गिलात शलित मिस्र के एक टीवी चैनल पर दिखे हैं और इसराइल ने कहा है कि उनकी सेहत बढ़िया है. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कुछ फ़लस्तीनी क़ैदियों ने गज़ा पट्टी में दाख़िल होना शुरू कर दिया है. इससे पहले हमास ने गिलात शमित को मिस्री वार्ताकारों के हवाले कर दिया था.

उनके परिवार वाले तक़रीबन पांच सालों के लंबे अंतराल के बाद उनसे मिलने के लिए बेताब हैं और उन्होंने उस क्षण के लिए ढेर सारी तैयारियाँ कर रखी हैं.

इसराइल के भीतर सुबह सवेरे से जेलों से वाहनों के निकलने का सिलसिला शुरू हो गया था जिनमें वो फ़लस्तीनी बंदी थे जिन्हें गिलाद शलित की रिहाई के बदले एक समझौते के तहत छोड़ा जा रहा है. ये नागरिक इसराइल की जेलों में क़ैद थे.

मंगलवार को रिहा किए जा रहे बंदी उन लगभग हज़ार क़ैदियों में से हैं जिन्हें गिलाद शलित के बदले छोड़े जाने को लेकर समझौता हुआ है. गिलाद शलित को साल 2006 में अग़वा कर लिया गया था.

सुप्रीम कोर्ट की मंज़ूरी

इसराइल की सुप्रीम कोर्ट ने इस समझौते पर सोमवार को अपनी मुहर लगा दी थी. देश की सबसे ऊंची अदालत ने ये फैसला एक अपील की सुनवाई करते हुए किया था जिसमें इसराइली शहरियों पर हमले और हत्या के दोष में सज़ा काट रहे फ़लस्तीनियों को छोड़े जाने का विरोध किया गया था.

समझौते के तहत पहली खेप में क़रीब 500 बंदी रिहा किए जाएंगे. दूसरी रिहाई दो महीनों के भीतर होनी है. बीबीसी के मध्य एशिया मामलों के संपादक जेरेमी बोवेन का कहना है कि इसराइल ने गिलाद शलित की रिहाई की बड़ी क़ीमत चुकाई है. हालांकि जो शहरी अपने बच्चों को फ़ौज में भेजते हैं वो शलित के परिवार का दर्द समझ सकते हैं.

फ़लस्तीन में रिहा किए जा रहे बंदियों का स्वागत शायद हीरो की तरह हो. लेकिन अगर ये मान भी लिया जाए कि बंदी अदला-बदली योजनानुसार भी सफ़ल हो जाती है तो, कहा जा रहा है कि, इससे मध्य-पूर्व में शांति प्रक्रिया पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा.

राजनीतिक फ़ायदा

अगर रिहा किए गए क़ैदी हिंसा का सिलसिला नहीं शुरू करते हैं तो इसराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को कुछ राजनीतिक फ़ायदा हो सकता है.

हमास ये दावा करेगा कि उसने गिलाद शलित को पांच लंबे साल तक इसराइल की सेना की हद से दूर रखा और आख़िर में हज़ार फलस्तीनियों की रिहाई संभव करवा सकने में उसे सफलता मिली.

इस मामले में सबसे ज़्यादा नुक़सान फ़लस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास को उठाना पडे़गा जो हमास के विरोधी ख़ेमे के हैं. बातचीत के ज़रिए मसले को सुलझाने में यक़ीन रखने वाले महमूद अब्बास ने हाल में ही संयुक्त राष्ट्र से फ़लस्तीन को मान्यता देने के लिए अ़र्ज़ी दी थी.

इससे उन्हें राजनीतिक फ़ायदा हुआ था और कहा जा रहा है कि यही कारण है कि हमास और इसराइली सरकार इस ताज़ा समझौते के लिए तैयार हो गए.

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