गौरव गाथा गया में यहां अंग्रेजों की तोप के आगे हुआ था अधिवेशन

2018-08-15T11:02:01Z

स्वराज की लड़ाई लड़ रहे आजादी के दीवाने कभी जिस गांव में जुटे थे उस गांव का ही नाम तब से स्वराजपुरी हो गया। यहां 1922 में अंग्रेजों की तोप के आगे कांग्रेस का अधिवेशन हुआ था। अाइए जानें स्वतंत्रता दिवस पर इस पूरे घटनाक्रम के बारे में

गया (कमल नयन )। बिहार में गया जिले का एक गांव केंदुई। यहां आज भी मकानों पर 'स्वराजपुरी केंदुई' लिखा मिलता है। यह गांव गया रेलवे स्टेशन से सात किमी दक्षिण बोधगया के नदी तट पर बसा है।यहां के बूढ़े-बुजुर्गों के जेहन में आज भी उस अधिवेशन की यादें हैं। 1922 में 26 से 31 दिसंबर तक कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ था। तब अंग्रेजों ने लोगों को काफी डराया। इसके बाद भी नहीं माने तो गांव से सटी ब्रह्मयोनि पहाड़ी पर दो तोपें लगा दी थीं। इसके बाद भी पांच हजार से ज्यादा लोग आजादी के संकल्प के साथ इस अधिवेशन में पहुंचे।
सभास्थल का नाम रखा स्वराज
तीसरी पीढ़ी के लोग आज भी अपने दादा और बाबूजी की बताई बातों को याद रखे हुए हैं। हरख नारायण सिंह उर्फ हरखू सिंह ने गया में इस अधिवेशन में महती भूमिका अदा की थी। इसकी तैयारी महीनों से चल रही थी। इसके संयोजक अनुग्रह नारायण सिंह थे, जो बाद में बिहार के पहले उप मुख्यमंत्री बने।
महिलाओं को भेज दिया था गांव से
शहर से दूर होने के बावजूद ब्रिटिश हुकूमत को इसकी भनक लग गई थी। उनके घुड़सवार सिपाही रोज चेतावनी देने लगे कि पूरी बस्ती तोप से उड़ा दी जाएगी, फिर भी लोगों पर इसका कोई असर नहीं हुआ। महिलाओं और बच्चों को नाते-रिश्तेदारी में भेज दिया गया। सिर्फ पुरुष रह गए और तोपों के बीच अधिवेशन सात दिनों तक सफलता के साथ पूरा हुआ।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद, पटेल जैसी हस्तियां पहुंचीं
इसमें डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, सरदार बल्लभ भाई पटेल जैसे कांग्रेस के बड़े नेता शामिल हुए। इसी अधिवेशन में बल्लभ भाई पटेल को राष्ट्रीय कार्यकारिणी का निर्विरोध सदस्य चुना गया। वे तब गुजरात कांग्रेस में थे। केंदुई गांव के बुजुर्ग वीरमणि सिंह बताते हैं कि उनके पिताजी ने उन्हें बताया था कि यहां किस तरह सात दिनों तक मेला लगा रहा। महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू उस वक्त जेल में थे। अधिवेशन की समाप्ति पर घोषणा की गई कि यहां स्वराज की बात उठी है, इसलिए आज से यह गांव स्वराजपुरी केंदुई के नाम से जाना जाएगा। उस स्थल पर आज चारों ओर मकान गए हैं, पर प्रवेश मार्ग पर आज भी एक शिलापट मौजूद है।

 


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