आई स्पेशल ---

-राम और रावण के पुतलों को आकार देने में जुटे बुजुर्ग नवाबुद्दीन

-पेशा नहीं, केवल पुरखों की सीख का आगे बढ़ा रहा बुतकार

mohit.sharma@inext.co.in

Meerut: राम जानो या रहीम मानों अपने-अपने खयाल हैं! दीपावली में हैं अली रमजान में बसे राम हैं!! किसी शायर द्वारा कही गई ये पंक्तियां उस बुजुर्ग बुतकार पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं, जो मजहबी दरारों में भाईचारे का रंग भरने में जुटा है. कैंट क्षेत्र स्थित भैंसाली मैदान में रामलीला के पुतलों को जीवंत करने में जुटे नवाबुद्दीन शुक्रवार को कुछ बैचेन से नजर आ रहे थे. कभी आकाश में छाए बादलों की ओर टकटकी लगाकर देखते, तो कभी बारिश के डर से पुतलों को पॉलीथीन से ढकने का प्रयास करते. मानों मौसम की बेरूखी ने उनका चैन छीन रखा था, लेकिन कुछ देर विचार करने के बाद नवाबुद्दीन फिर से पुतलों को रंगने लग जाते हैं.

 

पेशा नहीं पुश्तैनी है 'बुतकारी'

रशीदनगर निवासी सत्तर वर्षीय नवाबुद्दीन पुत्र मोहम्मद रईश मूल रूप से आतिशबाजी का काम करते हैं. परिवार में चार पुत्रों में तीन का अपना खुद का जेनरेटर का बिजनेस है, जबकि छोटा पुत्र अभी पढ़ाई कर रहा है. पुत्रों की सख्त हिदायत है कि उम्र के लिहाज से नवाब घर में रहकर ही आराम करें, लेकिन नवरात्रों के आते ही नवाब अपने आप को रोक नहीं पाते और अपना सामान उठाकर रामलीला ग्राउंड में जा पहुंचते हैं. दरअसल, नवाबुद्दीन रामलीला के दौरान इस्तेमाल होने वाले पुतलों का निर्माण करते हैं. पुतलों का निर्माण नवाब के लिए कोई पेशा या कमाई का जरिया न होकर केवल पुश्तैनी काम है. पिछली चार पीढि़यों से नवाब के पूर्वज रामलीला में पुतले बनाते रहे हैं. हो सकता उस समय यह कारोबार उनकी जीविका का श्रोत रहा हो, लेकिन आज यह नवाब की मजबूरी नहीं है.

 

'सांप्रदायिक' सौहार्द की मिसाल

रामायण के किरदारों को संवार रहे नवाबुद्दीन से जब रामायण और मजहब को लेकर बात की गई तो उनका जवाब आंखे खोलने वाला था. नवाबुद्दीन का कहना था कि मजहब और मजहब की सीमाएं ऊपर वाले ने नहीं बल्कि इंसान ने तय की हैं. तो क्यों न अपनी बनाई सीमाओं को हम खुद ही खत्म कर दें. सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक नवाबुद्दीन का संदेश सांप्रदायिकता के गाल पर करारा तमाचा है.