'मां भाग्यश्री की सफलता का श्रेय लेने लायक नहीं हूं' अभिमन्यु दासानी

2019-03-20T16:13:26Z

अभिनेत्री भाग्यश्री और हिमालय दासानी के बेटे अभिमन्यु दासानी फिल्म 'मर्द को दर्द नहीं होता' से फिल्मों में कदम रखने जा रहे हैं। फिल्म में वह कॉन्जिनाइटल इंसेंसिटिव टू पेन नाम की दुर्लभ बीमारी से पीडि़त होते हैं जिसमें इंसान को चोट लगने पर भी दर्द का एहसास नहीं होता है। उनसे प्रियंका सिंह की बातचीत

'मर्द को दर्द नहीं होता' फिल्म कैसे मिली?
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KANPUR:
मैं दस साल से मेहनत कर रहा हूं। एक दोस्त ने एक स्क्रीनशॉट भेजा था, जिसमें एक फिल्म के लिए मेरी उम्र के लड़के की तलाश थी। मैं पहले और दूसरे दिन सुबह नौ बजे से शाम के छह बजे तक खड़ा रहा, लेकिन ऑडिशन देने का मौका नहीं मिला। तीसरे दिन ऑडिशन दिया। शॉर्टलिस्ट हुआ। फिल्म के निर्देशक वासन सर के साथ वक्त बिताने का मौका मिला। हमारी बॉन्डिंग हो गई। एक दिन सर ने कहा कल आ जाओ, कुछ करते हैं। मुझे लॉन्च करने की कोई बड़ी घोषणा नहीं की गई थी।
फिल्म पाने के लिए आपने अपने मम्मी-पापा की मदद क्यों नहीं ली?
खुद के पैरों पर खड़े होने का मजा अलग है। अब भी कई लोग यही कहते हैं कि भाग्यश्री का बेटा है, इसलिए फिल्म मिल गई। मुझे अपनी मॉम पर बहुत गर्व है। उन्होंने सुमन के किरदार से इतना कुछ पा लिया है कि तीस साल बाद भी लोग उन्हें पहचानते हैं। मैं उनकी सफलता का श्रेय लेने के लायक भी नहीं हूं।
फिल्म का ट्रेलर देखने के बाद मां की क्या प्रतिक्रिया थी?
डैड नहीं चाहते थे कि मैं फिल्मों में जाऊं। जब ट्रेलर रिलीज हुआ तो इंडस्ट्री के लोगों से उन्हें कई कॉल्स आए। लोगों ने मेरी तारीफ की। उस दिन डैड ने कहा कि उन्हें मुझ पर गर्व है। मॉम ने मामी फेस्टिवल में फिल्म देखी थी, वह बाहर आकर रोने लगी थीं।
फिल्म करने से पहले इस बीमारी के बारे में कितना जानते थे?
फिल्म के दौरान ही पता चला था। मेरे किरदार सूर्या को सीआईपी नामक बीमारी है। इस बीमारी में जब दर्द बहुत बढ़ जाता है, तब जाकर मरीज को हल्का दर्द महसूस होता है। कई लोग गर्म तेल में हाथ डालकर समोसे बाहर निकाल लेते हैं, वह कोई चमत्कार नहीं, बीमारी है। मेरा किरदार ऐसे चश्मे पहनता है, जो हर तरफ से आंखों को कवर करते हैं। अगर उसकी आंखों में मिट्टी चली गई, तो आंखों को रगड़ने में उसे दर्द नहीं होगा। हो सकता है वह अपनी आंखें निकाल दे।फिल्म में आप स्टंट कर रहे हैं।
ट्रेनिंग कैसी रही?
मैं बचपन में जैकी चैन की सारी फिल्में देख चुका हूं। बचपन का सपना पूरा हुआ है। नौ महीने तक दिन में नौ घंटे ट्रेनिंग करता था। तीन घंटे सुबह और तीन घंटे शाम को मार्शल आ‌र्ट्स की ट्रेनिंग होता थी। सोने से पहले स्विमिंग और दिन में योगा, मेडिटेशन करता था। यह बॉलीवुड की ऐसी फिल्म है, जिसमें पंच और किक असल में मुझे मारे गए हैं। चोट भी लगी थी। मैंने बायोलॉजी, ह्यूमन एनाटॉमी पढ़ी। घाव को ठीक करने के बारे में सीखा।
फिल्म अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में गई थी। वहां किस तरह की प्रतिक्रिया मिली?
मैं टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में टैक्सी से पहुंचा था। मुझे अंदर जाने नहीं दिया जा रहा था। मैंने उन्हें पोस्टर दिखाकर कहा कि मैं इस फिल्म का हीरो हूं। बारह सौ सीटों वाला वह थियेटर भरा हुआ था। फिल्म के बाद थियेटर से जब मैं बाहर निकला तो लोगों ने मेरे लिए खड़े होकर तालियां बजाई थीं।मां की फिल्म 'मैंने प्यार किया' से जुड़ी कोई खास यादें हैं?-जब मैं थोड़ा बड़ा हुआ, तब मॉम की फिल्म टीवी पर देखी थी। मुझे नफरत थी उस फिल्म से, क्योंकि मुझे लगता था कि यह मेरी मॉम हैं, उन्हें मेरे पास बैठना चाहिए। जब बड़ा हुआ, तब पता चला कि उनके किरदार का लोगों पर कितना प्रभाव है। मैं आज जो हूं, मॉम की वजह से हूं। एक बार मैंने एक बुजुर्ग आंटी के लिए आगे बढ़कर दरवाजा खोला था। मॉम बहुत खुश हुईं, उन्होंने ऐसे जताया जैसे मैं सुपरहीरो हूं।
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