- जुमे की नमाज के बाद मस्जिदों में पाकिस्तान के खिलाफ जताया गया आक्रोश

- पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद शमसुद्दीन को भेजे गया भारत

KANPUR ): पाकिस्तान की जेल से यातनाएं सहकर भारत लौटे शुमसुद्दीन को बजरंगी भाईजान मिल गया है। दरअसल, स्वदेश वापसी के बाद से शमसुद्दीन का उनके परिवार से संपर्क नहीं हो पा रहा था। दैनिक जागरण आई नेक्स्ट ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया और मुहिम रंग लाई। शमसुद्दीन को उनके भाई फहीमुद्दीन कानपुर लाएंगे। जैसे-जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में शमसुद्दीन की कहानी पता चल रही है। लोगों में उन्हें लेकर सहानुभूति जाग रही है। जुमे की नमाज में भी शमसुद्दीन के लिए दुअा की गई।

हर दिन घुट-घुट कर कटा

शमसुद्दीन ने पाकिस्तान में 28 साल गुजारे। इसमें से आखिरी के आठ साल घुट-घुट काटे। दरअसल फर्जी पासपोर्ट और फर्जी पहचान पत्र के मामले में उनको पांच साल की सजा सुनाई गई थी। जबकि शमसुद्दीन का कहना है कि वह रोजगार की तलाश में पाकिस्तान गया था। जहां उसका पासपोर्ट हादसे में जल गया। उन्हें जेल भेज दिया गया और जुल्म की हर इंतिहा को उन्होंने भोगा। सजा पूरी हुई लेकिन उनको रिहा नहीं किया गया। तीन साल तक वो और जेल में रहे। आखिर में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुना उनको रिहा करने के आदेश दिए। तब वो भारत वापस लौटे। यानी पांच की सजा मिली और उन्होंने आठ साल सलाखों के पीछे काटे।

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पाकिस्तान की याद आते ही सिहर उठते हैं शमसुद्दीन

शमसुद्दीन ने फोन पर बताया कि वो 1992 में तीन महीने के टूरिस्ट वीजा पर पाकिस्तान गए थे। इसी दौरान वहां हिंसा फैल गई। उन्होंने खुद को बचाने के लिए एक खंडहर में डेरा डाल दिए। वीजा का समय पूरा हो गया। वो न तो वीजा का समय बढ़वा सके और न ही वापस भारत आ सके। लिहाजा फर्जी पहचान पत्र के आधार पर पासपोर्ट बनवा लिया। 2012 में जब वो पासपोर्ट का रिनीवल कराने पहुंचे तब वो पकड़े गए। वहीं से उनको जेल भेज दिया गया। शमसुद्दीन के मुताबिक पांच साल की सजा हुई। सजा 2017 में पूरी हो गई मगर उनको रिहा नहीं किया गया। जबरन जासूस घोषित कर उनसे पूछताछ की जाती थी। उनको प्रताडि़त किया जाता रहा। आखिर के आठ साल शमसुद्दीन पर पाकिस्तान की पुलिस ने जो बरबर्ता की उसको वो याद कर सिहर जाते हैं।

कब क्या हुआ?

शमसुद्दीन ने बताया कि 1994 में उन्होंने अपनी पत्‍‌नी और दोनों बेटियों को पाकिस्तान बुला लिया था। उनके वीजा, पासपोर्ट सबकुछ ठीक था। पूरा परिवार वहीं सेटल हो गया था। शमसुद्दीन ई-रिक्शा चलाते थे। साथ ही उन्होंने दो ई-रिक्शा किराये पर दे रखे थे। इसी से जो आमदनी होती थी उसी से उनका और उनके परिवार का खर्च चलता था.शमसुद्दीन के मुताबिक जब उनकी बेटियों की शादी की तैयारी हुई। रिश्ते तय हुए तब उनको वापस भेजा था। 2007 में दोनों वापस कानपुर लौटी.शमसुद्दीन के दस्तावेज फर्जी थे इसलिए वो सलाखों के पीछे पहुंचे।

क्वारंटीन का समय पूरा

शमसुद्दीन अमृतसर में एक सेंटर पर क्वारंटीन थे। रविवार को उनका क्वारंटीन का समय पूरा हो गया है। पुलिस, प्रशासन और सेना के अफसरों ने उनसे मुलाकात की और ये भी कहा कि वो जल्द ही घर जा सकेंगे। शमसुद्दीन तब से बेहद खुश हैं। गौरतलब है कि शमसुद्दीन 26 अक्तूबर को क्वारंटीन किये गए थे। बजरिया इंस्पेक्टर राममूर्ति का कहना है कि इसमें उनकी कोई भूमिका नहीं है। न ही उनको कोई उच्चाधिकारियों से दिशा निर्देश्ा मिले हैं।

नहीं आएंगे तो हम उनको लेने जाएंगे

शमसुद्दीन के भाई फहीमुद्दीन ने बताया कि एलआईयू के अफसरों से उन्होंने इस संबंध में जानकारी साझा की है। साथ ही स्थानीय पार्षद से भी एक लेटर लिखवाया है। जिसमें शमसुद्दीन के कानपुर निवासी होने का दावा किया गया है। फहीमुद्दीन ने बताया कि अमृतसर के पुलिस या प्रशासन के अधिकारियों से कोई बातचीत नहीं हो सकी है। शमसुद्दीन को भी वहां से भेजे जाने के बारे में कोई जानकारी नहीं है। इसलिए अगर वो एक दो दिन में नहीं आते हैं तो वो खुद वहां जाकर उनको कानपुर लाएंगे।