गोरखपुर (ब्यूरो)। बल्कि अपने फ्रेंड सर्किल से भी कोसो दूर हो चुके हैैं। आलम यह है कि उनका धैर्य भी अब जवाब दे जाता है। किसी फैसले पर देर तक टिक नहीं पाते। ऐसी ही हालत सुप्रिया की भी है। ये पहले बैैंक दफ्तर से आने के बाद अपने घर के लॉन में घूमती थीं। मार्केट जाती थीं। पड़ोसियों से बातें करती थीं। लेकिन अब फोन लेकर बैठ जाती हैं। कभी ईमेल, कभी फेसबुक, एक्स तो कभी रील देखती हैं। एकाग्रता फिर भी नहीं रहती हैैं। ऐसा इसलिए है कि क्योंकि इन्हें पॉपकॉर्न सिंड्रोम की शिकार हो चुके हैैं। यह खुलासा किया है डिस्ट्रिक्ट हास्पिटल के मानसिक रोग विभाग के डॉ। अमित शाही ने। दरअसल, साइक्लोजिस्ट डॉ। अमित शाही के पास आने वाले मरीजों में यंगस्टर्स की संख्या बीते कुछ महीने से ज्यादा हो गई है। यंगस्टर्स में 25-35 के बीच जितने भी मानसिक रोगी आ रहे हैैं। उनमें 150 पेशेंट्स पर स्टडी किया तो उनमें पॉपकार्न सिंड्रोम की बीमारी से ग्रसित पाया गया।

देना होगा फैमिली मेंबर्स को वक्त

बता दें, इन दिनों में वर्क प्रेशर कहें या फिर मोबाइल फोन के ज्यादा इस्तेमाल करने से होने वाले तमाम प्रकार के सिंड्रोम से ग्रसित लोगों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। यही वजह है कि साइक्लोजिस्ट के पास डिफरेंट टाइप के केसेज भी खूब आ रहे हैैं। डिस्ट्रिक्ट हास्पिटल के साक्लोजिस्ट डॉ। अमित शाही ने मंडलीय कारागार समेत तमाम विभागों में जहां काउंसिलिंग के लिए जाते है। वहीं उनके पास आने वाले मरीजों में पॉपकार्न सिंड्रोम के मामले भी तेजी के साथ आने लगे हैैं। वे बताते हैैं कि आज की युवा पीढ़ी को पॉपकार्न सिंड्रोम से बचना होगा और सामाजिक दायरे को बढ़ाना होगा। इसके साथ ही उन्हें अपने फैमिली मेंबर्स के बीच वक्त देना होगा।

क्या हो रहा नुकसान

-अच्छे आइडियाज को अगला ख्याल दबा देता है

- ब्रेन की कार्यशक्ति तेजी से कम हो रही

- किसी भी टॉपिक पर डीप जानकारी से बच रहे

- स्ट्रेस लेवल बढ़ रहा है

ऐसे करें बचाव

-ऑनलाइन जीवन का रिकॉर्ड रखें

-मोबाइल-इंटरनेट इस्तेमाल की समय सीमा तय करें

-खिड़की से बाहर देखें, खाली समय का इस्तेमाल करें

-ब्रेन का आराम, रिचार्ज के लिए डिजिटल डिटॉक्स से गुजरें

-ध्यान करें, प्रकृति का आनंद लें, व्यापार करें, मैगजिन पढ़ें

इन उपायों से मिल सकता है निजात

- पॉपकॉर्न ब्रेन सिंड्रोम का बड़ा दुष्प्रभाव बेचैनी की प्रॉब्लम है।

- लंबे समय तक ध्यान एकाग्र कर लोग किताबें व न्यूजपेपर नहीं पढ़ पा रहे।

- इससे बचने का बेहतर उपाय पढ़ाई है।

- सबसे बेहतर और सस्ता उपाय न्यूज पेपर पढऩा है।

ओपीडी में प्रतिमाह एक हजार यंगेस्टर्स लोग फोन एडिक्शन से मानसिक बीमार होकर आ रहे हैं। इनमें 20 परसेंट का ब्रेन तेजी से एक से दूसरे चीज पर चला जाता है। यह पॉपकार्न ब्रेन सिंड्रोम है। लोगों को बाहर की दुनिया में निकलना होगा।

डॉ। अमित शाही, साइक्लोजिस्ट

यंगस्टर्स के बीच पॉपकर्न ब्रेन सिंड्रोम के मामले निश्चित तौर पर बढ़े हैैं। इसलिए सामाजिक दायरा बढ़ाना होगा। फैमिली मेंबर्स को समय देना होगा। ताकि मानसिक रुप से स्वस्थ रह सके और इस सिंड्रोम से बाहर निकल सकें।

डॉ। अनुभूति दुबे, साइक्लोजिस्ट परिसर में ही चार्जिंग प्वाइंट बनाए जाएंगे। प्रथम चरण में 100 इलेक्ट्रिक बसों को चलाने की तैयारी है।

जरा बच के 'पॉपकार्न ब्रेन सिंड्रोम के शिकार हो रहे आज के यंगस्टर्स

-साइक्लोजिस्ट के पास आने वाले मरीजों पर किया गया स्टडी

आफिस से घर आने के बाद मोबाइल पर ईमेल, फेसबुक व रील देखने की आदत में शुमार

शुभम ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद मल्टीनेशनल कंपनी में काम की। एक साल के भीतर तीन नौकरियां भी बदल चुके हैैं। लेकिन आज की डेट में उनका किसी भी काम में मन नहीं लगता है। वह न सिर्फ अपनी फैमिली मेंबर्स से दूरी बना चुके हैैं। बल्कि अपने फ्रेंड सर्किल से भी कोसो दूर हो चुके हैैं। आलम यह है कि उनका धैर्य भी अब जवाब दे जाता है। किसी फैसले पर देर तक टिक नहीं पाते। ऐसी ही हालत सुप्रिया की भी है। ये पहले बैैंक दफ्तर से आने के बाद अपने घर के लॉन में घूमती थीं। मार्केट जाती थीं। पड़ोसियों से बातें करती थीं। लेकिन अब फोन लेकर बैठ जाती हैं। कभी ईमेल, कभी फेसबुक, एक्स तो कभी रील देखती हैं। एकाग्रता फिर भी नहीं रहती हैैं। ऐसा इसलिए है कि क्योंकि इन्हें पॉपकॉर्न सिंड्रोम की शिकार हो चुके हैैं। यह खुलासा किया है डिस्ट्रिक्ट हास्पिटल के मानसिक रोग विभाग के डॉ। अमित शाही ने। दरअसल, साइक्लोजिस्ट डॉ। अमित शाही के पास आने वाले मरीजों में यंगस्टर्स की संख्या बीते कुछ महीने से ज्यादा हो गई है। यंगस्टर्स में 25-35 के बीच जितने भी मानसिक रोगी आ रहे हैैं। उनमें 150 पेशेंट्स पर स्टडी किया तो उनमें पॉपकार्न सिंड्रोम की बीमारी से ग्रसित पाया गया।

देना होगा फैमिली मेंबर्स को वक्त

बता दें, इन दिनों में वर्क प्रेशर कहें या फिर मोबाइल फोन के ज्यादा इस्तेमाल करने से होने वाले तमाम प्रकार के सिंड्रोम से ग्रसित लोगों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। यही वजह है कि साइक्लोजिस्ट के पास डिफरेंट टाइप के केसेज भी खूब आ रहे हैैं। डिस्ट्रिक्ट हास्पिटल के साक्लोजिस्ट डॉ। अमित शाही ने मंडलीय कारागार समेत तमाम विभागों में जहां काउंसिलिंग के लिए जाते हैैं। वहीं उनके पास आने वाले मरीजों में पॉपकार्न सिंड्रोम के मामले भी तेजी के साथ आने लगे हैैं। वे बताते हैैं कि आज की युवा पीढ़ी को पॉपकार्न सिंड्रोम से बचना होगा और सामाजिक दायरे को बढ़ाना होगा। इसके साथ ही उन्हें अपने फैमिली मेंबर्स के बीच वक्त देना होगा।

क्या हो रहा नुकसान

-अच्छे आइडियाज को अगला ख्याल दबा देता है

- ब्रेन की कार्यशक्ति तेजी से कम हो रही

- किसी भी टॉपिक पर डीप जानकारी से बच रहे

- स्ट्रेस लेवल बढ़ रहा है

ऐसे करें बचाव

-ऑनलाइन जीवन का रिकॉर्ड रखें

-मोबाइल-इंटरनेट इस्तेमाल की समय सीमा तय करें

-खिड़की से बाहर देखें, खाली समय का इस्तेमाल करें

-ब्रेन का आराम, रिचार्ज के लिए डिजिटल डिटॉक्स से गुजरें

-ध्यान करें, प्रकृति का आनंद लें, व्यापार करें, मैगजिन पढ़ें

इन उपायों से मिल सकता है निजात पॉपकॉर्न ब्रेन सिंड्रोम का बड़ा दुष्प्रभाव बेचैनी की प्रॉब्लम है।

लंबे समय तक ध्यान एकाग्र कर लोग किताबें व न्यूजपेपर नहीं पढ़ पा रहे।

इससे बचने का बेहतर उपाय पढ़ाई है। सबसे बेहतर और सस्ता उपाय न्यूज पेपर पढऩा है।

ओपीडी में प्रतिमाह एक हजार यंगेस्टर्स लोग फोन एडिक्शन से मानसिक बीमार होकर आ रहे हैं। इनमें 20 परसेंट का ब्रेन तेजी से एक से दूसरे चीज पर चला जाता है। यह पॉपकार्न ब्रेन सिंड्रोम है। लोगों को बाहर की दुनिया में निकलना होगा।

डॉ। अमित शाही, साइक्लोजिस्ट

यंगस्टर्स के बीच पॉपकर्न ब्रेन सिंड्रोम के मामले निश्चित तौर पर बढ़े हैैं। इसलिए सामाजिक दायरा बढ़ाना होगा। फैमिली मेंबर्स को समय देना होगा। ताकि मानसिक रुप से स्वस्थ रह सके और इस सिंड्रोम से बाहर निकल सकें।

डॉ। अनुभूति दुबे, साइक्लोजिस्ट