गोरखपुर (ब्यूरो)।इन सबके बीच अब हॉकी की नर्सरी कहे जाने वाले गोरखपुर में स्कूलों से भी हॉकी खत्म होने लगी है। सीबीएसई और सीआईएससीई स्कूलों ने तो कभी इसमें इंटरेस्ट दिखाया नहीं। वहीं, जो यूपी बोर्ड के स्कूल थे उनमें भी सिर्फ एक-दो कॉलेज में ही यह अब जिंदा है। यही हाल रहा तो दर्जनों इंटरनेशनल और सैकड़ों नेशनल प्लेयर देने वाले गोरखपुर का नाम हॉकी की हिस्ट्री से गायब हो जाएगा।

दो स्कूलों ने बचा रखी है लाज

गोरखपुर में हॉकी की अहमियत जाननी है तो बुजुर्गों से पूछा जा सकता है। उन्होंने वह सुनहरा दौर देखा है जब टेलीविजन पर नेशनल और इंटरनेशनल इवेंट में गोरखपुर के सितारे नजर आते थे। उस दौर में स्कूलों में भी काफी इंटरेस्ट और कॉम्प्टीशन था, जिससे यहां से ढेरों इंटरनेशनल प्लेयर्स निकले और उन्होंने ओलंपिक तक का सफर तय किया। मगर अब गोरखपुर के स्कूलों में सिर्फ एमएसआई इंटर कॉलेज और मौलाना आजाद इंटर कॉलेज में ही हॉकी बची हुई है और यहां आज भी नन्हें-मुन्ने बच्चों से लेकर प्रोफेशनल हॉकी प्लेयर्स प्रैक्टिस के लिए पहुंचते हैं। वहीं नेशनल और इंटरनेशनल तक का सफर तय करने वाले खिलाड़ी भी यहां पहुंचकर खिलाडिय़ों की नई पौध को हॉकी की बारीकियां भी सिखाते हैं।

गेम्स में पहुंचती हैं सिर्फ तीन-चार टीम्स

स्कूलों में हॉकी न होने की वजह से नेशनल और इंटरनेशनल तो दूर लोकल इवेंट में भी अब टीमें मिलना मुश्किल हो गई है। किसी तरह जोड़-जोड़ कर पांच छह टीम्स बनाई जाती हैं, जिनके बीच मुकाबला होता है। स्कूलों में हॉकी न होने का सबसे बड़ा नुकसान यह हो रहा है कि खिलाडिय़ों को बेहतर कॉम्प्टीटर नहीं मिल पा रहे हैं, जिससे उनका खेल चाहकर भी नहीं सुधर पा रहा है। वहीं, नेशनल स्टैंडर्ड के मैदान और जरूरी सुविधाएं न होने की वजह से प्रॉब्लम और बढ़ जा रही है।

गल्र्स टीम तो गायब

गोरखपुर में जहां हॉकी मेंस टीम की हालत अब खराब हो रही है। वहीं, पहले से पिछड़ी वुमेंस टीम अब खत्म होने लगी है। दो-चार साल पहले तक जहां गोरखपुर के इमामबाड़ा, आर्यकन्या और एमपी के साथ ही भगवती में गल्र्स हॉकी की टीमें नजर आती थीं। वहीं, अब इन स्कूलों में स्पोट्र्स टीचर्स रिटायर्ड होने के बाद गोरखपुर की टीम बनना मुश्किल हो गई है। मंडल स्तर पर ट्रायल के बाद जोड़-तोड़कर किसी तरह से टीम भेजी जा रही है। सिर्फ स्पोट्र्स कॉलेज ही है, जहां गल्र्स हॉकी खेली जा रही है, लेकिन वहां भी बाहर से अपने हुनर के बल पर जगह पाने वालों को ही मौका मिल पा रहा है। ऐसे में गल्र्स हॉकी बिल्कुल खत्म होने के कगार पर है।

प्राइवेट स्कूलों में स्पोट्र्स के तीन दिन

जहां यूपी बोर्ड के स्कूलों में अब हॉकी का लेवल नीचे आ रहा है। वहीं पहले से पिछड़े हुए सीबीएसई और सीआईएससीई बोर्ड में तो खेल को ही प्रॉपर तवज्जो नहीं मिल पा रही है। हॉकी की बात तो छोड़ दीजिए, मैक्सिमम स्कूल ऐसे हैं, जहां साल में एक बार दो-तीन दिन के एनुअली स्पोट्र्स इवेंट आर्गनाइज कर दिए जाते हैं और कोरम पूरा कर लिया जाता है। जहां फिजिकल एजुकेशन है, वहां पर प्रैक्टिकल के नाम पर सिर्फ फोटोग्राफ खिंचवा ली जाती है और माक्र्स भी मिल जाते हैं। ऐसे में इन स्कूलों से खेलों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद भी करना बेमायने हैं।

स्कूलों में अब बच्चे इंटरेस्ट नहीं लेते हैं। जिसकी वजह से खेल खत्म होता जा रहा है। जो पुराने खिलाड़ी हैं, उनके घर या उनके घरों के आसपास रहने वाले लोग ही अपने बच्चों को हॉकी सीखने के लिए भेजते हैं। स्कूल में कोशिश की जाती है कि हॉकी को बढ़ावा दिया जाए, इसके लिए हर मुमकिन कोशिश की जाती है।

- नियाज अहमद, स्पोट्र्स टीचर, एमएसआई इंटर कॉलेज

गल्र्स में सिर्फ तीन-चार स्कूलों में ही हॉकी हुआ करती थी। अब धीरे-धीरे वहां भी स्पोट्र्स टीचर रिटायर हो गए हैं। उसके बाद कोई एक्टिवली स्पोट्र्स पर ध्यान नहीं दे रहा है। इसकी वजह से गल्र्स में भी खेलों के खासतौर पर हॉकी के प्रति इंटरेस्ट कम होता जा रहा है। इसकी वजह से अब गल्र्स कॉलेज से हॉकी बिल्कुल खत्म हो गई है।

- फिरोज आरा, रिटायर्ड स्पोट्र्स टीचर, भगवती इंटर कॉलेज