भारत के पहले मंगल अभियान को लेकर चीन के सरकारी मीडिया ने नपी-तुली प्रतिक्रिया दी है लेकिन साथ ही चेतावनी भी दी है कि अंतरिक्ष दौड़ से क्षेत्रीय तनाव नहीं बढ़ना चाहिए.


भारत के मंगलयान ने मंगलवार सुबह इसरो से सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से उड़ान भरी थी और वह सफलतापूर्वक पृथ्वी की कक्षा में स्थापित हो गया है लेकिन 2014 में मंगल की कक्षा तक पहुंचने में उसे 300 दिन लगेंगे.चीन के अख़बार, 'दि चाइना डेली' का कहना है कि चीन और भारत को "अंतरिक्ष प्रतियोगिता" में पड़ने के बजाय अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में मिलकर काम करना चाहिए.चाइनीज़ अकेडमी ऑफ़ सोशल साइंसेस में दक्षिण एशिया की विशेषज्ञ, ये हेलिन ने अख़बार से कहा कि भारत के मंगल अभियान को भारत की "बड़ी उपलब्धि" के रूप में ही लिया जाना चाहिए और इसे बाकी दुनिया की भी प्रशंसा मिलनी चाहिए.वह कहती हैं, "चीनियों की तरह भारतीयों के भी अंतरिक्ष के सपने हैं."क्षेत्रीय तनाव


साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के एडिटोरियल में लिखा गया है, "शक्ति और जीवन से भरपूर चीन के पड़ोसी, स्वाभाविक रूप से विकास और बढ़त की डींगें हांक रहे हैं."अख़बार में आगे छपा, "यह कहा जा सकता है कि आखिरकार चीन 'मिडिल किंगडम कॉंपलेक्स' से बाहर आ रहा है और यह समझ रहा है कि अपने पड़ोसियों के साथ आपसी हितों के बेहतर तालमेल के साथ ही यह अपनी सीमाओं को ज़्यादा सुरक्षित और समृद्ध बना सकेगा."

हालांकि अख़बार के एक अन्य लेख में क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की चेतावनी भी दी गई है.इसमें कहा गया है, "चीन सरकार और भारत ही अकेले देश नहीं हैं जिनकी अंतरिक्ष में रुचि है. जापान और दक्षिण कोरिया के भी काफ़ी विकसित अंतरिक्ष कार्यक्रम हैं.""अंतरिक्ष में वैज्ञानिक प्रयोगों के असंख्य फ़ायदे हैं, लेकिन चीन और भारत के मामले में क्षेत्रीय तनाव भड़कने का ख़तरा रहता है. इसलिए प्रतियोगिता करने के बजाय सहयोग करने में ज़्य़ादा समझदारी है."ग्लोबल टाइम्स कहता है कि भारत में भारी गरीबी के बावजूद इसके मंगल अभियान पर सवाल खड़े होते हैं.गरीबी और उड़ानइसमें कहा गया है, "भारत को उन देश और विदेश में उन आलोचकों का सामना करना पड़ रहा है, जो चकित हैं कि ऐसे देश में जहां 35 करोड़ से ज़्यादा लोग करीब 77 रुपये प्रतिदिन पर गुज़ारा करते हैं और एक तिहाई लोगों को बिजली की दिक्कत झेलनी पड़ती है- क्या उस देश में अरबों रुपये मंगल की कुछ तस्वीरों के लिए ख़र्च किए जा सकते हैं."

अख़बार इस मिशन के सामने आने वाली मुश्किलों की भी बात करता है, "अब तक सिर्फ़ रूस, अमरीका और यूरोपीय यूनियन ही मार्स में पहुंचने में सफल रहे हैं. चीन और जापान समेत दूसरों के प्रयास असफल रहे हैं. इस क्षेत्र में भारत के एशिया में अग्रणी होने का सपना काफ़ी बड़ी महत्वाकांक्षा है."पाकिस्तानी अख़बारों ने भी मंगलयान के प्रक्षेपण को पर्याप्त कवरेज दी है. कुछ अख़बारों का कहना था कि भारत का मंगल अभियान पड़ोसी चीन पर केंद्रित है.आर्थिक समाचार पत्र बिज़नेस रिकॉर्डर लिखता है, "इसरो के इनकार के बावजूद, अभियान के समय से यह अटकलें लग रही हैं कि भारत आर्थिक और सैन्य रूप से अपने से मज़बूत देशों के सामने कुछ साबित करना चाहता है."अख़बार भारत में गरीबी के कारण हो रही आलोचना का भी उल्लेख करता है.

Posted By: Subhesh Sharma