2015 की जूनियर इंजीनियर भर्ती की पुनरीक्षित चयन सूची वैध करार

नहीं होगे चयनित सेवा से बाहर

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महिलाओं को आरक्षण मामले में प्रदेश का मूल निवासी होना अनिवार्य करने के 9 जनवरी 07 के शासनादेश के क्लाज 4 को असंवैधानिक घोषित कर दिया है. कोर्ट ने कहा है कि यह जन्म स्थान के आधार पर विभेद करने पर रोक लगाने वाले संविधान के अनुच्छेद 16 (2) व 16 (3) के विपरीत है. कोर्ट ने 2015 की अधीनस्थ सेवा चयन आयोग की 1377 जूनियर इंजीनियरों की भर्ती की पुनरीक्षित चयन सूची 24 अगस्त 18 की वैध करार दिया है और कहा है. इस सूची से बाहर पूर्व में चयनित 107 अभ्यर्थियों में से जिन्हें नियुक्ति दे दी गयी थी, उन्हें सेवा से बाहर न किया जाय. भर्ती पूरी करने के बाद इन्हें वरिष्ठता क्रम में नीचे रखते हुए भविष्य के खाली पदों पर समायोजित किया जाय.

अभ्यर्थियों की कोई गलती नहीं

यह आदेश जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्र ने उत्तराखण्ड की वर्षा सोनी व अन्य सहित कई अन्य याचिकाओं को निस्तारित करते हुए दिया है. कोर्ट ने कहा है कि पुनरीक्षित चयन सूची से बाहर हुए अभ्यर्थियों की कोई गलती नहीं है. इसलिए उनहें सेवा से नहीं हटाया जायेगा और पुनरीक्षित चयन सूची के आधार पर भर्ती प्रक्रिया नियमानुसार पूरी की जाय. कोर्ट के इस फैसले से प्रदेश के बाहर दूसरे प्रदेशों की चयनित महिला अभ्यर्थियों की नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है. याचिका पर वरिष्ठ अधिवक्ता एएन त्रिपाठी, एके मिश्र, राघवेंद्र मिश्र आदि वकीलों ने बहस की. आयोग की तरफ से अधिवक्ता केएस कुशवाहा ने बहस की.

मामले से जुड़े तथ्य

2015 में 1377 जूनियर इंजीनियरों की भर्ती की गयी

इसमें महिला अभ्यर्थियों को 20 फीसदी क्षैतिज आरक्षण दिया जाना था

महिलाओं के 151 पदों पर केवल 75 का ही चयन किया गया. 79 पद खाली रह गये.

चयन में क्षैतिज आरक्षण के नियम का पालन न करने की शिकायत की गयी.

25 मई 2016 को घोषित परिणाम पर पुनर्विचार करते हुए पुनरीक्षित चयन सूची 28 अप्रैल 18 को जारी की गयी.

इसमें पहले चयनित 107 बाहर हो गये. जिसमें से अधिकांश नियुक्त हो चुके थे. उन्होंने ने चुनौती दी.

महिला आरक्षण में प्रदेश के मूल निवासी न होने के आधार पर चयनित याची को नियुक्ति देने से इंकार कर दिया गया इसे भी चुनौती दी गयी.

अधिवक्ता का कहना

अनुच्छेद 16 (2) व 16 (3) में जन्म स्थान के आधार पर विभेद करने की मनाही है.

राज्य सरकार के शासनादेश से महिला आरक्षण में प्रदेश का मूल निवासी होना अनिवार्य किया जाना संविधान के विपरीत है.

राज्य सरकार को संविधान के विपरीत नियम बनाने का अधिकार नहीं है.