगता है। यही कारण है आज का 10-15 परसेंट यूथ ही लाइब्रेरी में आकर महापुरुषों की बुक्स की डिमांड करता है।

-स्टूडेंट्स में बुक्स पढ़ने का क्रेज बढ़ना चाहिए, लेकिन इसमें लगातार गिरावट आ रही है। स्टूडेंट्स को पर्सनल डेवलपमेंट के लिए आत्मकथाएं और महापुरुषों की बुक्स पढ़ना चाहिए। इससे व्यक्तित्व का विकास होता है।

प्रो। श्याम बिहारी लाल, एचओडी आरयू लाइब्रेरी

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-यूथ में महापुरुषों की बुक्स पढ़ने का लगाव कम हुआ है। अब कम बच्चे ही महापुरुषों की बुक्स इशू कराते हैं। फिलहाल लाइब्रेरी में महापुरुषों की बुक्स अवेलेवल हैं।

डॉ। शकुंतला सिंह, लाइब्रेरियन बरेली कॉलेज

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-हम लाइब्रेरी में अभी तीन माह से आ रहे हैं। लाइब्रेरी में आने के बाद हमे तो अपनी कोर्स की बुक्स ही पढ़ने का समय मिल पाता है। ऐसे में किसी साहित्य को पढ़ने का समय नहीं मिल पाता है।

अजय कुमार, बीए फ‌र्स्ट ईयर

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-स्टडी के साथ कम्प्टीशन की तैयारी भी चल रही है। क्योकि हर किसी की चाहत होती है कि स्टडी पूरी होने के दौरान ही जॉब लग जाए। ऐसे में किसी महापुरुष या उपन्यास पढ़ने का समय नहीं मिल पाता है।

अमित गंगवार बीए थर्ड ईयर

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-कॉलेज आने और पूरा समय कोर्स का ही वर्क इतना होता है कि उसे ही पूरा कर मिलता है। बस जब कभी किसी महापुरुष के बारे में जानना होता है तो बुक्स लेकर देख लेते हैं। वैसे अभी तक किसी महापुरुष की बुक ईशू नहीं कराई।

अमित राठौर बीएससी सेकंड ईयर

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-महापुरुष की बुक्स पढ़ने के लिए समय चाहिए होता है। हम तो कॉलेज स्टडी के साथ कम्प्टीशन की तैयारी करते हैं। ऐसे में बिल्कुल समय नहीं मिलता है कि कुछ अदर बुक्स पढ़ सकूं।

आयुष बीए थर्ड ईयर

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एप्रैल, बीएससी सेकंड ईयर

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- कोर्स बुक को पढ़ने के बाद जो भी समय मिलता है, उसे सोशल साइट भी देखना जरूरी होता है। कम्प्टीशन की भी तैयारी करने में लगा हूं। इसके बाद किसी अन्य बुक्स को पढ़ने का ही समय नहीं मिलता है।

शुभम, बीए सेकंड ईयर