भगवान श्री गणेश के रूप में घर में सुख समृद्धी के प्रवेश का सूचक त्‍योहार गणेश चतुर्थी एक बार फिर आने को है। एक बार फिर बप्‍पा मोरया अपने भक्‍तों के घरों में कुछ दिनों के लिए वास करने आ रहे हैं। आगामी 17 सितंबर को होगा वो दिन जब हर कोई खुशी में झूम रहा होगा गा रहा होगा 'देवा ओ देवा गणपति देवा...' । बताते चलें कि इस त्‍योहार को विनायक चतुर्थी के नाम से भी जानते हैं। हिंदू कैलेंडर के अनुसार भाद्रपद के महीने में शुक्‍ल चतुर्थी के दिन ये त्‍योहार हर साल मनाया जाता है। इस त्‍योहार पर भक्‍त भगवान श्री गणेश की प्रतिमा को घर में लाते हैं और 10 दिनों तक आरती-पूजन भजन-कीर्तन आदि के साथ उनका स्‍वागत करते हैं। इसके बाद अनंत चर्तुदशी के दिन भगवान को भीगी पलकों के साथ अगले साल फिर जल्‍दी आने का वादा लेकर विदा कर देते हैं। आइए आने वाले गणेश चतुर्थी पर्व की दस दिन की रौनक पर जानें भारत में कौन से हैं बप्‍पा मोरया के 10 खास और बड़े मंदिर। यहां उमड़ती बप्‍पा के भक्‍तों की जबरदस्‍त भीड़।

सिद्घिविनायक मंदिर, मुंबई
सिद्घिविनायक गणेश जी ये सबसे लोकप्रिय रूप है। गणेश जी की जिन प्रतिमाओं की उनकी सूड़ दाईं ओर मुड़ी होती है, वे सिद्घपीठ से जुड़ी होती हैं और उनके मंदिर सिद्घिविनायक मंदिर कहलाते हैं। कहते हैं कि सिद्धि विनायक की महिमा अपरंपार है, वे भक्तों की मनोकामना को तुरंत पूरा करते हैं। मान्यता है कि ऐसे गणपति बहुत ही जल्दी प्रसन्न होते हैं और उतनी ही जल्दी कुपित भी होते हैं। मुंबई का ये सिद्घिविनायक मंदिर सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्िक विदेशों में भी काफी विख्यात है।
रणथंभौर गणेश जी, राजस्थान
रणथंभौर गणेश जी रणथंभौर किले के महल पर बहुत पुराना मंदिर है। ये मंदिर करीब 1000 साल पुराना है। यहां तीन नेत्र वाले गणेश जी आपको मिलेंगे। ये गणेश जी नारंगी रंग के हैं और विदेशियों के बीच काफी प्रचलित हैं। दूर-दूर से लोग यहां बप्पा के इस अद्भुत रूप का दर्शन करने के लिए आते हैं। उनके वाहन मूशक (चूहे) को भी यहां रखा गया है।

कनिपक्कम विनायक मंदिर, चित्तूर
आस्था और चमत्कार की ढेरों कहानियां खुद में समेटे कनिपक्कम विनायक का ये मंदिर आंध्रप्रदेश के चित्तूर जिले में मौजूद है। इस मंदिर की स्थापना 11वीं सदी में चोल राजा कुलोतुंग चोल प्रथम ने की थी। बाद में इसका विस्तार 1336 में विजयनगर साम्राज्य में किया गया। जितना प्राचीन ये मंदिर है उतनी ही दिलचस्प इसके निर्माण के पीछे की कहानी भी है। कहते हैं यहां हर दिन गणपति का आकार बढ़ता ही जा रहा है। साथ ही ऐसा भी मानते हैं कि अगर कुछ लोगों के बीच में कोई लड़ाई हो, तो यहां प्रार्थना करने से वो लड़ाई खत्म हो जाती है।  
मनाकुला विनायगर मंदिर, पांडिचेरी
भगवाग श्री गणेश का ये मंदिर पांडिचेरी में स्िथत है। पर्यटकों के बीच ये मंदिर आकर्षण का विशेष केंद्र है। प्राचीन काल का होने के कारण इस मंदिर की बड़ी मान्यता है। कहते हैं कि क्षेत्र पर फ्रांस के कब्जे से पहले का है ये मंदिर। दूर दराज से भक्त यहां भगवान श्रीगणेश के दर्शन करने आते हैं।
मधुर महा गणपति मंदिर, केरल
इस मंदिर से जुड़ी सबसे रोचक बात ये है कि शुरुआत में ये भगवान शिव का मंदिर हुआ करता था, लेकिन पुरानी कथा के अनुसार पुजारी के बेटे ने यहां भगवान गणेश की प्रतिमा का निर्माण किया। पुजारी का ये बेटा छोटा सा बच्चा था। खेलते-खेलते मंदिर के गर्भगृह की दीवार पर बनाई हुई उसकी प्रतिमा धीरे-धीरे अपना आकार बढ़ाने लगी। वो हर दिन बड़ी और मोटी होती गई। उस समय से ये मंदिर भगवान गणेश का बेहद खास मंदिर हो गया।
गणेश टोक, गंगटोक, सिक्िकम
गणेश टोक मंदिर गंगटोक-नाथुला रोड से करीब 7 किलोमीटर की दूरी पर स्िथत है। यह यहां करीब 6,500 फीट की ऊंची पहाड़ी पर स्िथत है। इस मंदिर के वैज्ञानिक नजरिए पर गौर करें तो इस मंदिर के बाहर खड़े होकर आप पूरे शहर का नजारा एकसाथ ले सकते हैं।

मोती डूंगरी गणेश मंदिर, जयपुर
मोती डूंगरी गणेश मंदिर राजस्थान में जयपुर के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। यह मंदिर भगवान गणेश को समर्पित है। लोगों की इसमें विशेष आस्था तथा विश्वास है। गणेश चतुर्थी के अवसर पर यहाँ काफ़ी भीड़ रहती है और दूर-दूर से लोग दर्शनों के लिए आते हैं। भगवान गणेश का यह मंदिर जयपुर वासियों की आस्था का प्रमुख केंद्र है। इतिहासकार बताते हैं कि यहां स्थापित गणेश प्रतिमा जयपुर नरेश माधोसिंह प्रथम की पटरानी के पीहर मावली से 1761 में लाई गई थी। मावली में यह प्रतिमा गुजरात से लाई गई थी। उस समय यह पांच सौ वर्ष पुरानी थी। जयपुर के नगर सेठ पल्लीवाल यह मूर्ति लेकर आए थे और उन्हीं की देखरेख में मोती डूंगरी की तलहटी में गणेशजी का मंदिर बनवाया गया था।

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Posted By: Ruchi D Sharma