- अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर ने दीक्षा कार्यक्रम के अंतिम दिन गुरुवार को ब्रह्ममुहूर्त में प्रदान किया प्रेयस मंत्र

HARIDWAR: श्रीपंच दशनाम जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि से मिले प्रेयस मंत्र और गेरुआ वस्त्र (ब्रह्मगाती) को धारण करने के साथ ही गुरुवार को अखाड़े के माई बाड़े की ख्00 महिला साधु नागा संन्यासी (अवधूतानी) के रूप में दीक्षित हो गई। भोर की बेला में गंगा स्नान करने के बाद सांसारिक वस्त्रों का त्याग कर उन्होंने अवधूतानी के रूप में अपना नया परिचय पाया। अब सभी अवधूतानी क्ख् अप्रैल और उसके बाद होने वाले शाही स्नान अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर समेत अन्य वरिष्ठ संतों के साथ ही करेंगी।

ब्रह्ममुहूर्त में दिया प्रेयस मंत्र

अखाड़े के अंतरराष्ट्रीय संरक्षक श्रीमहंत हरि गिरि ने बताया कि सभी संन्यासिनों को अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि ने दो दिवसीय दीक्षा कार्यक्रम के अंतिम दिन गुरुवार को ब्रह्ममुहूर्त में प्रेयस मंत्र प्रदान किया। पहले दिन बुधवार को गंगा घाट पर शिखा सूत्र त्याग करने के साथ ही मुंडन संस्कार समेत अन्य संस्कार पूरे किए थे। इसके बाद सभी संन्यासिनों ने विजया होम के साथ अखाड़े की छावनी में स्थापित धर्म ध्वजा के नीचे पूरी रात पंचाक्षरी मंत्र 'ॐ नम: शिवाय' का जाप किया।

अब मिलेगा 'माई' और 'माता' संबोधन

नागा संन्यासी के तौर पर दीक्षित होने वाली अवधूतानी को अपना पुराना नाम, स्थान और परिचय का त्याग करना पड़ता है। श्रीमहंत हरि गिरि बताते हैं कि सभी अवधूतानी को संन्यास दीक्षा के बाद उनके गुरु व अखाड़े की ओर से नया नाम दिया जाता है। नया नाम मिलने के बाद उनका संन्यास पूर्व की जिंदगी के स्वजन, माता-पिता व सगे-संबंधियों से संपर्क पूरी तरह खत्म हो जाता है। अब उनके गुरु ही उनके सब कुछ होते हैं। दीक्षा के बाद उन्हें माई या माता कहकर संबोधित किया जाता है।