देहरादून (ब्यूरो) : ऐपण गर्ल नाम से फेमस मीनाक्षी खाती मिलीं जो कुमंाऊ की विलुप्त होती ऐपण कला को जीवंत करने का काम तो कर ही रही हैैं, कई महिलाओं को भी वे रोजगार दे रही हैैं। मीनाक्षी ने ऐपण कला के बारे में और अधिक जानने के लिए सबसे पहले इसके इतिहास और उत्पत्ति को जाना। इसके लिए उन्होंने पूरे तीन साल तक इस पर रिसर्च की और इस दौरान उनकी मुलाकात पद्मश्री से सम्मानित हिस्टोरियन यशोधरा मठपाल से हुई। यहां से उन्हें पता चल कि ऐपण की शुरुआत चंद राजवंश के काल में हुई थी और ये कला लगभग 8वीं शताब्दी की है।

महिलाओं का बदला जीवन

नैनीताल जिले की रहने वाली 24 साल की मीनाक्षी खाती कुमाऊं की ऐपण कला में निपुणता हासिल कर इसे स्वरोजगार जरिया बनाकर एक अनोखी मिसाल पेश कर रही हैं। उनका उद्देश्य युवाओं के बीच विलुप्त होती इस कला को लोकप्रिय बनाना था। इसके लिए उन्होंने दिसंबर 2019 में मीनाकृति - ऐपण प्रोजेक्ट नामक प्रोजेक्ट की शुरुआत की और इस कला के जरिए उत्तराखंड की लगभग 4,000 से अधिक महिलाओं का जीवन बदलकर उन्हें फाइनेंसियली इंडिपेंडेंट बनाया है। यहीं कारण है कि अब लोग उनसे इंस्पायर होकर बरसों पुरानी इस कला में दिलचस्पी ले रहे हैं और खुद भी इसे रोजगार का जरिया बना रहे हैं।

ऑनलाइन, ऑफलाइन दे रही हैं टे्रनिंग


मीनाक्षी बताती हैं कि उन्हें इस बात की खुशी है कि वो इस कला को रोजगार से जोड़ पाई और विलुप्त होती कुमाऊं की लोक कला को एक नई पहचान दिलाने में सफल हुई। वो ऐपण कला पर 2018 से काम कर रही हैं। इसी के तहत वो अपनी टीम के साथ खुद से माता की चौकी, थाली, प्लेट्स, केतली आदि चीजों पर ऐपण बना रही हैं। साथ वो राज्य के तीन हजार से ज्यादा लोगों को ऑफलाइन और पांच हजार से ज्यादा लोगों को ऑनलाइन टे्रनिंग दे चुकी हैं। वे लोगों को स्कूलों, कॉलेजों और सोशल मीडिया पर वर्कशॉप्स के जरिए भी ये कला सिखा रही हैं।

स्टीकर ने ली ऐपण की जगह


मौजूदा दौर में पहाड़ की ये लोकविधा ऐपण अब गांव घरों से गायब होने लगी है। एक समय था जब गावों में लोग शादी, जनेऊ, देवी पूजन और दिवाली आदि मांगलिक अवसरों पर घर की देहली और दीवारों पर ऐपण बनाया करते थे। लेकिन वर्तमान में पर अब पलायन की मार से खली पड़े गांवों में यह कला कहीं गुम सी होती जा रही है। वहीं जो गांव आबाद हैं भी हैं तो वहां ऐपण कला की जगह स्टीकर ने ली है। इससे इस कला पर और भी बड़ा संकट खड़ा हो गया है।

कैसे बनाया जाता था ऐपण


एक समय था जब मांगलिक कार्यों पर महिलाएं गेरू यानी लाल मिट्टी से घर की दहलीज और दीवारों पर लगाती थी। इसके सूखने के बाद इसके ऊपर सफेद रंग से डिजाइन बनाया जाता हैं। ये सफेद रंग के चावल से बनाया जाता है। इसके लिए सबसे पहले चावल को भिगोकर रखा जाता है और कुछ समय बाद इसे पीसकर डिजाइन बनाने के लिए यूज किया जाता था। लेकिन वर्तमान में बदलते वक्त के साथ अब मिट्टी और चावल की जगह रेड एंड व्हाइट पेंट ने ले ली है।

राष्ट्रपति से भी की मुलाकात


इस क्रम में मीनाक्षी को कई पुरस्कार मिले हैं, उन्हें मां नंदा शक्ति पुरस्कार, महिला मातृशक्ति पुरस्कार, वीर बालिका, कल्याणी सम्मान और 2021 का सर्वश्रेष्ठ उद्यमी पुरस्कार मिल चुके हैं। इसके साथ ही वो साल 2022 में दून के राजभवन में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ भेंट करने का मौका मिला जहां उन्होंने राष्ट्रपति को उनके नाम की एक पट्टिका भी भेंट की।

ये पुरस्कार मिले


मां नंदा शक्ति पुरस्कार
महिला मातृशक्ति पुरस्कार
वीर बालिका सम्मान
कल्याणी सम्मान
सर्वश्रेष्ठ उद्यमी पुरस्कार